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रविवार, 18 सितंबर 2011

आँखों का धोखा

नमस्कार मित्रो ...
 सु..... प्रभात .................
                        क्या आपने कभी चाँद को रोते हुए देखा है ....?
                         क्या उसे आपने सरमाते हुए देखा है ..?
                        क्या आपने उसे नई दुल्हन की तरह घूंघट ओढ़ते हुए देखा है ..?
                       क्या उसको आपने धरती के प्रेम के लिए तरसते हुए देखा है ...?
                      क्या उसको धरती साथ आँख मिचौली खेलते हुए देखा है ...?
                      क्या उसको खिल खिलते हुए देखा है ...?
                         उसको आपने सजते संवारते हुए देखा है ..?
मगर ...हां मैंने देखा है ..
 लोग कहते है की धरती और गगन का कभी मिलन नहीं होता ...
मगर येतो हमारी आँखों का धोखा है की हमें दिखाई नहीं देता ...
            कभी रात के अँधेरे मैं आपने गगन की और देखा है ...? अगर मन लगाकर देखा है तो आपको भी ये सब जरूर से दिखाई देगा..........!
 ...रात के अँधेरे मैं जब बादल घुमड़ कर आते है .....तभी चाँद  को अपनी चांदनी के साथ .वो  बादल .कही  छुपा लेता है  ...और पता ही नहीं चलता ..
फिर वो धरती को देखने के लिए बेक़रार हो जाताहै ..जब ..कई देर तक बादल हटने का नाम नहीं लेते तो वो इंतजार की सारी हदे पार कर जाता है ...फिर बिजली के द्वारा  वो अपना गस्सा जताता  है ...फिर भी बादल नहीं हटाते तो वो गुस्से ते तिलमिलाकर .भयंकर आवाज़ के साथ घुर्रा उठता है ...और फिर वो बारिस के रूप से रोने लगता है ..इतनी ..बेकरारी  होती है.... चाँद की धरती को देखने की ...और फिर जब बादल हट जाते है तो वो सितारों की ज़ग्मगति चुनरी ओढ़के नयी दुल्हन के रूप मैं खिलखिला उठता ..है ... 
      अब जब जब आकाश मैं  बादल घुमड़ कर आये तब उसकी और देखना आपको भी ये सब दिखाई देगा ...
                       तो यही है हमारी आँखों का धोखा.... हम जब जिसको भी जिस पल को भी जिस .. निगाह से देखते हमें वो वैसा ही दिखाई देता है ...
         हमारी आँखे भी हमारे मन  की ही बात मानती है तो फिर हम ..क्या करे ...?


कोई  आँखों  से  बात  कर  लेता  है



कोई  आँखों  में  मुलाकात  कर  लेता  है


बड़ा  मुश्किल  होता  है  जवाब  देना


जब  कोई  खामोश  रहकर  सवाल  कर  लेता है ...

                    

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