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गुरुवार, 15 सितंबर 2011

वर्ना पथरो को ताजमहल कौन कहता ....

मोहब्बत ..............
        जिस लब्ज़ को सुनते ही दिल मैं एक अजीब सी ज़न्ज़नी पैदा होजाती है ....जिस के बारे मैं सोच कम और फिल्लिंग्स ज्यादा होती है ...नहीं कुछ बुरा लगता है ....सब कुछ प्यारा ही लगता है ...क्योकि वो लब्ज़ ही इतना प्यारा है की लिखते हुए कलम nonstop  चलती ही रहती है ..सब्द अपने आप ही निकल कर पन्नो पर उतर जाते है ...
                                                    और सही मैं जितना ही प्यारा ये सब्द है उतना ही प्यारा एहसास भी ...और  इसी   एहसास  के  सहारे .....तो कायनात चल रही है ....
        वैसे लोग कहते है ...केवल प्रेम के सहारे जिन्दगी बसर नहीं होती ...हा मगर ये भी तो सच है न ....... प्रेम के बिना भी तो जिन्दगी ........जिन्दगी ही नहीं होती ..
        लेकिन दोस्तों ....मैं जिस एहसास की बात कर रहा हूँ ..वो केवल दिल्लगी नहीं ...
मैं तो जिसको इबादते इश्क ..यानि प्रेम की इबादत की बात कर रहा हूँ ...क्योकि ..दिल्लगी तो आज आम बात होगई है ...किसीसे भी कही पे भी बिना दिल के जो लगी करते है उसीका नाम दिल्लगी होगया है ..जिसमे नहीं कोई एहसास होता है नहीं कोई जज्बात ...लेकिन कई बार तो दिल्लगी ही दिल की लगी हो जाती है ..और पता ही नहीं चलता ..और फिर वो चोट सरे आम दिल को घायल कर जाती है ....मैंने नुसरत फ़तेह अली खान .की एक ग़ज़ल सुनिथी

तुम्हें  दिल्लगी  भूल  जानी   पड़ेगी  

मोहब्बत  की  राहों  में  आ  कर  तो  देखो ...

तडपने   पे  मेरे  न  फिर  तुम  हसो  गे

कभी   दिल  किसी  से  लगा  क़र  तो  देखो ...
....जितना ही प्यारा एहसास है ...उतना ही दर्द भी है ..इस अहसास मैं अगर
जिसमें दर्द न हो ..वो मोह्हब्बत किस काम की .....
 दर्द भी वही ...दवा भी वही ...
दुआ भी वही... दावा भी वही ...
मिलन भी वही ..जुदाई भी वही ...
ख़ुशी भी वही... गम भी वही ..
मगर उन्हें क्या पता जिन्होंने मुहोब्बत की ही नहीं ....
 ..........................इसी बात पे मुजे  कहीसे सुना हुआ एक किस्सा यद् आया है ...

            यह एक बहुत ही खुबसूरत मगर अंधी लड़की और उसके प्रेमी की बात है ...
 लड़की अंधी होने के कारन कोई उसे पसंद नहीं करता था मगर एक लड़के को उससे प्यार हो गया ..वो लड़की भी उसमे दिलचस्पी लेने लगी अंधी होने के बावजूद वो लड़का उसे अपनाने के लिए उत्सुक था ..मगर लड़की ने कहा अगर मेरी आँखे होती तो मैं भी तुमसे सादी कर लेती ..एक दिन किसीने अचानक उसे आँखे दान कर दी थोड़े  दिन बाद वोह देखने लगी .अब वो लड़की सब कुछ देख सकती थी ..दुनिया को देखने बाद ..एक दिन उसका प्रेमी उसके सामने आया .मगर वोह अँधा हो गया था ..लड़की ने उससे सादी करने से मना कर दिया ...बन्दा ...बिना किसी ..बात किये वहा से चल पड़ा ..मगर जाते जाते उसने कहा कोई बात नहीं तुम्हारी जिन्दगी मैं भगवन खुशियाँ  भरदे ..मगर हाँ मेरी आंखो का ख्याल रखना .....

आज  फेर  ली  उन्होंने  आँखे  हमसे ,

जो  हमपे  जान  निसार  करते  थे .

आज  नाम  लेते  भी  कतराते  हैं ,


जो  कभी  हमसे  मुहब्बते  इकरार  करते  थे .

मगर ....
क्या करे इसमे उनका भी कसूर नहीं ..


कुस्हुर  हमारी आँखों का ही है...  जो आज उनके पास है ..



क्या लगता है इस किस्से को पढ़के आप को ...इसमें समर्पण और त्याग भी दिखाई देता है ..और ..दूसरी तरफ से ...स्वार्थ ..भी ...
               .......दोस्तों लिखने के लिए तो बहोत कुछ है इस विषय पे मगर आज बस इतना ही .....


न  खुदा  दिल  बनता  न  किसीसे  प्यार  होता ,

न  किसीकी  याद  अति  न  किसीका  इंतजार  होता

 
यह ही  तो  करिश्मा  है  मोहब्बत  का ,

 वर्ना  पथरो को  ताजमहल  कौन  कहता ....

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