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बुधवार, 21 सितंबर 2011

एक कागज़ की दिवार स्नेह के संबधो को इतना कमज़ोर बना सकती ..है

मित्रो ..
         और स्नेही ओ ..तथा स्नेही जनों ......
                                      आज क्यों अलग अलग ...नाम से सुरुआत ....इसका भी कुछ न कुछ तो कारन होगा ...क्योकि दोस्तों आज का विषय ही कुछ ऐसा मिला है ..जिसके लिए सुरुआत ऐसी ही करनी जरूरी है ....
                              क्योकि आज स्नेह  के संबधो के बारेमें बात करने वाला हूँ....  ....

सुरुआत एक कहानी से करता हूँ ...
                       सुवर्णा को  आज एक और लड़का देखने लिए आया है ...फिरभी किशिना किशी कारन वश बात कुछ जमी नहीं ..आज से पहले भी कई बार ऐसा ही हुआ था ...इस बात को  लेकर  सुवर्ण के घर वाले बहुतचिंतित थे ...तभी अचानक सुवर्ण ने घर मैं एक धमाका किया उसने अपने पापा से कहा मैं अपनी पसंद के लडके से सादी करना चाहती हु ...और मैंने लड़का पसंद कर लिया है ...
       घर मैं जैसे तहलका सा मच गया ..भूकंप आ गया इतने सालो से गुमसुम रहने वाली लड़की आज ये क्या कह रही है ..पुराने खयालो .और शमाज़ के बड़े मुखिया होने के कारन उसके पिता ने सुवर्ण को बहुत धमकाया और इस बात को मने से साफ इंकार कर दीया ...मगर सुवर्ण ने अपने घरसे रिश्ता तोड़ दिया और संजय से सादी करली ..क्योकि सुवर्ण एक सरकारी नौकरी कर रही थी इस लिए उसने तुरंत ही ..ये कदम उठा लिया ....
                    संजय एक माध्यम वर्गीय परिवार से था ...वो अभी पढाई ही कर रहा था ...और ... ओटो चलाकर अपने पिता को मदद रूप होता था ...
     शादी होते ही सुवर्णा संजय को लेकर अपने सरकारी क्वाटर मैं चली गयी वो अपने माता पिता को भी भुलाने लगी थी ..कभी फिर वो वहा नहीं गई ..अभी संजय बेरोजगार था इस लिए संजय पूरी जिम्मेवारी सुवर्ण उठा रही थी ...उनका संसार ठीक से चल रहा था ....
                एक दिन संजय सुवर्णा से उसका
ATM  कार्ड माँगा ...तो सुवर्ण ने उससे घुर्रा के पूछा तुम्हारी सारी जिम्मेवारी मैं ही उठारही हु तो
तुम्हे पैसो की क्या जरूरत है ...तो संजय ने कहा मेरे पिता बहुत बीमार है और उनके इलाज के पैसो  की सख्त जरूरत है ..इसलिए ...
            तभी सुवर्ण ने कहा ..तुम्हारी जिम्मेवारी निभाते हुए ही मैं थक गई हूँ ..अब तुम्हारे परिवार जिम्मेवारी मैं नहीं उठा सकती ..और हमारे रिश्ते मैं भी यही सरत थी ...
                संजय ने मेरे पिता कि ताक्लिफ मैं उन्हें मदद करना मेरा फ़र्ज़ है
 सुवर्ण ने कहा वो तुम्हारी प्रॉब्लम है ..मैं कुछ नहीं कर सकती ...
 संजय को उसके पिता मदद करना जरूरी था इस लिए उसने फिरसे ऑटो चलाना सुरु कर दिया ..
                      मगर सुवर्ण को ये भी उसके स्टेटस के खिलाफ लगा ..इसलिए उसने संजय को ऑटो चलने से भी साफ इंकार कर दिया ...
 संजय ने गंभीर हो कर उससे कहा जब तक मुजे नौकरी नहीं मिलेगी तब तक मैं ऑटो चलाना नहीं छोडूंगा ..
          तो सुवर्ण ने व्यंगात्मक भाव से कहा ये तो हमारी सरतो का भंग हो गा ...?
 तभी संजय ने एक बहुत ही खुबसूरत बात कही ...स्नेह के संबधो मै कोई सरत कभी नहीं होती ..समज का होना जरूरी है ...एक दुसरे को समज़ने की ..और ऐसे हमारा संसार नहीं चल सकता ...
तभी सुवर्ण जोरसे ..कहा ..यहाँ किसे चलाना है संसार .... और जैसे उसने जिसके लिए उसके माता  पिता से सम्बन्ध तोड़ दिए थे उसी तरह संजय को भी घर से निकल जाने को कह दिया ..और उससे सम्बन्ध तोड़ने का नोटिस भेज दिया ..
             संजय के लिए बहुत ही आघात जनक बात हो रही थी ..उसको लगा की क्या प्रेम की नीव इतनी कमज़ोर होसकती है ...इतना खोखला होता है ये संबधो का घोसला ...क्या प्रेम सब्द का इससे ज्यादा घोर अपमान क्या हो सकता है ...क्या स्नेझ इतना भी कमज़ोर और स्वार्थी हो सकता है ...ये सरे सवाल उसके दिमाग को परेसान करने लगे ..फिर भी 
          वो इन सब बातो से उठाकर रातदिन महेनत करने लगा और साथ मैं  ..IAS   की परिक्सा की तयारी मैं गहरी चोट के कारन वो उतनी ही मजबूती से महेनत भी करने लगा और कुदरत ने उसका साथ दिया उसने वो EXAM पास करली ..
           एकदिन उसके हाथ मैं एक तरफ उसका टॉप रंकिंग का कागज़ था ..और दुसरे हाथ मैं डिवोर्स के पेपर ..तभी ..अचानक सुवर्णा को पता चला ...और तुरंत बिना किसी देरी के वो संजय के पास पहुच गयी ..और उसके हाथ मैसे डिवोर्स के पेपर लेकर बोली मैतो मजाक कर रही थी मैं कभी आपसे जुदा हो सकती हूँ..........
          क्या एक कागज़ की दिवार स्नेह के संबधो को इतना कमज़ोर बना सकती ..है ...
 


 

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