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रविवार, 24 जुलाई 2011

प्रेम ...और ...विवाह

नमस्कार मित्रो ......
 बहुत ही अच्छा विषय मिला है आज बात करने को ... ..गूढ़  ...और ..गंभीर  विषयो पे बात करते हुए आज
एक दोस्त के पोस्टिंग से मुझे एक बहुत ही रोमांचित  विषय पर बात करने का मौका मिला .....
प्रेम ...और ...विवाह .... और प्रेम विवाह .....

       आज तो यह सब्द सामान्य हो गया है ...क्योकि .....सब को अच्छा भी लगता है ...किसको अच्छा नहीं लगेगा ...क्यों..?गलत बोलरहा हूँ....
 ....दुनिया मैं सभी को अरे पशु और पक्षी ओ को भी कोई उससे प्रेम करे वो अच्छा  ही लगता है ...
लेकिन आज प्रेम का मतलब ही बदल चूका है ....लोग किशी से भी प्रेम करे तो ..उसको पा लेने को ही प्रेम कहते है ... अगर वो नमिले तो.... ..एक दोस्त ने अपने पोस्टिंग मैं बहुत ही अच्छा संवाद लिखाथा ...जिससे प्रेम  की पूरी परिभासा मिलजाती है...
एक बार राधा से श्रीकृष्ण से पूछा - हे कृष्ण ! तुम प्रेम तो मुझसे करते हों परंतु तुमने विवाह मुझसे नहीं किया , ऐसा क्यों ? मैं अच्छे से जानती हूं तुम साक्षात भगवान ही हो और तुम कुछ भी कर सकते हों , भाग्य का लिखा बदलने में तुम सक्षम हों , फिर भी तुमने रुकमणी से शादी की , मुझसे नहीं।


राधा की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया - हे राधे ! विवाह दो लोगों के बीच होता है। विवाह के लिए दो अलग-अलग व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। तुम मुझे यह बताओं राधा और कृष्ण में दूसरा कौन है। हम तो एक ही हैं। फिर हमें विवाह की क्या आवश्यकता है। नि:स्वार्थ प्रेम, विवाह के बंधन से अधिक महान और पवित्र होता है। इसीलिए राधाकृष्ण नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति हैं और सदैव पूजनीय हैं। ......
 आज इतना ही .... मिलते है ....                               
                                  आपका ही रोहित पंड्या ...

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