क्या हो रहा है .....क्यों हो रहा है ...कुछ समज मैं न ही आरहा है ...
लेकिन हां हो जरूर रहा है .... ..
और हम बस सहे जाते है ...क्यों की एक अजीब सी बीमारी हमें लगी हुई है ..क्या करे ..?
हमें बचपन से ही सहते रहने का शिखाया जाता है ...और हम जो भी बात जिसमे .दम की कोई जरूरत नहीं वो जल्दी ही सिख जाते है ....और उसका पालन भी अच्छे से करते है ...
हां ..कुछ देर के लिए इस सब बातो का हल्ला भी करते है ..और जल्दी ही भूल भी जाते है ...?
इस चमन मैं अब अपना गुजारा नहीं
बात होती गुलों तक तो सह लेते हम
अब तो काँटों पे भी हक हमारा नहीं..
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जो लड़ा था सिपाहियों की तरह
ऐसा भारत में कोई बादशाह न हुआ
रूह तो हो गयी थी तन्न से जुदा
हाथ तलवार से जुदा न हुआ..
`
....
और इसी भूल भुलैया मैं कई बार तो हमारी या तो हमारे परिजन की मौत को भी हम कब भूल जाते है ...... वो पता ही नहीं चलता ....
आज बड़े सहरो मैं जब कोई घर से निकालता है तो वो कब वापस आएगा... या तो आएगा या नहीं ...वह भी उसे या तो उसके परिवार को चिंता रहती है ...अगर वो किसी भी काम मैं भी अगर देर कर देता है तो उसके परिवार के लोग कुछ और ही सोचने लगते है ...ऐसा क्यों ...?
.........अगर इसी बात को अगर हम अपने बारे मैं सोच कर चले तो ..क्या हो सकता है ...ये हमें पता चले गा ..
अगर मैं खुद अपने बारे मैं लिखू तो ...जब भी मैं घर से निकलता हूँ ..तो मेरा बच्चा शाम को मैं जब घर लौटूंगा तब तक वो किशिना किशी बात को लेकर मेरी राह देखता होगा ...और घर जाते ही वोह मुझसे गले लगकर प्यार जताता है ...अगर मैं सामको न लौटा तो ....?...............
मेरी पत्नी भी उसी तरह रोज मेरी राह देखती ..है ...मेरी माँ भी ..पापा भी और बहन भी ...ये केवल मेरी बात नहीं मैं यानी सभी ...आप भी ..और आपके सभी भाई बहन पापा .........और केवल ये हमारे देश मैं ही नहीं सभी जगह हो रहा है ...क्यों इन्सान ही इन्सान के खून का प्यासा हो रहा है ..?
सिर्फ अपना भय फ़ैलाने के लिए ...केवल डराने के लिए ...? कोई धर्म के नाम पर तो कोई जाती के नाम पर ..कोई देश के नाम पर तो कोई अपने शमराज्य के नाम पर खून की होली खेल रहा है ...बहूत दर्द होता है ...लेकिन इसका कोई इलाज भी दिखाई नहीं दे रहा ...
हम भी जब भी ऐसा होता है तो अपने राजनेता को जिम्मेदार ठहराके यतो सर्कार को दोषित करार करके कुछ समय तक हल्ला करके सांत हो जाते है ...और फिर जब चुनाव आता है तो हम भी उशी भीड़ मैं सामील हो जाते है ...और जाती और धर्म के नाम पर यतो हमारे स्वार्थ के नाम पर वोट कर देते है ..और उसी वोट बैंक को बचाने के लिए हमारे नेता फिरसे ...उसी तरीके से ..शासन चलाते रहते है ..कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाते जिससे उनके वोट बैंक पर असर हो ...
क्या हम अपने पुरे १२५ करोड़ की आबादी वाले देश मैं से केवल ५४८ ऐसे लोग नहीं भेज सकते ...?
जो इमानदार हो ..
जो अपने स्वार्थ से पर हो
जो बहादूर हो .
जो निडर हो
जो देशभक्त हो
जो इस सिस्टम को बदल शकने मै शक्ति मान हो ..
जो जाती धर्म ..से ऊपर उठके केवल हिन्दुस्तानी हो ...
जब भी हम ये कर पाएंगे तो ...अवस्य ही इसका बहूत ही अच्छा परिणाम हमें मिल जायेगा ...
अगर न कर पाए तो फिर ..किसीने ठीक ही कहा है ..
ऐ मेरे हमनशीं चल और कहीं
इस चमन मैं अब अपना गुजारा नहीं
बात होती गुलों तक तो सह लेते हम
अब तो काँटों पे भी हक हमारा नहीं..
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जो लड़ा था सिपाहियों की तरह
ऐसा भारत में कोई बादशाह न हुआ
रूह तो हो गयी थी तन्न से जुदा
हाथ तलवार से जुदा न हुआ..
`
वह पलक झपक कर निकल गया
फिर लाश बिछ गयी लाखों की
सब पलक झपक कर बदल गया
जब रिश्ते राख में बदल गए
इंसानों का दिल दहल गया
मैं पूछ पूछ कर हार गया
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