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शनिवार, 24 सितंबर 2011

फासले

नमस्कार   दोस्तों ..
       आज एक नया प्रयाश कर रहा हूँ .एक कहानी लिखने की कोशिश कर रहा हूँ ...अगर अछि लगे तो जरूसे अपना कमेन्ट कीजिये ....
                  
            "   प्यार  हमको  भी  है ,प्यार  तुमको  भी है तोह  क्यों  इतने  गिले  हो  गए
               बेवफा  हम  नहीं , बेवफा  तुम  नहीं , तोह  यह  क्या  सिलसिले  हो  गए
              चलते  चलते  कैसे  यह  फासले  हो  गए , क्या  पता  कहा:  हम  चले.......... "
 शिला के म्यूजिक सिस्टम पर ये गाना बज रहा था तभी शिला ..अपने जीवन की गहराई मैं खो चुकी थी ......... फिर से एकबार ............वही बाते उसके दिलो दिमाग मैं खलबली सी मचा रही थी ...
          आजसे करीब दस साल पहले की बात थी एक दिन शिला शोपिंग करने के लिए मार्केट गयी थी और एक साडी के शो रूम मैं उसकी और राघव की अचानक मुलाक़ात हुई थी ...राघव उस शो रूम मैं सेल्स मेन की नौकरी करता था ..शिला उसीके  काउंटर पर एक साड़ी खरीदने के लिए  आगई ..राघव ने उसकी और देखते ही अपनी पसंद की पहली साड़ी दिखाई और शिला को भी वही साड़ी पसंद आगई ..तभी अचानक शिला ने उससे कहा आपकी और मेरी पसंद  काफी मिलती है ...तभी राघव भी शिला को एक नज़र देखकर ..देखता ही रह गया ....कितने ख्याल उस एक नज़र मैं उसके दिल और दिमाग से चले गए उसे पताही नहीं चला ...और भी ग्राहक वहा खड़े थे उसका उसे पता ही नहीं चला बस वो शिला को देखता ही रहा ...अचानक पीछे से किसीने कहा राघव ,,,,,,,तभी वो नींद से जगा हो वैसे अपने आप को सँभालने मैं लग गया ..उसकी निगाहे अभी भी शिला को ढूंढ़ रही थी ...मगर शिला तो वहा से चली गयी थी ...अब वो हर ग्राहक मैं शिला को ही ढूंढ़ रहा था ..वो यही सोच रहाथा की कब फिर से उसी लड़की से मुलाकात हो जाये ....क्योकि ....
 इस एक बात ने राघव की जिन्दगी को ही बदल दिया और बिना कुछ जाने ही वो मन ही मन मैं  शिला से प्यार करने लगा ...
                 कुछ दिन बाद वो अपनी बाइक से शो रूम पर जा रहा था तभी उसने स्टैंड पर शिला को देखा बिना सोचे वो वहा पहुच गया ...शिला के पास जाकर पहले क्या बात करे उसी अस्मासंज मैं वो फिर से सुन मून खड़ा हो गया ...तभी शिला ने उसे कहा हाई ...बस उसी हाई........ hallo   से उनकी  दोस्ती कब प्यार मैं बदल गई पता ही नहीं चला ....
                      दोनों के घर मैं भी उनकी संबंधो को कोई एतराज का सामना नहीं करना पड़ा क्योकि ..शिला और राघव दोनों ही माध्यम वर्गीय परिवारसे ही थे ..और ज्यादा कुछ .जाती मै भी फरक नहीं था ....परिवार की मर्जी से ही दोनों ने बहुत ही सादगी से शादी कर ली ...
      राघव अपने छोटे भाई और माता पिता के साथ ही रहता था ...शिला ने भी उसी घर मैं सयुक्त कुटुंब मैं रहना पसंद किया ...इस बात को लेकर राघव भी बहुत खुश था ...
         अब राघव ने नौकरी छोड़ कर अपना ही बिजनेस सुरु करना चाह ...रहाथा ..तभी उसके गाँव मैं कुछ पुस्तानी जमीं थी जो बरसो से पड़ी थी उसको बेचकर एक नया बिजनेस सुरु कर दिया ....
बिसनेस मैं दिन बदिन उसकी तरक्की होने लगी ..और कुछ ही साल मैं वो कुछ ज्यादा ही ऊंचाई पर पहोच गया ...
                              आज  उसके  पास   वो  सबकुछ  था  जो  एक अमिर इन्सान के पास होना चाहिए  ..
मगर हां उसके पास अब वक़्त की बहुत कमी रहने लगी थी ...और जो वक़्त वो शिला को देना चाहता था वाही वक़्त अब उसे पैसे के पीछे भागने में लगाना पड़ता था ....और इसी मायाजाल मैं वो  धीरे धीरे शिला  से  कुछ ज्यादा ही दूर ...हो गया था ....
                    सिला के पास आज भौतिक शुख की कोई कमी नहीं थी फिर भी वो अन्दर ही अन्दर कुछ कमी सी महसूस कर रही थी ... फिर भी उसे राघव के माता पिता और भाई के प्यार मैं .....वो अपनी इस कमी को कुछ कम महसूस कर रही थी ...क्यों की वोह जब इस घरमें आई थी तब उसने राघव के सयुक्त कुटुंब मैं ही रहने का निर्णय किया था ..वाही आज उसका सबसे बड़ा साथी बन गया था ...जब वो इस घर मैं आई थी तब राघव का छोटा भाई वरुण करीबन पंद्रह सोलह सालका ही था ..उसकी और शिला तब से कुछ ज्यादा  ही बनती थी..वो अपने देवर को अपने बेटे की तरह ही प्यार करती थी ..और वरुण के साथ कुछ ज्यादा ही घुलमिल गयी थी ,,,आज शिला का बेटा रूद्र भी ८ शाल का हो गया है ...और वरुण भी २५ से २६ साल का नौजवान हो गया था . ... 
         
               वरुण आज अपनी भाभी से अपनी एक फ्रेंड के बारे मैं बात कर रहा था ...और बहुत चुपके से ..किसी और को घर मैं पता न चले इस लिए दोनों अकेले ही शिला के रूम मैं ही बाते कर रहे थे ...तभी अचानक राघव वह रूम मैं आजाता है ...और दोनों चुप हो जाते है ..और राघव वहांसे चला जाता है ...उस समय तो राघव शिलासे कुछ नहीं कहता लेकिन उसके मन मैं एक अजीबसी ..शंका ने जन्म ले लिया ..मगर उसी वक़्त वो अपने आप को कोशने लगा ..ये कैसी हिन् सोच है मेरी ...
ऐसा कभी नहीं हो सकता ...
                     फिरसे वाही रफ़्तार से उनकी जिंदगी  गुज़रने लगी थी .........
                सुबह फिर से वो अपनी ऑफिसअपने काम पर चला गया ..ऑफिस मैं वो अपना काम कर रहता की ..उसके फोन पर घंटी बजी रोज तो वो फोन पर बस काम की ही बात करके फोन कट देता था मगर आज वो कुछ ज्यादा ही इंटरेस्ट से बात कर रहा था ..क्योकि आज फोन पर उसका बहुत ही अच्छा मित्र अंशुमन था .. ..मगर पढाई के बाद अंशुमन लन्दन चला गया था ..राघव ने उसे अपने ऑफिस एड्रेस दिया और उसे ऑफिस बुला लिया ...
आज अचानक से उसे देखकर राघव ..अचंबित हो गया दोनों ने कुछ बाते की और राघव उसे घर ले आया ..
              राघव ने घर मैं सबका अंशुमन से परिचय करवाया ...तभी राघव ने देखा की शिला अंशुमन देखकर कुछ चौंक सी गयी थी मगर उसने अपने आप को संभाल लिया और नोर्मल हो गयी ..कुछ बाते हुई  ...और अंशुमन वहासे चला गया ..फिरसे मिलने की बात करके .वो जुदा हुए ..
               मगर यहाँ शिला कुछ ज्यादा ही परेसान लग रही थी .उसमे अचानक से कुछ ज्यादा ही बदलाव आरहे थे ..क्योकि अंशुमन वाही इन्सान  था जो शिला से एक तरफा प्रेम मैं पागल था ..उसने शिलासे कई बार इस बात को लेकर शिला को परेसान किया था .एक बार तो उसने अपने खून से शिला को ख़त भी . लिखाथा... बे पनाह दीवाना था वो शिला का .. और इसी परेशानी के चलते शिला  और उसके परिवार को  सहर बदल देना पड़ा था ... और आज अचानक उसी इन्सान को अपने पति के मित्र के रूप मैं देखकर उसके दिलो दिमाग पर भूकंप सा मच गया था ...वो अपने आप को संभालने मै ही लगिथि ..वाही राघव अचानक कमरे मैं आता है .शिला को परेसान देखकर वो उससे उसकी तबियत के बारे मैं पूछ ताछ करता है ..मगर शिला भी उससे तबियत कही बहाना बताकर वो बात छुपा लेती है ...मगर फिरसे एक बार राघव शिला के बारे मैं कुछ गलत सोच और एक अजीब सी शंका ..उसके मन को परेसान करने लगी ..थी ..
               और इस तरफ अंशुमन भी  इतने साल बाद ..अचानक से   शिला को देखकर ......बेचैन ..था .. अचानक  से  फिर  से  अपने  प्रेम को अपनी दोस्त के पास  देखकर फिरसे वो यादें
उसके दिमाग  मैं....हावी  होने लगी थी  जिस लड़की के लिए उसने आज तक सादी नहीं की थी वाही लड़की आज अपने ही मित्र की दुल्हन रूप मैं देखकर वो दुविधा मैं पड  गया ... क्या करना क्या नहीं उसके कुछ समजमैं नहीं आ रहा था ..फिर से वो पुराणी यादों को भुलाने के लिए ..शराब के शहारे मैं चला गया .....
        इधर ..राघव शिला की बेचैनी को साफ देख रहाथा.. क्यों अचानक से इतना सारा बदलाव आज तक जो सारी एकलता को भुलाकर अपने सारे  परिवार के सुविधा मैं अपना शुख देखने वाली औरत और ... पुरे घर को खुश रखने   वाली उसकी पत्नी गुमसुम क्यों हो गयी है यही सवाल राघव को ..परेसान कर देता था ...
             राघव अब कुछ ज्यादा ही घर के तरफ ध्यान दे  रहा था ..उसमे कुछ ज्यादा ही बदलाव आरहा था ...वो कई बार तो कुछ अजीबसी हरकते  करने लगता अचानक ऑफिस से फोन करके वो शिला की खबर पूछता था ...घर के लैंड लाइन फोन पर फ़ोन करके वो शिलासे बात करके पता लगाता था की शिला घरमें ही है  या नहीं .. वो अपने बिजनेस मैं भी पूरा ध्यान नहीं लगा सकता था ..
              यहाँ  वरुण भी ...भाभी की परेशानी को साफ महसूस कर रहा था ... मगर क्या बात थी उसे भी पता नहीं था ...फिर भी उसने एक बार अपनी भाभी से बात करने का फैसला किया ...क्योकि पुरे घर का वातावरण ही बदल गया था ....और इस वज़ह से वो भी परेसान था ...
                 सबके मन मैं कुछ न कुछ अंजना सा  डर था ..क्या है ..क्यों है ये अजीब सी हालत कोई नहीं जानता  था ..मगर हां सब के सब बेचैन जरूर थे ...
                 वरुण  आज अपनी भाभी से इस सिलसिले मैं बात करने लिए भाभी के कमरे मैं जाता है ..वहा वो अपनी भाभी को किसी से फोन पर बात करते हुए सुनता है और बहुत ही गभारई हुई
महसूस  करता है ..और तभी वो पूछता है भाभी क्या बात है आप कई दिनों से परेसान लग रही हो ..? और किस्से आप फोन पर बात कर रही थी ..आप कुछ प्रॉब्लम मैं लगाती है ..
            शिला उससे छुपाने की कोशिश करती है ..मगर वो अपने आपको रोने  से रोक नहीं पाती ..
 और वरुण भी अपनी भाभी को सम्हालने लिए उनके पास जाता है ..शिला पूरी बात वरुण को बताती है ..भाभी ने कहा आज अन्सुमन का ही फोन आया था........... और वोह मुझसे मिलाना चाहता है ...        ..वरुण अपनी भाभी को कहता है मैं भी आपके साथ चलूँगा ...दोनों साथ मैं ..अन्सुमन से मिलने  के लिए उसके बताये हुई जगह पर जाते है ...मगर ये क्या ..वहा तो अन्धकार छाया हुआ ...अचानक उनके जाते ही ..चारो तरफ से रौशनी ही रौशनी हो जाती है ...और वो ये मंज़र देखकर चौक से जाते है ..क्योकि राघव भी वहा मौजूद था ...और अन्सुमन  आज अपनी शादी का एलान करने वाला था ....और इसकी ख़ुशी मैं ही उसने आज ये पार्टी दे रखी थी ...
                    तभी राघव पूरी बात बताता है ...कई दिन से तुम्हारी परेसनी मुजसे बर्दास्त नहीं होरही थी
इसलिए जब पहली बार अन्सुमन को देखकर चौक सी गयी थी तभी मुजे कुछ .लगा ..और इधर अन्सुमन भी मुझसे बात करने से कतराता था ..तभी मैंने अन्सुमन से इस बारे मैं बात की और पता चला की अन्सुमन भी इस बात को लेकर परेसान था और वो भी बहुत  शार्म सही महसूस कर रहता और उसने पूरी बात मुजे बताई वो यहाँ शादी करने के लिए ही तो आया था ..तभी सारे फासले दूर करने के लिए ये प्लान बनाया था ..........   
                      और सभी साथ मिलकर अन्सुमन को शादी की अडवांस  मैं बधाई ...देते है ..मगर यर क्या अन्सुमन जिससे सादी करने जा रहता वोह....................  लड़की ..?  ......................................................

























..........................................................सोच मैं पड़ गए .......क्या? ..वोह लड़की भी बहुत सुन्दर  ही थी ....
 कैसी लगी ये कहानी .....सभी पात्र काल्पनिक ही है ....वैसे तो अंत कुछ और सोचा था मगर ...


                                 

बुधवार, 21 सितंबर 2011

एक कागज़ की दिवार स्नेह के संबधो को इतना कमज़ोर बना सकती ..है

मित्रो ..
         और स्नेही ओ ..तथा स्नेही जनों ......
                                      आज क्यों अलग अलग ...नाम से सुरुआत ....इसका भी कुछ न कुछ तो कारन होगा ...क्योकि दोस्तों आज का विषय ही कुछ ऐसा मिला है ..जिसके लिए सुरुआत ऐसी ही करनी जरूरी है ....
                              क्योकि आज स्नेह  के संबधो के बारेमें बात करने वाला हूँ....  ....

सुरुआत एक कहानी से करता हूँ ...
                       सुवर्णा को  आज एक और लड़का देखने लिए आया है ...फिरभी किशिना किशी कारन वश बात कुछ जमी नहीं ..आज से पहले भी कई बार ऐसा ही हुआ था ...इस बात को  लेकर  सुवर्ण के घर वाले बहुतचिंतित थे ...तभी अचानक सुवर्ण ने घर मैं एक धमाका किया उसने अपने पापा से कहा मैं अपनी पसंद के लडके से सादी करना चाहती हु ...और मैंने लड़का पसंद कर लिया है ...
       घर मैं जैसे तहलका सा मच गया ..भूकंप आ गया इतने सालो से गुमसुम रहने वाली लड़की आज ये क्या कह रही है ..पुराने खयालो .और शमाज़ के बड़े मुखिया होने के कारन उसके पिता ने सुवर्ण को बहुत धमकाया और इस बात को मने से साफ इंकार कर दीया ...मगर सुवर्ण ने अपने घरसे रिश्ता तोड़ दिया और संजय से सादी करली ..क्योकि सुवर्ण एक सरकारी नौकरी कर रही थी इस लिए उसने तुरंत ही ..ये कदम उठा लिया ....
                    संजय एक माध्यम वर्गीय परिवार से था ...वो अभी पढाई ही कर रहा था ...और ... ओटो चलाकर अपने पिता को मदद रूप होता था ...
     शादी होते ही सुवर्णा संजय को लेकर अपने सरकारी क्वाटर मैं चली गयी वो अपने माता पिता को भी भुलाने लगी थी ..कभी फिर वो वहा नहीं गई ..अभी संजय बेरोजगार था इस लिए संजय पूरी जिम्मेवारी सुवर्ण उठा रही थी ...उनका संसार ठीक से चल रहा था ....
                एक दिन संजय सुवर्णा से उसका
ATM  कार्ड माँगा ...तो सुवर्ण ने उससे घुर्रा के पूछा तुम्हारी सारी जिम्मेवारी मैं ही उठारही हु तो
तुम्हे पैसो की क्या जरूरत है ...तो संजय ने कहा मेरे पिता बहुत बीमार है और उनके इलाज के पैसो  की सख्त जरूरत है ..इसलिए ...
            तभी सुवर्ण ने कहा ..तुम्हारी जिम्मेवारी निभाते हुए ही मैं थक गई हूँ ..अब तुम्हारे परिवार जिम्मेवारी मैं नहीं उठा सकती ..और हमारे रिश्ते मैं भी यही सरत थी ...
                संजय ने मेरे पिता कि ताक्लिफ मैं उन्हें मदद करना मेरा फ़र्ज़ है
 सुवर्ण ने कहा वो तुम्हारी प्रॉब्लम है ..मैं कुछ नहीं कर सकती ...
 संजय को उसके पिता मदद करना जरूरी था इस लिए उसने फिरसे ऑटो चलाना सुरु कर दिया ..
                      मगर सुवर्ण को ये भी उसके स्टेटस के खिलाफ लगा ..इसलिए उसने संजय को ऑटो चलने से भी साफ इंकार कर दिया ...
 संजय ने गंभीर हो कर उससे कहा जब तक मुजे नौकरी नहीं मिलेगी तब तक मैं ऑटो चलाना नहीं छोडूंगा ..
          तो सुवर्ण ने व्यंगात्मक भाव से कहा ये तो हमारी सरतो का भंग हो गा ...?
 तभी संजय ने एक बहुत ही खुबसूरत बात कही ...स्नेह के संबधो मै कोई सरत कभी नहीं होती ..समज का होना जरूरी है ...एक दुसरे को समज़ने की ..और ऐसे हमारा संसार नहीं चल सकता ...
तभी सुवर्ण जोरसे ..कहा ..यहाँ किसे चलाना है संसार .... और जैसे उसने जिसके लिए उसके माता  पिता से सम्बन्ध तोड़ दिए थे उसी तरह संजय को भी घर से निकल जाने को कह दिया ..और उससे सम्बन्ध तोड़ने का नोटिस भेज दिया ..
             संजय के लिए बहुत ही आघात जनक बात हो रही थी ..उसको लगा की क्या प्रेम की नीव इतनी कमज़ोर होसकती है ...इतना खोखला होता है ये संबधो का घोसला ...क्या प्रेम सब्द का इससे ज्यादा घोर अपमान क्या हो सकता है ...क्या स्नेझ इतना भी कमज़ोर और स्वार्थी हो सकता है ...ये सरे सवाल उसके दिमाग को परेसान करने लगे ..फिर भी 
          वो इन सब बातो से उठाकर रातदिन महेनत करने लगा और साथ मैं  ..IAS   की परिक्सा की तयारी मैं गहरी चोट के कारन वो उतनी ही मजबूती से महेनत भी करने लगा और कुदरत ने उसका साथ दिया उसने वो EXAM पास करली ..
           एकदिन उसके हाथ मैं एक तरफ उसका टॉप रंकिंग का कागज़ था ..और दुसरे हाथ मैं डिवोर्स के पेपर ..तभी ..अचानक सुवर्णा को पता चला ...और तुरंत बिना किसी देरी के वो संजय के पास पहुच गयी ..और उसके हाथ मैसे डिवोर्स के पेपर लेकर बोली मैतो मजाक कर रही थी मैं कभी आपसे जुदा हो सकती हूँ..........
          क्या एक कागज़ की दिवार स्नेह के संबधो को इतना कमज़ोर बना सकती ..है ...
 


 

रविवार, 18 सितंबर 2011

आँखों का धोखा

नमस्कार मित्रो ...
 सु..... प्रभात .................
                        क्या आपने कभी चाँद को रोते हुए देखा है ....?
                         क्या उसे आपने सरमाते हुए देखा है ..?
                        क्या आपने उसे नई दुल्हन की तरह घूंघट ओढ़ते हुए देखा है ..?
                       क्या उसको आपने धरती के प्रेम के लिए तरसते हुए देखा है ...?
                      क्या उसको धरती साथ आँख मिचौली खेलते हुए देखा है ...?
                      क्या उसको खिल खिलते हुए देखा है ...?
                         उसको आपने सजते संवारते हुए देखा है ..?
मगर ...हां मैंने देखा है ..
 लोग कहते है की धरती और गगन का कभी मिलन नहीं होता ...
मगर येतो हमारी आँखों का धोखा है की हमें दिखाई नहीं देता ...
            कभी रात के अँधेरे मैं आपने गगन की और देखा है ...? अगर मन लगाकर देखा है तो आपको भी ये सब जरूर से दिखाई देगा..........!
 ...रात के अँधेरे मैं जब बादल घुमड़ कर आते है .....तभी चाँद  को अपनी चांदनी के साथ .वो  बादल .कही  छुपा लेता है  ...और पता ही नहीं चलता ..
फिर वो धरती को देखने के लिए बेक़रार हो जाताहै ..जब ..कई देर तक बादल हटने का नाम नहीं लेते तो वो इंतजार की सारी हदे पार कर जाता है ...फिर बिजली के द्वारा  वो अपना गस्सा जताता  है ...फिर भी बादल नहीं हटाते तो वो गुस्से ते तिलमिलाकर .भयंकर आवाज़ के साथ घुर्रा उठता है ...और फिर वो बारिस के रूप से रोने लगता है ..इतनी ..बेकरारी  होती है.... चाँद की धरती को देखने की ...और फिर जब बादल हट जाते है तो वो सितारों की ज़ग्मगति चुनरी ओढ़के नयी दुल्हन के रूप मैं खिलखिला उठता ..है ... 
      अब जब जब आकाश मैं  बादल घुमड़ कर आये तब उसकी और देखना आपको भी ये सब दिखाई देगा ...
                       तो यही है हमारी आँखों का धोखा.... हम जब जिसको भी जिस पल को भी जिस .. निगाह से देखते हमें वो वैसा ही दिखाई देता है ...
         हमारी आँखे भी हमारे मन  की ही बात मानती है तो फिर हम ..क्या करे ...?


कोई  आँखों  से  बात  कर  लेता  है



कोई  आँखों  में  मुलाकात  कर  लेता  है


बड़ा  मुश्किल  होता  है  जवाब  देना


जब  कोई  खामोश  रहकर  सवाल  कर  लेता है ...

                    

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

वर्ना पथरो को ताजमहल कौन कहता ....

मोहब्बत ..............
        जिस लब्ज़ को सुनते ही दिल मैं एक अजीब सी ज़न्ज़नी पैदा होजाती है ....जिस के बारे मैं सोच कम और फिल्लिंग्स ज्यादा होती है ...नहीं कुछ बुरा लगता है ....सब कुछ प्यारा ही लगता है ...क्योकि वो लब्ज़ ही इतना प्यारा है की लिखते हुए कलम nonstop  चलती ही रहती है ..सब्द अपने आप ही निकल कर पन्नो पर उतर जाते है ...
                                                    और सही मैं जितना ही प्यारा ये सब्द है उतना ही प्यारा एहसास भी ...और  इसी   एहसास  के  सहारे .....तो कायनात चल रही है ....
        वैसे लोग कहते है ...केवल प्रेम के सहारे जिन्दगी बसर नहीं होती ...हा मगर ये भी तो सच है न ....... प्रेम के बिना भी तो जिन्दगी ........जिन्दगी ही नहीं होती ..
        लेकिन दोस्तों ....मैं जिस एहसास की बात कर रहा हूँ ..वो केवल दिल्लगी नहीं ...
मैं तो जिसको इबादते इश्क ..यानि प्रेम की इबादत की बात कर रहा हूँ ...क्योकि ..दिल्लगी तो आज आम बात होगई है ...किसीसे भी कही पे भी बिना दिल के जो लगी करते है उसीका नाम दिल्लगी होगया है ..जिसमे नहीं कोई एहसास होता है नहीं कोई जज्बात ...लेकिन कई बार तो दिल्लगी ही दिल की लगी हो जाती है ..और पता ही नहीं चलता ..और फिर वो चोट सरे आम दिल को घायल कर जाती है ....मैंने नुसरत फ़तेह अली खान .की एक ग़ज़ल सुनिथी

तुम्हें  दिल्लगी  भूल  जानी   पड़ेगी  

मोहब्बत  की  राहों  में  आ  कर  तो  देखो ...

तडपने   पे  मेरे  न  फिर  तुम  हसो  गे

कभी   दिल  किसी  से  लगा  क़र  तो  देखो ...
....जितना ही प्यारा एहसास है ...उतना ही दर्द भी है ..इस अहसास मैं अगर
जिसमें दर्द न हो ..वो मोह्हब्बत किस काम की .....
 दर्द भी वही ...दवा भी वही ...
दुआ भी वही... दावा भी वही ...
मिलन भी वही ..जुदाई भी वही ...
ख़ुशी भी वही... गम भी वही ..
मगर उन्हें क्या पता जिन्होंने मुहोब्बत की ही नहीं ....
 ..........................इसी बात पे मुजे  कहीसे सुना हुआ एक किस्सा यद् आया है ...

            यह एक बहुत ही खुबसूरत मगर अंधी लड़की और उसके प्रेमी की बात है ...
 लड़की अंधी होने के कारन कोई उसे पसंद नहीं करता था मगर एक लड़के को उससे प्यार हो गया ..वो लड़की भी उसमे दिलचस्पी लेने लगी अंधी होने के बावजूद वो लड़का उसे अपनाने के लिए उत्सुक था ..मगर लड़की ने कहा अगर मेरी आँखे होती तो मैं भी तुमसे सादी कर लेती ..एक दिन किसीने अचानक उसे आँखे दान कर दी थोड़े  दिन बाद वोह देखने लगी .अब वो लड़की सब कुछ देख सकती थी ..दुनिया को देखने बाद ..एक दिन उसका प्रेमी उसके सामने आया .मगर वोह अँधा हो गया था ..लड़की ने उससे सादी करने से मना कर दिया ...बन्दा ...बिना किसी ..बात किये वहा से चल पड़ा ..मगर जाते जाते उसने कहा कोई बात नहीं तुम्हारी जिन्दगी मैं भगवन खुशियाँ  भरदे ..मगर हाँ मेरी आंखो का ख्याल रखना .....

आज  फेर  ली  उन्होंने  आँखे  हमसे ,

जो  हमपे  जान  निसार  करते  थे .

आज  नाम  लेते  भी  कतराते  हैं ,


जो  कभी  हमसे  मुहब्बते  इकरार  करते  थे .

मगर ....
क्या करे इसमे उनका भी कसूर नहीं ..


कुस्हुर  हमारी आँखों का ही है...  जो आज उनके पास है ..



क्या लगता है इस किस्से को पढ़के आप को ...इसमें समर्पण और त्याग भी दिखाई देता है ..और ..दूसरी तरफ से ...स्वार्थ ..भी ...
               .......दोस्तों लिखने के लिए तो बहोत कुछ है इस विषय पे मगर आज बस इतना ही .....


न  खुदा  दिल  बनता  न  किसीसे  प्यार  होता ,

न  किसीकी  याद  अति  न  किसीका  इंतजार  होता

 
यह ही  तो  करिश्मा  है  मोहब्बत  का ,

 वर्ना  पथरो को  ताजमहल  कौन  कहता ....

`




सोमवार, 12 सितंबर 2011

दिन हुआ है तो रात भी होगी,

दोस्तों   .......

एक दोस्त ने अपनी नोट मैं एक बहुत ही अच्छी रचना ..लिखी  थी मुजे कुछ ज्यादा ही पसंद आई ..
सो यहाँ पेश कर रहा हूँ ,मैं सिर्फ उसमे कुछ इमेज मिलकर पोस्ट कर रहा हूँ.




दिन हुआ है तो रात भी होगी,
हो मत उदास कभी तो बात भी होगी,
इतने....
प्यार से दोस्ती की है ..खुदा की कसम
जिंदगी रही तो मुलाकात भी होगी.

कोशिशकीजिए हमें याद करने की
लम्हे तो अपने आप ही मिल जायेंगे

तमन्ना कीजिए हमें मिलने की
बहाने तो अपने आप ही मिल जायेंगे
.
महक दोस्ती की इश्क से कम नहीं होती
इश्क से ज़िन्दगी ख़तम नहीं होती

अगर साथ हो ज़िन्दगी में अच्छे दोस्त का
                                                                         तो ज़िन्दगी जन्नत से कम नहीं होती....


सितारों के बीच से चुराया है आपको

दिल से अपना दोस्त बनाया है आपको

इस दिल का ख्याल रखना
क्योंकि इस दिल के कोने में बसाया है आपको .




अपनी ज़िन्दगी में मुझे शरिख समझन

कोई गम आये तो करीब समझना

दे देंगे मुस्कराहट आंसुओं के बदले
मगर हजारों दोस्तो में अज़ीज़ समझना .

हर दुआ काबुल नहीं होती ,
हर आरजू पूरी नहीं होती ,

जिन्हें आप जैसे दोस्त का साथ मिले ,
उनके लिए धड़कने भी जरुरी नहीं होती


रविवार, 11 सितंबर 2011

परिवर्तन संसार का नियम है

दोस्तों ..नमस्कार ..........
                  जब कभी भी ..यहाँ होते है ..न जाने कैसे कोई न  कोई ...विषय मिल ही जाता है लिखने के लिए ..
                     और कुछ न कुछ बदलाव भी आजाता है ...इस लिखावट मैं ...आप भी कभी प्रयत्न करे कुछ लिखने का ..आपके अन्दर के मौलिक विचार अपने आप ही आप के हाथसे ब्लॉग  पर उतर ही जायेंगे ..और आपके जीवन मैं भी कुछ न कुछ बदलाव भी जरूर आ ही जायेगा ...
                                    क्योकि ...परिवर्तन संसार का नियम है ...  और      जरूरी भी है ..अगर समय के अनुसार हम अपनी किसी भी बात मैं बदलाव नहीं ला पाते है ..तो ..हमें कुछ न कुछ मुस्किलो का सामना करना ही पड़ता है ....
                  कितना सारा बदलाव आ गया है ...सिस्टम मैं ...भी ...
       एक छोटीसी बात से सुरु करे तो ...आजसे पहले जब टेलीफोन ..मोबाइल ईमेल ..sms  की सुविधा नहीं थी तब हम ख़त के जरिये ...हम अपने सन्देश और अपने अच्छे या तो ....प्रसंगों के आमंत्रण भी भेजा करते थे ...
      और इन्ही खतो   के जरिये अपने जज्बातों को भी .. भेज देते थे ....ख़त आते ही कभी लोग अपनी ख़ुशी ज़ताते थे ..तो कही अपने दुःख को भी बाट लेते थे ...ख़त ही बात करने का  जरिया था .
ख़त  ही बोलता था ..और ख़त ही जवाब भी देता था ... लोग डाकिए का इन्जार करते रहते थे ...
    और आज इस ईमेल और sms के ज़माने मैं ..कभी मेल या sms कब आजाता है पढ़ा भी जाता है या फिर डिलीट कर दिया जाता है पता ही नहीं चलता ...
 फिर भी ...सोसिअल नेटवर्क का बेस्ट जरिया आज यही तो बना हुआ है ...इसी के जरिये हम आज जाने और अनजाने कितने ही लोगोसे अपने नए रिलेसन बना पाते है ...क्यों की परिवर्तन ही संसार का नियम है ...
...................ये तो हुई एक मामूली से बदलाव की बात ......
आप ध्यान से मन लगाकर सोचिये कितने सरे बदलाव हमें अपने  आसपास देखने को मिलेंगे ....तो ढूंढते रहिये ......... 

परिवर्तन मुझे कभी पसंद नहीं आया ,


यह बात अलग है के आदत पड़ ही जाती है कुछ रोज़ बाद ,

हम तो बदलना नहीं चाहते थे कभी ...मगर क्या करे ..
वक़्त ने ही कहा बदल जाओ ..फिर बदल ही गए अपने आप ..










क्योकि लोग कहते है की परिवर्तन ही संसार का नियम है ....

बुधवार, 7 सितंबर 2011

क्यों मेरा भारत बदल गया..

क्या  हो रहा है .....क्यों हो  रहा है ...कुछ समज मैं न ही आरहा है ...
 लेकिन हां हो जरूर रहा है .... ..
              और हम बस सहे जाते है ...क्यों की एक अजीब सी बीमारी हमें लगी हुई है ..क्या करे ..?
हमें बचपन से ही सहते रहने का शिखाया जाता है ...और हम जो भी बात जिसमे .दम की कोई जरूरत नहीं वो जल्दी ही सिख जाते है ....और उसका पालन भी अच्छे से करते है ...
 हां ..कुछ देर के लिए इस सब बातो का हल्ला भी करते है ..और जल्दी ही भूल भी जाते है ...? 
और इसी भूल भुलैया मैं कई बार तो हमारी या तो हमारे परिजन की मौत को भी हम कब   भूल  जाते है ......   वो  पता ही नहीं चलता ....
                           आज बड़े सहरो मैं जब कोई घर से निकालता है तो वो कब वापस आएगा... या तो आएगा या नहीं ...वह भी उसे या तो उसके परिवार को चिंता रहती है ...अगर वो किसी भी काम मैं भी अगर देर कर देता है तो उसके परिवार के लोग कुछ और ही सोचने लगते है ...ऐसा क्यों ...?
 .........अगर इसी बात को अगर हम अपने बारे मैं सोच कर चले तो ..क्या हो सकता है ...ये हमें पता चले गा ..
 अगर मैं खुद अपने बारे मैं लिखू तो ...जब भी मैं घर से निकलता हूँ ..तो मेरा बच्चा शाम को मैं जब घर लौटूंगा तब तक वो किशिना किशी बात को लेकर मेरी राह देखता होगा ...और घर जाते ही वोह मुझसे गले लगकर प्यार जताता है ...अगर मैं सामको न लौटा तो ....?...............
  मेरी पत्नी भी उसी तरह रोज मेरी राह देखती ..है ...मेरी माँ भी ..पापा भी और बहन भी ...ये केवल मेरी बात नहीं मैं यानी सभी ...आप भी ..और आपके सभी भाई बहन पापा .........और केवल ये हमारे देश मैं ही नहीं सभी जगह हो रहा है ...क्यों इन्सान ही इन्सान के खून का प्यासा हो रहा है ..?
                  सिर्फ अपना भय फ़ैलाने के लिए ...केवल डराने के लिए ...? कोई धर्म के नाम पर तो कोई जाती के नाम पर ..कोई देश के नाम पर तो कोई अपने शमराज्य के नाम पर खून की होली खेल रहा है ...बहूत दर्द होता है ...लेकिन इसका कोई इलाज भी दिखाई नहीं दे रहा ...
     हम भी जब भी ऐसा होता है तो अपने राजनेता को  जिम्मेदार ठहराके यतो सर्कार को दोषित करार करके कुछ समय तक हल्ला करके सांत हो जाते है ...और फिर जब चुनाव आता है तो हम भी उशी भीड़ मैं सामील हो जाते है ...और जाती और धर्म के नाम पर यतो हमारे स्वार्थ के नाम पर वोट  कर देते है ..और उसी वोट बैंक  को बचाने के लिए हमारे नेता फिरसे ...उसी तरीके से ..शासन चलाते रहते है ..कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाते जिससे उनके वोट बैंक पर असर हो ...
           क्या हम अपने पुरे १२५ करोड़ की आबादी वाले देश मैं से केवल ५४८ ऐसे लोग नहीं भेज सकते ...?
 जो इमानदार हो ..
जो अपने स्वार्थ से पर हो
जो बहादूर हो .
जो निडर हो
जो देशभक्त हो
जो इस सिस्टम को बदल शकने मै शक्ति मान हो ..
जो जाती धर्म ..से ऊपर उठके केवल हिन्दुस्तानी हो ...
 जब भी हम ये कर पाएंगे तो ...अवस्य ही इसका बहूत ही अच्छा परिणाम हमें मिल जायेगा ...
अगर न कर पाए तो फिर ..किसीने ठीक ही कहा है ..

ऐ  मेरे  हमनशीं  चल  और कहीं

 
इस  चमन मैं अब  अपना  गुजारा  नहीं  

बात  होती  गुलों  तक तो सह  लेते  हम  

अब तो काँटों  पे  भी हक  हमारा  नहीं..   

`

जो  लड़ा  था  सिपाहियों  की  तरह

ऐसा  भारत  में  कोई  बादशाह  न  हुआ

रूह  तो  हो  गयी  थी  तन्न  से  जुदा

हाथ  तलवार  से जुदा न हुआ..   

`

कुछ  हाथ  से उसके फिसल  गया    

वह  पलक  झपक  कर निकल  गया 

फिर  लाश  बिछ  गयी लाखों  की 

सब  पलक झपक कर बदल गया    

जब  रिश्ते  राख  में  बदल गए  

इंसानों  का दिल  दहल  गया 

मैं  पूछ  पूछ कर हार  गया  


....
        


शनिवार, 3 सितंबर 2011

..राह और मंजिल

कई दिनों  से सोच रहा हूँ.....लेकिन कुछ मिल नहीं रहा  ......क्या .....?


  ............................अरे यार आपके ही लिए कुछ ऐसा विषय ...जिसके बारे मैं आप भी सोचने पे मजबूर .हो जाये ..और न चाहते हुए भी आप ...उस पर कुछ न कुछ  कोम्मेन्ट करने पे मजबूर हो जाये .....लेकिन क्या करू गोस्तो ...ऐसा कोई विषय ही नहीं मिल रहा ...फिर भी एक प्रयास करता हूँ ...अगर पसंद आये तो कम से कम एक कमेन्ट की आश तो रख ही सकता हूँ...........

      ...........हम लोग ..अपनी  भावना  को कितना दबाते रहते है ...?कभी खुलके हम किसीको भी कुछ कह पाते है ? ..जो भी अन्दर होता है क्या हम वो ..बहार भी पेश कर पाते है ....?
......कदाचित नहीं ... लेकिन क्यों ऐसा नहीं कर पाते है ..क्योंकी हम किशी की भी भावनाओ को ठेश नहीं पहोचाना चाहते ...या तो हम खुद उस बात को कुछ न कुछ तरीके से गलत समजते है ..हमारी रूह उस बात को करने से हमें मना कर देती है ..और. हम अपने जजबातों को अन्दर ही दबा देते है ...और ज्यादा तर हम अपने ख्यालो को किसीसे छुपाते रहते है ...
               ........जैसे हम किसीको कुछ ज्यादा ही पसंद कर रहे है ..हमारे जज्बात हमें किसी की और खीचते ही चले जाते है .फिर भी हम उस बात का खुलके इकरार नहीं कर पाते ...
 किसी की बाते हमें बेहद पसंद आती है फिर भी हम खुलके अपने एहसास व्यक्त नहीं कर पाते ..हमें पता होता है ...फिर भी हम कुछ कह नहीं पाते ...ऐसा क्यों ..?
...............उसी तरह ...कई बार एसा भी होता है ..किसीकी कोई भी बात हमें जिसमे कुछ भी पसंद नहीं आती है ..दिल से हम उससे दूर ही रहना चाहते है ..फिरभी हमें उसके बारे मैं न चाहते हुए भी ..मुस्कुरा कर ..नकली एहसास जाताना पड़ता है ...क्यों ..?
.......................... क्या ..ऐसा नहीं होता है ..?क्या आपके साथ भी ऐसा कभी न कभी हुआ है ..?
 .........और इसी बात के कारण कई  बार  तो .हमारी जिन्दगी की  ..राह और मंजिल.. दोनो  ही  
बदल जाती है ....और जब भी ...कुछ समय बाद ..जब हम उसके बारे मैं सोचते है ...तो हमें भी कई बार ..एसा लगता है ..फिर भी हमें किशी न किशी कारण हमें अपने जज्बातों को दबाना पड़ता है ...
  इसी बात को लेकर हम अगर कुछ ज्यादा ही सोचे ...और देखे तो ..भावना ओको लेकर सही बात को छुपाने यतो दबाये रखने से कई बार तो पुरे देश का ...भविष्य बदल जाता है ..अगर ..
 गांधीजी ने अपनी भावना ओको दबाकर दिल की सुनी होती तो ....?
अगर ..
    सरदार पटेल ने गांधीजी की भावनोको न देखकर अपने दिल की सुनी होती  तो ... ?
अगर ...ऐसी तो कई बाते है ..जो इसी दबाव के  कारण कितने ही ............हुई है ..और इसका अच्छा यतो बुरा परिणाम आज किसी न किसी को ..भुगतना पड़ता है ...
 फिर भी दोस्तों ...

चेहरे  की हंसी  से हर  गम  छुपाओ ,   ..........               


बहुत  कुछ बोलो  पर  कुछ न बताओ ,  


खुद  न रूठो  कभी  पर सबको  मनाओ , 

राज़  है ये  जिंदगी  का बस  जीते  चले  जाओ.............

 

.. 

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

जनता की दर्द वाली नब्ज़

आज से लेकर .......ये पूरा साल .... 
   चारो तरफ ..जहा देखो वहा ..भ्रस्टाचार ...घोटाले ...और देश  की बहुत सी तकलीफों के बारे मैं बातें हो रही है ...
 ..........................और हर बार कुछ नया होने की उम्मीद भी जग जाती है  ...लोगो मैं ...क्योकि अन्नाजी हो या बाबा रामदेव ...जो भी इस बात को छेड़ता है लोग उसके समर्थन मैं जुट जाते है ...
क्योकि ......... यह सही मैं ...जनता  की दर्द वाली नब्ज़ है ..और कोई भी अगर हमारी दर्द वाली नब्ज़ पर हाथ रखेगा ...तो यही होगा ....और होना भी चाहीये ....लेकिन क्या है इस दर्द ...का ...कायमी इलाज...? वो हम ढूंढ़  रहे है .. मगर ...कही दूर दूर तक ..नज़र नहीं आ रहा ...ऐसा है क्या...?
लगता भी ऐसा ही है ...लेकिन क्या करे प्रयाश तो करते रहना पड़ेगा ....वर्ना ..?
...........................हम भी ...जब जब कोई ..इस बात को  पकड के आगे चलने वाला होता है तब तक ही ..पीछे रहते है लेकिन जब ..आगे वाला एक चला जाता है या तो .समर्पण कर देता है तो ..हम तो इस बात को ही भूल जाते है ..के कोनसे दर्द को मिटने लिए हम सब साथ थे ....यही होता हैं ना..?क्या मैं गलत बोल रहा हूँ..........कही हमें ऐसा नहीं लगता ..की कोई भी आकर हमें थोडासा झूठा ही सही दिलासा दे जाये तो हम अपने दर्द को भूल जाते है ...कब तक चलेगा ये सब ...क्या हम कभीभी अपने दिमाग से आगे नहीं बढ़ सकते ....जब हमारी एकता की वजह से एक आदमी के सामने पूरी सरकार झुक  सकती है ....तो ये एकता और क्या नहीं कर शकती....?
 ये तो हुई ...हमारी ...बात ...
   लेकिन क्या ये लोकपाल हो या कोई और किसी  ज़टिल कानून के बन जाने से ये सभी दर्द जिसकी हम हर बार चर्चा करते है उससे मुक्ति मिल पायेगी ...
                           लेकिन हां मेरे पास एक आईडिया है जो कम से कम ये पैसो वाला भ्रस्ताचार को बे नकाब कर शकता है .....हलाकि मैं खुद बहुत आम आदमी हूँ ..इस लिए हमारी बात ..तो कोई ...ध्यान भी नहीं देगा ..फिरभी आप तो मेरे दोस्त है इसलिए आपसे तो उम्मीद रख सकता हूँ..केवल ... सोचने के लिए ...?
            मेरा सिर्फ पञ्च मुद्दीय कार्यक्रम है ...
१.   हमारी करन्सी मैं से ५०० ..और १००० रुपये के नोट वापस लिए जाये ...
२. रुपये १००० से ज्यादा का कोई भी व्यहवार केवल बैंक से चेक या नेटबैंकिंग   के द्वारा ही हो ..
. चेक से भी ..जोभी पैसा दिया जाये  उसका पूरा विवरण चेक मैं किया जाये ..
३ .भारत के सभी नागरिक  की ..सम्पति का पुरे  विवरण के साथ घोषित  किया जाये .और उसकी पूरी जानकारी डिपार्टमेंट को दी जाये ..हर साल उसमे बढौती या कटौती का ब्यौरा लिया जाये ...
४. चार यतो पञ्च महीने मैं जो भी नोट ५०० ....और १००० के हो वो बैंक मैं जमा किये जाये ...
५. जो भी  कालाधन यानि ब्लेक मोनी है उसपर केवल २० या तो २५% लगा कर उसे .जायज़ करार कर दिया जाये ...और इसके लिए समय मर्यादा दी जाये ..उस समय के बाद जो भी कला धन हो उसे जप्त किया जाये ..
 6 . और इस समय के बाद किसी   भारतीय नागरिक के पास 10000 रुपये se ज्यादा अगर नकदी पर प्रतिभंध लगाया जाये और उस पर सख्त कानून बनाया जाये ...
  ..अगर सिर्फ और सिर्फ ..इतना ही किया जाये तो ..भ्रस्ताचार अपने आप ही बेनकाब हो जायेगा ....
और इससे और भी कई दर्द  जैसे अपहरण ... फिरौती ..लूट ..चोरी .नकली नोट... से   भी हमें राहत  मिल शक्ति है ....  क्योकि कोई  अपहरण  करता है तो  फिरौती   के पैसे .. चेक सेतो नहीं  ले  पाए गा...
        साथ  साथ मैं सही . गरीब . जो सही मैं जरूरियात मंद है उनका भी पता चल जायेगा ..
 हां इसके लिए हमारे बैंक सिस्टम मैं बहुत ज्यादा बदलाव लाना होगा ...वैसे भी हमारे बैंक बहुत आधुनिक तकनीक ..कर रहे है ...तो ये तो बड़ा आसान है ...
इसमे भी ..खुछ ना कुछ खामी हो सकती है ..या तो परेसनिया भी हो सकती है मगर ..इस पञ्च मुद्दों को लेकर अगर हमारे बुध्धि जीवी ..या तो अर्थ शास्त्री ..अगर कोई नया ...प्रोजेक्ट पेश करते है तो जरूर ..रिजल्ट मिल शकता है
                          मगर ये तो हमें उलज़ाने के लिए वोट बैंक की राजनीति हो रही है . और हम भी नए नए कानून जो हमें और भी उल्ज़ाते रहे उसके लिए ही लड़ते रहते है ..उसीका तो सब लाभ लेते रहते है ...सभी लोग ..

अगर ..आपको मेरा ...विचार  अच्छा लगे तो जरूर  से शेयर करना अपने  दोस्तों के साथ .........क्योकि ..एक नयी क्रांति की लहर जब तक नहीं उठेगी तब तक हम उलज़ते ही रहेंगे ....
तारों  में  अकेला  चाँद  जगमगाता  है,

मुश्किलों  में अकेला इंसान  ही डगमगाता  है,   


कांटो  से  मत  घबराना  मेरे  दोस्त ,


क्युकी  काँटों  में ही एक  गुलाब  मुस्कुराता  है..   ......