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बुधवार, 19 सितंबर 2012

रिटेल का होलसेल विरोध

रिटेल का होलसेल विरोध
    क्या हो रहा है .....आज भारत बंद ......सभी  पार्टी बंद को समर्थन करती है .......और दूसरी तरफ
से वही लोग सरकार का समर्थन भी करते है ...सोनियाजी की सरकार  पुरे देश को सिर्फ 6 सिलिंडर देना चाहती ..है ..और वही  सोनियाजी कोंग्रेस शाशित राज्यों मैं 3 सिलिंडर का दान करती है ..कैसी नीतिया चला रही है ....हमारी सरकार ......... फिर भी यही चलेगा .......क्यों ............???????????????????????????????????????????????????????????????
    इसी सवाल का उतर ढूंढ़ते  हुए हमें करीबन 65 साल तो लग ही गए ...और ..कितने नए सवाल पैदा भी कर दिए .....???????
                जो एक उम्मीद बनकर   सामने आये  थे ..आज  वोह भी ...................??? ???? एक प्रश्नार्थ  बनकर  रह गए है .....



15 अगस्त 1947 से पहले हमारा शासन अंगेजो के कायदे कानून और उनकी ही निगरानी मैं चलता था ..और 15 अगस्त 1947 के बाद मैं कायदे कानून तो रहे मगर जो उनकी निगरानी थी वोह उठ गयी ..और उनकी जगह हमें लोकशाही मतलब हमारे अपने चुने हुए लोगो की निगरानी मैं उन्ही कायदों का लाभ  हम  ले रहे है ....कितना लाभ मिला ये तो जिनको मिला है वही  कह ...सकते है ...........

आज की तारीख मे ,
Photo

१) २५ करोड़ भुखमरी के कगार पर

२) ५० करोड़ लोग ग़रीबी रेखा के नीचे

३) हर साल, करोड़ो बच्चे ५ साल की उम्र तक, कुपोषण से मरते बच्चे

४) करोडो माए सुरक्छित प्रसूति की व्यवस्था ना होने से मर जाती है

५) करोड़ो लोग basic & higher...education से वंचित है

६) कई लाख स्कूल बिना टीचर के चल रहे है


७) कई करोड़ हर साल डॉक्टर और दवाए नही मिलने से मर जाते है

८) शहरो के अंधाधुन बढ़ते आधुनिकीकरण के कारण बढ़ते प्रदूषण की वजह से करोडो लोग हज़ारो बीमारिओ के गिरफ़्त मे

९) मजबूरी मे करोड़ो मज़बूर स्त्रिया वेस्या-वृत्ति के दलदल मे

१०) करोडो बालमजदूर
Photo: आज की तारीख मे ,
१) २५ करोड़ भुखमरी के कगार पर
२) ५० करोड़ लोग ग़रीबी रेखा के नीचे 
३) हर साल, करोड़ो बच्चे ५ साल की उम्र तक, कुपोषण से मरते बच्चे 
४) करोडो माए सुरक्छित प्रसूति की व्यवस्था ना होने से मर जाती है
५) करोड़ो लोग basic & higher education से वंचित है
६) कई लाख स्कूल बिना टीचर के चल रहे है 
७) कई करोड़ हर साल डॉक्टर और दवाए नही मिलने से मर जाते है 
८) शहरो के अंधाधुन बढ़ते आधुनिकीकरण के कारण बढ़ते प्रदूषण की वजह से करोडो लोग हज़ारो बीमारिओ के गिरफ़्त मे 
९) मजबूरी मे करोड़ो मज़बूर स्त्रिया वेस्या-वृत्ति के दलदल मे 
१०) करोडो बालमजदूर 
११)करोड़ो लोगो की पहुच से दूर होती उच्च-शिक्षा 
१२) करोड़ो लोग नशा-खोरी के गिरफ़्त मे 
१३) हर साल दंगे मे लाखो मारे जाते लोग 
१४)किसानो की दिन-ब-दिन बढ़ती आत्महत्याए 
१५) नीजिकरण के नाम पर उद्योगपतियो को कौड़ियो के दाम पर बिकती सरकारी संपत्तिया 
१६)संस्कृति / परंपरा के नाम पर दहेज के दबाव मे मरता करोडो परिवार 
१७) धर्म के नाम पर लूटते करोड़ो लोग 
१८)अंधविस्वास के दलदल मे फसते नादान मूर्ख लोग 
१८) उदारीकरण / नीज़ीकरण / वैसवीकरण [liberalisation /privatisation /globelisation ] के नाम पर multinational companies & corporate world के हाथो बिकते ज़मीन और लोग=============लिस्ट बहुत लंबी है ,,खैर छोड़िए ....... BharatPress

११)करोड़ो लोगो की पहुच से दूर होती उच्च-शिक्षा

१२) करोड़ो लोग नशा-खोरी के गिरफ़्त मे


१३) हर साल दंगे मे लाखो मारे जाते लोग

१४)किसानो की दिन-ब-दिन बढ़ती आत्महत्याए

१५) नीजिकरण के नाम पर उद्योगपतियो को कौड़ियो के दाम पर बिकती सरकारी संपत्तिया

१६)संस्कृति / परंपरा के नाम पर दहेज के दबाव मे मरता करोडो परिवार


१७) धर्म के नाम पर लूटते करोड़ो लोग

१८)अंधविस्वास के दलदल मे फसते नादान मूर्ख लोग

१८) उदारीकरण / नीज़ीकरण / वैसवीकरण [liberalisation /privatisation /globelisation ] के नाम पर multinational companies & corporate world के हाथो बिकते ज़मीन और लोग=============लिस्ट बहुत लंबी है ,,खैर छोड़िए .......          



Photo: wait ........ wait ........... wait ................. for whats ...?
for next election.?
for next pm...?
for next super pm...?
or ......................for next ..............?????????????
भारत की सरकार ने 1952 से एक पंचवार्षिक योजना शुरू की जो औसतन 10 लाख करोड़ का होता है। अभी तक हमारे देश में ग्यारह पंचवार्षिक योजनायें लागू हो चूकी हैं, मतलब अभी तक हमारी सरकार 110 लाख करोड़ रूपये खर्च कर चूकी है और गरीबी, बेकारी, भुखमरी रुक...ने का नाम ही नहीं ले रही है । अंग्रेज जब थे तो ऐसी कोई योजना नहीं थी इस देश में क्योंकि वो विकास पर कुछ भी खर्च नहीं करते थे और तब हमारी गरीबी नियंत्रण में थी लेकिन जब से हमने पंचवार्षिक योजना शुरू की हमारी गरीबी भयंकर रूप से बढ़ने लगी और बढती ही जा रही है कहीं रुकने का नाम ही नहीं ले रही है । अगर भारत सरकार उन पैसों को (जिसे उसने इन पंचवार्षिक योजनायों पर खर्च किया) सीधा हमारे लोगों को बाँट देती तो आज एक-एक भारतीय के पास नौ-साढ़े नौ लाख रूपये तो होते ही (मैं एक आदमी की बात कर रहा हूँ एक परिवार की नहीं) और सभी भारतीय कम से कम लखपति तो होते ही। See More...............................

               .                               इस हालत मैं हमें क्या करना चाहिए ...तो इसके बारे मैं मैंने एक ब्लॉग पढ़ा था जो पूरा यहाँ पेस्ट कर रहा हूँ।।।।
वर्तमान हालात और युवाओं की जिम्मेदारी



चुनौतियाँ हर सदी में अलग-अलग होती है
विश्वक्रांति एवं सांस्कृतिक सदभाव का संवाहक देश आज आतंकवाद और नक्सलवाद के विस्फोटों के समस्याओं से ग्रस्त है
दूसरी बड़ी समस्या है घुसपैठ एवं उसके कारण हो रहे जातीय-सांप्रदायिक हिंसा जो देश की अखंडता के लिए खतरा बना हुआ है
बहार देश से जो घुसपैठिये आते हैं और वो युवाओं के हक़ को भी मार जाते हैं
आज समूचा राष्ट्र भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है
कभी विश्वगुरु के नाम से विख्यात भारतवर्ष आज विदेशियों के सामने भिक्षापात्र लेकर भटक रहा है
भ्रष्टाचार के कारण आज युवावर्ग को रोजगार नही मिल रही है
आज सम्पूर्ण समाज नेत्रित्वाहीं हो गया है
राजीनीति भ्रष्टाचार एवं अपराध का पर्याय बन गया है और राष्ट्र के पुनर्निर्माण का लक्ष्य अँधेरी गलियों में गूम हो गया है
राष्ट्रीय असंतोष, अव्यवस्था, आज देश की रुग्ण में स्थिति को दर्शा रही है
देश में व्याप्त इन चुनौतियों से निपटारा हेतु युवाओं को अपने मन से निराशा एवं हताशा निकाल देना चाहिए
अपनी शक्तियों पर अपनी छमता एवं प्रतिभा अटूट विश्वास जगाना होगा
ठीक उसी प्रकार जैसे “नेपोलियन” ने कहा था की “असंभव” शब्द उसकी शब्दावली में है ही नही इस प्रकार के आत्मविश्वास दृढ़तापूर्वक स्थापित करने पर ही युवा वर्तमान चुनौतियाँ का सामना करने में सफल हो सकेंगे, या फिर हमें अगर वर्तमान चुनौतियों का सफलतापूर्ण सामना करना है तो युवाओं के आदर्श पुरुष स्वामी विवेकानंद के बात को आत्मसात करना होगा
उन्होंने कहा था की इंग्लैण्ड में राजीनीतिक सत्ता ही उसकी जीवन शक्ति है परन्तु भारतवर्ष में धार्मिक जीवन ही राष्ट्रीय जीवन का केंद्र है
अगर हम 100 वर्ष कही गई इस बात को गौर से देखें तो ऐसा लगता है कि आज जो हमारी स्थिति है और जो चुनौतियाँ हमारे सामने आ रहे हैं उसका कारण है कि हम अपने धर्म पथ से भटक गये हैं, अपनी संस्कृति एवं परम्पराओं कि उपेक्षा करने लगे हैं
धार्मिक जीवन के द्वारा ही हम स्वयं को उन्नति के मार्ग पर ले जा सकेंगे
वर्तमान चुनौतियां का सामना करने हेतु हम युवाओं को साथ में आगे बढ़ना होगा तब संभव है कि आगे चलकर और भी लोग साथ आयेंगे


इन चुनौतियों से जूझने का, कष्ट सहने का, कठोर परिश्रम का साहस ही हमें सफल बनाएगी तभी राष्ट्र के वर्तमान चुनौतियों का सामना कर सकेंगे
हमेशा राष्ट्रीय गौरव कि सुरक्षा के लिए युवाओं ने ही कदम बढ़ाएं हैं
संकट चाहे सीमाओं का हो या संकट सामाजिक एवं राजनितिक इसके समाधान के लिए अपने देश के युवाओं ने सर्वस न्योछावर करने में कोई कसर नही छोड़ी
देश का स्वतंत्रता संग्राम इस बात का साक्षी रहा है
सन 1857 से लेकर 1947 तक राष्ट्रभक्ति एवं क्रांति के भावों का आरोपण करने वाले युवाओं कि भूमिका अग्रणी थी
इस देश के सबसे महान एवं युवा क्रांतिकारी खुदीराम बोस ने मात्र 18 वर्ष के आयु में 11 अगस्त सन 1908 में देश के आजादी के लिए फांसी पर चढ़ गए
फांसी पर चदते वक़्त उनका उदगार था:-

हांसी-हंसी चाड्बे फांसी, देखिले जगतवासी,
Photo
एक बार विदाय दे माँ, आमी धुरे आसी



अर्थात दुनिया देखेगी और मैं हँसते-हँसते फांसी पर चढ़ जाऊंगा, हे भारत माँ मुझे विदा दो, मैं बार-बार तुम्हारी कोख से जन्म लूँगा, और ऐसे महान क्रांतिकारी से प्रेरणा लेकर और आत्मसात कर वर्तमान चुनौतियों के साथ संघर्ष में लग जाना चाहिए।।।।।।।।।।।।
 






मंगलवार, 11 सितंबर 2012

नेत्रदान करे किसीकी जिंदगी को रोशन करे""""""

नेत्रदान ... महादान
 बहुत ही सटीक विषय आज मिला है .
....आँखे ...नज़र....     निगाह
  आज से कुछ साल पहले मैंने एक गाना सुनाथा ..
           ......इस जहा की नहीं ये तुम्हारी आँखे
             ....आसमान से ये किसने उतारी आँखे ....
                       ऐसे तो कई गीत आँखों .के सन्दर्भ मैं हमने सुने है ..
                         .मगर क्या कभी आपने किसी सूरदास यतो जिसको प्रभु  ने इस नायाब चीज़ से दूर रखा है ....... उनके दर्द की या  उनकी इस कमी का एह्शाश किया है ?.....और ..क्या ..हमने किसी ऐसे इन्सान की ख़ुशी का एहसास किया है जिसको किसीके नेत्र दान से प्रभु इस अलौकिक चीज़ का आनंद मिला है ...तो आज मैंने एक बहुत ही सुन्दर पोस्ट पढ़ी है ..जो मैं यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ .अगर ...............................................................किसी एक के भी दिल को छू जाएँ ................



एक 18 से 19 साल का लड़का ट्रेन मैं खिड़की के पास वाली सिट पर बैठा था ....
 अचानक वो जोर से चिल्लाया और  बोला देखो पिताजी पेड़ पीछे जा रहे है ."..
  उसके पिता ने उसके सर पर हाथ फिराया ....वो लड़का फिर चिल्लाया " पिताजी वो देखो आसमान मैं बदल भी ट्रेन के साथ चल रहे है ....पिताजी की आँखों से अंशु निकल आये ...पास बैठा आदमी ये सब देख रहा था .उसने कहा आपका बेटा इतना बड़ा होने के बावजूद ..क्यों ....?इसको किसी अच्छे डाक्टर को दिखाओ ............??????????
              तो उसके पिता जी ने कहा ... हल ही मई हाँ उसको डाक्टर के पास से ही ला रहे है ...कुछ दिन पहले ही उसको किसी भले इन्सान की आँखों का दान मिला है ..और कल ही उनकी आँखों से ये देख सकता है ..................मेरा बेटा जनम से अँधा था ...मगर आज पहली बार वो ....................????????????????
           इतना कहते हुए उसके पिता की आँखे नम  हो गयी .......
       """""""""   नेत्रदान करे किसीकी जिंदगी को रोशन करे"""""" ..
               

बुधवार, 15 अगस्त 2012

15 अगस्त 1947 स्वतंत्र दिवस

आज हमारा भारत
                                    स्वतंत्र दिवस मना  रहा है .....आजसे करीबन 66 साल पहले हमें स्वतंत्रता दी गयी थी ... किससे क्या हम जानते है ....?  हमें कहा जाता है की हमें अंग्रेजो ने गुलाम बनाये रखा था ... और उनसे हमें    15 अगस्त  1947 को स्वतंत्र किया गया ... यही बात हमें बताई गयी है न ...!और यही बात हम मानते भी है ....और देखने जाये तो ये सच भी है ..क्योंकी 15 अगस्त 1947 से पहले हमारा शासन अंगेजो के कायदे कानून और उनकी ही निगरानी मैं चलता था ..और  15 अगस्त 1947 के बाद मैं कायदे कानून तो वहि   रहे मगर जो उनकी निगरानी थी वोह उठ गयी ..और उनकी जगह हमें लोकशाही मतलब हमारे अपने   चुने हुए लोगो की निगरानी मैं उन्ही कायदों का लाभ मिलाने लगा ...यानि ......
            हम अंग्रेजो की गुलामी से छूटकर ...अपने ही राजनेता ..जो की करीबन वंस परंपरागत ही चले आये उनके .............................................. हो गए .....(बिच मैं जो जगह राखी है वो आप खुद ही भर ले,..). .और उसी स्वतंत्रता का हम जोर शोर  से उत्सव आज यानि 15 अगस्त को हर साल मानते है ...कई रंग रंग कार्यक्रम करते है ...शहीद  और स्वतंत्र सेनानी ओ को याद  भी करते है ...
और हर साल हम अपनी एक नयी गुलामी !!!!!!!अरे माफ़ करना स्वतंत्रता  को और ज्यादा सहने की शक्ति प्राप्त करते है ..मैं आप सब से माफ़ी चाहता हूँ .....अगर कुछ गलत लिख दिया हो तो ...
मगर हां मुजे तो यही सच लगता है ....और वही  लिख दिया .....
                  क्या सच मैं जिन्होंने अपने प्राणों की आहूति हमें स्वतंत्रता दिलाने के लिए दी थी ..वो क्या ऐसी स्वतंत्रता ..चाहते .थे ..

रविवार, 12 अगस्त 2012

अन्नाजी ने तो उनकी अन्ना पार्टी के साथ देश को हथेली मैं चाँद दिखाकर ..

its  happen only in         india ........????????????????????
                                               but whats ....? if we think ....we always confused ...why ...? bcuz.. we r  always ..only........ wait for a new leader ..????? today ...annaji ......or .....ramdev baba ....yesterday
 more baba ..more..... annaji/.... tomorrow ..new baba or new annaji .... ..........................................
                  ....but no one change the module ....  why ...?  ...........................................................................................................
                                bcuz we have no idieology .or stratagy  for  change the module .......
        today baba  is on stand to .....but... he have also not right stratagy ...for fight against this module ..he also think about what will he do ...????    ...after some time ....
                 some time he give time to govt ...? after some time he chalange to govt ... but for what ....? we dont know ...
          after all if we all people of india ...dont think or dont work on our right think...do not be happen or chage the module ......only wait ....wait ... & wait ....only wait ..............................

             अन्नाजी ने तो उनकी अन्ना पार्टी के साथ देश को हथेली मैं चाँद दिखाकर .. निराश कर दिया ....
श्री बाबा रामदेवजी  महाराज ...
 अगर ...आज फिर एक शो ख़त्म हो गया .. तो ...
  एक नयी ही उम्मीद के साथ ...और एक नया नारा ...कांग्रेस हटाओ देश बचाओ .....फिर से एक और इंतज़ार 2014 के चुनाव का ...बस सिर्फ शक्ति प्रदर्शन ..कोई नतीजा नहीं ....भीड़ जुटाली ...अपनी शक्ति देश के सामने दिखादी ...और ख़त्म ....कितने समर्थक है हमारे साथ .. अगर वही दिखाना है ... तो इतना बड़ा तमासा क्यों ...? क्या आपको पता है हर एक नए आन्दोलन से लोग कितनी उम्मीद लगाये बैठे होते है ....?



और क्या आप उनकी उम्मीद पर खरे उतरते है ....?हर बार यही निराशा ...कोई नतीजा नहीं ...क्यों गुमराह करते रहते हो ..आम लोगो को ..क्यों उनका समय और बर्बाद करते हो ...



क्या आप जानते हो अगर ऐसे ही आप हर बार करते रहे तो ..हर बार जो एक नयी उम्मीद के साथ लोग आपके समर्थन मैं



जुट जाते है .वो फिर कभी नहीं आयेंगे ...क्यों की आज हर एक आदमी परिणाम चाहता है ..और इंतज़ार करने को कोई तैयार नहीं है .... .....
          अभी  आप के पास वक़्त है आज के दिन का क्योकि आप अभी भी डटे  हुए है ...इस लिए हम आपके साथ है मगर अगर आज आपका ये आन्दोलन बिना किसी ठोस नतीजे के खत्म कर दिया तो .......................???????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????
 ये आपको ही सोचना है ............
            और अगर ...आज आप जैसे पञ्च दिन से कहते आये है वैसे ही अगर ..महा क्रांति ..करते है तो आप को पूरा  भारत देश कोटि वंदन करेगा ...
                                          बहुत ही जन सामान्य  भाषा मैं ये बाबाजी को निवेदन किया है ....अगर आपको भी लगे के यह सही है तो जरूर  से   शेयर करे .......

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

જ્ઞાન શક્તિ અને તેનું જીવન માં મહત્વ .....

જ્ઞાન શક્તિ  અને તેનું જીવન માં મહત્વ .....
            ખુબજ  સરસ અને વિચારણીય ..વિષય છે ... અને આજે આ ..વિષય વિષે મને જયારે બોલવાની તક મળી છે ત્યારે ..પ્રથમ તો હું .જ્ઞાન અને શક્તિ ..બંને વિષે આપને થોડું .....જ્ઞાન  એટલે કે કેળવણી ..અર્થાત શિક્ષા ...અને શક્તિ ...એટલે કે બળ ..તાકાત ..પ્રભાવ ...જ્ઞાન શક્તિ અર્થાત ..કેળવણી ..   શિક્ષા  .... નું  બળ ..તાકાત ..પ્રભાવ ..


          માણસની ઘણીખરી કેળવણી, મુખ્ય કેળવણી તો એના બચપણમાં જ પૂરી થાય છે. બાળકનું ચારિત્ર્ય ઘડાય છે તે તો મા-બાપના ખોળામાં, ઘર-આંગણની રમતોમાં અને શેરીના બાળગોઠિયાઓની સોબતમાં… બાળશિક્ષણતો છે માણસના હૃદયમાં ફૂટી નીકળતો શૂચિ વાત્સલયનો ફુવારો. બંગાળીમાં એક પંક્તિ છે : ‘પ્રિયતમ ખોકા રે આમાર’ અમારો પ્રિયતમ છે બાળક. બાળકની કેળવણીનું માધ્યમ શું, સાધન શું ? અહીં તો સાધન અને સાધ્ય એક જ છે. બાળકને આનંદ દ્વારા કેળવવાનું છે, અને કેળવણી દ્વારા એના-આનંદ-સ્વરૂપને વ્યક્ત થવા દેવાનું છે. (ઉમાશંકર જોશી)




           શિક્ષણના ત્રણ પાયાના સિદ્ધાંતો છે. પહેલો એ છે કે બાળકને કંઈ જ શીખવી શકાતું નથી. તે બધું જ જાતે શીખે છે. શિક્ષણનું કાર્ય બાળકના મગજમાં કોઈ પણ ચીજ ઠોકી બેસાડવાનું નથી પણ માત્ર મદદનીશ અને માર્ગદર્શક બનવાનું છે. બીજો સિદ્ધાંત એ છે કે બાળકના વિકાસની બાબતમાં તેના અભિપ્રાયને સર્વોચ્ચ પ્રાધાન્ય આપવું જોઈએ. કોઈ વાલી અને શિક્ષક કોઈ વિદ્યાર્થીને બળજબરીથી કોઈ વિષય ભણાવવાની કોશિશ કરે તેનાથી બાળકના માનસને સુધારી ન શકાય તેવું નુકશાન થાય છે. ત્રીજો સિદ્ધાંત એ છે કે શિક્ષણમાં પ્રત્યક્ષ અનુભવને સૌથી વધુ મહત્વ આપવું જોઈએ. વિદ્યાર્થીને જે છે ત્યાંથી શરૂ કરી જે હોવું જોઈએ ત્યાં સુધી લઈ જાય તે જ ખરો માર્ગદર્શક. (શ્રી અરવિંદ)

             કેળવણીનું પણ એવું છે. પહેલાં પ્રાથમિક કેળવણી બધાને મળતી. તેમાં પોતાના ધંધાનું સામાન્ય જ્ઞાન અને થોડું અક્ષરજ્ઞાન હતું. માધ્યમિક કેળવણીમાં માણસો ધંધાનું થોડું શાસ્ત્ર શીખતા; તેમાં સમાજમાં ભેગાં મળીને જીવવાની કેળવણી મળતી હતી. ઊંચી કેળવણીમાં સમાજથી પર જઈને આત્મા શું ? હું શા માટે જન્મ્યો ? મારી ફરજ શી ? હું ક્યાં જવાનો છું ? વગેરે જ્ઞાનનો સમાવેશ થતો હતો. જે આ ત્રણે પ્રકારમાંથી કોઈ પણ જાતની કેળવણી ન લે, તે અસંસ્કારી ગણાતો. જ્ઞાન લેવાની રીતો ત્રણ હતી: એક સેવા કરીને જ્ઞાન પ્રાપ્ત કરીને; બીજું પોતાનું જ્ઞાન આપીને-બીજા પાસેથી જ્ઞાન લઈને; ત્રીજું ધનને બદલે જ્ઞાન લઈને; આ ત્રીજી રીતે કનિષ્ઠ ગણાતી. વળી ઊંચી કેળવણી તો નિઃસ્વાર્થી પાસેથી મળી શકે. એવા ગુરુઓ પણ હતા કે, જે શ્રોત્રિય બ્રહ્મનિષ્ઠ કહેવાતા. શ્રોત્રિય એટલે સાંભળેલું બરાબર કહી બતાવે; એટલે કે જે સમજ્યા છે, તે બરાબર રીતે બીજાને સમજાવી શકે, અને બ્રહ્મનિષ્ઠ એટલે જે જ્ઞાન સાથે ઈશ્વરમાં, આત્મામાં તલ્લીન થયો હોય. આવા શ્રોત્રિય બ્રહ્મનિષ્ઠ ગુરુ પાસેથી ઉચ્ચ જ્ઞાન મેળવવા માટે શિષ્ય નમ્ર ભાવે હાથમાં સમિધ લઈને જતો. ગુરુ પવિત્ર જીવન જીવનારા હતા. અને તેમનામાં જ્ઞાન આપવાની આવડત પણ હતી.




બીજા વર્ગની કેળવણી-માધ્યમિક જ્ઞાન એટલે કે સેવા લે અને જ્ઞાન આપે. જેમ ઋતુપર્ણ રાજાને ત્યાં નળરાજા બાહુકવેશે રહ્યા હતાં. એક વખત ઋતુપર્ણને સ્વયંવરમાં જવાનું હતું અને અમુક સમયમાં જ પહોંચવાનું હતું, ત્યારે તેનો રથ હાંકનાર બાહુક સિવાય બીજો કોઈ ન હતો. બાહુક અશ્વવિદ્યામાં કુશળ છે, તેની રાજાને ખબર નહિ, પણ નિરુપાયે તેણે તેને લીધો. તેણે માંદલા ઘોડા લીધા. રાજા અકળાયો, પણ ઉપાય ન હતો. નળરાજાએ બાહોશીથી પવનવેગે રથ હાંક્યો; તેથી રાજા બહુ ખુશ થયો અને તેથી તેની અશ્વવિદ્યા વિષે તેને ખૂબ માન થયું. વચ્ચે એક ઠેકાણે તે વિસામો લેવા થોભે છે; ત્યાં રાજાએ નળને કહ્યું, ‘આ ઝાડ પર કેટલાં પાંદડાં હશે ? નળ કહે, એ કંઈ ગણી શકાય ખરાં ? રાજાએ પાન ગણીને કહ્યાં; એટલે નળને થયું કે, હું માનતો હતો કે, રાજાને કંઈ આવડતું નથી, પણ આ તો બહુ હોશિયાર છે. તેણે પૂછ્યું, કે તમે શી રીતે ગણ્યા તે મને શીખવો. રાજાએ કહ્યું કે આ માંદલા ઘોડાથી તેં રથ કેવી રીતે પવનવેગે હાંક્યો, તે મને શીખવ.’ આમ બન્ને અરસપરસ શીખવે છે. એવી રીતે જે પોતાનું જ્ઞાન બીજાઓને આપે અને બીજા પાસેનું જ્ઞાન પોતે મેળવે તે મધ્યમ પ્રકારનું જ્ઞાન થયું.



        ત્રીજા પ્રકારનું એટલે કનિષ્ઠ પ્રકારનું જ્ઞાન એ કે દામ આપીને તે લે; પણ અંદરથી-હૃદયના ઊંડાણમાંથી પ્રેમનો ઊભરો આવે અને શિષ્યને તે વખતે ભણાવે, તેવું ભણતર મેળવનાર ભાગ્યશાળી ગણાય. આજે ઉચ્ચ કેળવણી તો ગઈ જ. મધ્યમ પ્રકારની કેળવણી પણ નહિ જેવી જ રહી છે; અને બધે કનિષ્ઠ પ્રકારની કેળવણી રહી ગઈ છે; એટલે સ્થૂળ કેળવણી રહી છે. જ્ઞાન મેળવવાનું ખરું સ્થાન હૃદયના ભાવ હોય છે. આજે એવા હૃદયના ભાવનું ભણતર ખોળ્યું મળતું નથી.



        કૂવાનું પાણી હોય છે, તે કાઢ્યે ખૂટતું નથી. જેમ તેમાંથી પાણી કાઢો, તેમ વધુ નિર્મળ પાણી પૂરજોસથી બહાર આવે; કેમ કે તે પાણી પાતાળમાંથી આવે છે. પણ ટાંકુ ભરી રાખ્યું હોય, તેમાંથી પાણી ન વપરાય તો બગડી જાય અને વપરાય તો ખૂટી જાય. આજનું શિક્ષણ ટાંકાના પાણી જેવું છે. શિક્ષકો હડતાલ પાડે તો મા-બાપનું રૂંવાડું ય ફરકતું નથી કે મારો છોકરો જ્ઞાન વગરનો રહી જશે. આવી લાગણી કોઈને થતી નથી. ટાંકાની આવી કેળવણીને કારણે સદાચારી માણસોનો પાક અટકી ગયો. હિંદને એ બહુ ભારે નુકશાન થયું છે. સદાચારના જ્ઞાનથી વંચિત રહ્યા, તેની આપણને ભારે ખોટ પડી. આવી ઊંધી કેળવણી લેવા માટે પૈસા પણ ખૂબ વાપરવા પડે છે. અને જેની પાસે એટલા પૈસા ન હોય, તે એ ન લઈ શકે. એ રીતે બહુ જ થોડા એવી કેળવણી લઈ શકે છે.



        આજે નિશાળમાં ગુરુ-શિષ્યના સંબંધો કેવા છે ? બન્ને જણ એકબીજાના હરીફો ન હોય, તેમ તેમની વચ્ચે કજિયા થાય છે. ગુરુ માટે શિષ્યને કંઈ માન નથી. શિષ્યના જીવન સાથે ગુરુને કંઈ સંબંધ નથી. તે પાંચ કલાક નિશાળમાં હાજર રહે એટલે કર્તવ્ય પૂરું થયું સમજે છે. એની નજર હંમેશ પગાર તરફ રહે છે. જ્યારે વિદ્યાર્થી ફી આપે છે, એટલે તે વર્ગમાં ગમે તેમ વર્તવાનો પરવાનો મેળવી લે છે. પહેલાં ગુરુને અને તેમના વિદ્યાર્થીઓને રાજા પણ માન આપતા. તેમના સ્વાગત માટે સામા જતા, આજે તો જ્ઞાન અંદર પેસી ન જાય એ માટે શિક્ષક લાકડી લઈ નિશાળને દરવાજે બેસતા ન હોય એવું લાગે છે ! આજે વિદ્યાર્થીનું જીવન તપાસીએ તો તેનું જીવન તેનાં મા-બાપના કે તેના ગુરુના જીવન સાથે સંબંધ વિનાનું થઈ ગયું છે.
    અત્યાર નું જ્ઞાન  વધારે પડતા ભાર રૂપ  બની ગયુછે ..વધારે જ્ઞાની એટલે કે ભણેલા  મિત્રો .હવે .પોતાના જ્ઞાન ના અભિમાન માં ખરે ખર તેનો સંકુચિત એટલે કે કુંઠિત ઉપયોગ કરી .. એક અલગ જ વ્યવસ્થા માં ઢળવા લાગ્યા છે ..જેમકે ///
              આજે ગામડામાં જઈને જોઈએ તો શું જણાશે ? ખરા કામની મોસમ હશે, મા-બાપ બધાં કામમાં રોકાઈ ગયાં હશે, ત્યારે ગામમાં ભણેલો છોકરો નવરો ફરતો જણાશે અથવા અખાડામાં દાવ ખેલતો હશે. તે ઘરના કશાય કામમાં નથી આવતો. તે બહારથી ભણીને આવે છે એટલે તેને ઘરનું ખાવાનુંય નથી ભાવતું; તેથી તે ઘેર રહેવાનું જ પસંદ નથી કરતો. ઘેર મા-બાપ પેટે પાટા બાંધી મહેનત કરી, કંઈક કમાણી કરે છે, તો છોકરો શહેરમાં જઈ ઉડાવે છે, ઘરની આવકથી પૂરું નથી થતું, તો ચોરી કરે છે; કોઈને છેતરે છે પણ તે પોતાના મોજશોખમાં ખામી આવવા દેતો નથી. આવો વિદ્યાર્થી બીજાનાં દુઃખનો શી રીતે વિચાર કરી શકે ? કેમ કે તે પોતાની જ જરૂરિયાતોનો ભૂખ્યો હોવાથી દુઃખી છે. પોતાનું સહેજ પણ જ્ઞાન તે મફત શી રીતે આપી શકે ? કોઈને રસ્તો બતાવવો હશે તોય જો તે અભણ હશે, તો પંદર વાત કરશે અને જરૂર હશે તો થોડે સુધી મૂકી પણ આવશે; અને ભણેલાને જો કોઈ પૂછશે, તો તે આંગળીથી બતાવશે કે પેલે રસ્તે જાઓ, આગળ પૂછજો. આગળ કોઈ મળે એમ છે કે નહિ, તેનો વિચારેય નહિ કરે,
       આજે તો મહેનત કરનારની કિંમત નથી અને લોકોને લૂંટવાની આવડતવાળો ડાહ્યો ગણાય છે. જો તક મળ્યે કોઈનો પૈસો પડાવી ન લીધો હોય, તો તે બાઘો ગણાય છે. યેન કેન પ્રકારેણ કમાઈ લાવે, તે ડાહ્યો ગણાય. ઓછામાં ઓછી મહેનતે વધુમાં વધુ કમાય તે હોશિયાર  એટલે  કે જ્ઞાની ગણાય ! આજે આપણે ક્યાં છીએ ?
         ખરે ખર જ્ઞાન ને  આપણે  પચાવી શકીએ તો જ આપણે  આ જ્ઞાન શક્તિ  નો જીવન માં સદઉપયોગ કરી સર્વ નું કલ્યાણ થાય એવા કર્યો કરી શકીએ ...
       

અભણપણું તો આપણે ભણી રહીએ પછી શરૂ થાય છે.

         નમસ્કાર  મિત્રો   ....
              આજે ..મારા એક મિત્ર ..ની પુત્રી ..માટે ..તેને પોતાની શાળા માં રજુ કરવા માટે એક  લેખ શોધી આપવા નું કામ મને શોપ્યું  હતું   ..આજ  સંસોધન કરતા કરતા મને આ સુંદર લેખ વાંચવા  મળ્યો ..
તે હું અહી થોડા ફેરફાર સાથે રજુ કરી રહ્યો છું ..પસંદ આવે તો મને આનંદ થશે .....



                     સૅમ્યુઅલ બૅકૅટે બે પ્રકારના અભણપણાની વાત કરી છે તે પણ અહીં સંભારવા જેવી છે. એક અભણપણું આપણે કશું શીખવાનું શરૂ કર્યું તે પહેલાંની આપણી સ્થિતિ છે,
                   પણ બીજું અભણપણું તો આપણે ભણી રહીએ પછી શરૂ થાય છે. આપણા દેશમાં આ બીજા અભણપણાને દૂર કરવા માટે યુનિવર્સિટીએ પ્રયત્નો કરવાના છે. આપણા જાણીતા કલાવિદ આનન્દ કુમારસ્વામીએ આ વાત ઘણાં વર્ષો પહેલાં, બીજી રીતે કરી હતી. એમણે કહ્યું હતું કે
                    આપણાં દેશની સમસ્યા તે અભણ લોકોનું અભણપણું નથી, પણ ભણેલાઓનું અભણપણું છે. આ અભણપણું એમને એકપરિમાણી બનાવી દે છે. સમગ્ર વ્યક્તિત્વનો વિકાસ એમના લક્ષ બહાર રહી જાય છે. માનવી એકબીજાને અંગત સ્વાર્થની ભૂમિકા પર જ મળતો હોય તો સંઘર્ષની શક્યતા જ વધારે રહે તે દીખીતું છે. આજે તો સંઘર્ષ જ આપણી જીવનરીતિ બની રહે છે. આ સંઘર્ષ જ આપણી વિવેકબુદ્ધિને ડહોળી નાખે છે, એથી નિર્ણયો કરવાના પરિપ્રેક્ષ્યને આપણે પામી શકતા નથી.


                   ટેકનોલોજીનો વિકાસ થતો રહ્યો છે, પણ એને સમાન્તર સાંસ્કૃતિક વિકાસ થયો નથી. આથી માનવીનો પણ એક સાધન તરીકે ઉપયોગ થવા લાગ્યો છે. પશ્ચિમમાં તો વિજ્ઞાનના વર્ચસ્ ને કારણે અમુક વિશિષ્ટ પ્રકારની જીવનરીતિનો સ્વીકાર થયો છે. એને એની મર્યાદા છે. વિજ્ઞાન એ સમગ્ર સાંસ્કૃતિક વિકાસનું એક અંગ છે. એને બદલે સંસ્કૃતિ વિજ્ઞાનમૂલક હોય એવી પરિસ્થિતિ ત્યાં ઉદ્દભવી છે. આપણે ત્યાં તો વિજ્ઞાનની સાથે સાથે અન્ધશ્રદ્ધા અને પુરાણમતવાદ પણ એટલાં જ ફાલતાં રહ્યાં છે. વિજ્ઞાનનો અધ્યાપક મંતરજંતરમાં માનતો હોય તો આપણે ત્યાં એથી નવાઈ નહિ લાગે. વિજ્ઞાનના અભ્યાસથી વૈજ્ઞાનિક પદ્ધતિએ આપણે આપણું જીવન સમજ્યું કે ગોઠવ્યું નથી. આથી વિજ્ઞાનનો આપણી જીવનરીતિ પર ઝાઝો પ્રભાવ પડ્યો નથી.




                 હવે વ્યવસાયલક્ષી શિક્ષણ પર ભાર મૂકવામાં આવે છે. એવા નિર્ણયના ફલિતાર્થો અને તેની ઉત્પત્તિઓ તારવીને વિચારી જોઈ હોય એવું લાગતું નથી. વ્યવસાયલક્ષી શિક્ષણ માનવીને એકપરિમાણી બનાવીને જુએ છે. એની સમગ્રતાને એ લક્ષમાં લેતું નથી. આથી જીવનમાં જે સમસ્યાઓ અને વિકલ્પો ઊભા થાય તે પરત્વે તારતમ્યનો વિવેક કરવાની શક્તિ એનામાં હોતી નથી. આથી જ શિક્ષિત માનવી જીવન જીવવાની બાબતમાં અસભ્ય બર્બરની જેમ વર્તે છે. એનામાં માનવતાની ઊણપ વર્તાય છે. આંરિ મિશો જેવા કવિએ તો ચેતવણી ઉચ્ચારેલી જ છે : ‘ધ બાર્બેરિયન્સ આર કમિંગ.’ આજની આપણી યુનિવર્સિટીનું વાતાવરણ જોતાં આપણે ત્યાં તો અસભ્ય બર્બરો આવી પહોંચ્યા હોય એવું લાગે છે. અંગ્રેજીમાં જેને ‘કલ્ચર’ કહે છે તે માત્ર જીવવાનાં સાધનો કે ઓજારો જ સપડાવે છે એવું માનવામાં આવતું નથી. ‘કલ્ચર’ તો જીવનની દઢ પીઠિકારૂપ વિચારપ્રણાલી છે.



        આજના શિક્ષણમાંથી એ દઢ ભૂમિકા અદશ્ય થઈ ગઈ છે. આને કારણે કેવળ અંગત સ્વાર્થને કારણ સિદ્ધ કરવાની દક્ષતા પામનાર માનવી આજે સફળ લેખાય છે. સારાસારનો વિવેક કરનાર અને એને અંગેની વૈચારિક ભૂમિકાને સિદ્ધ કરવા મથનાર માનવીને દીર્ધસૂત્રી અને વેદિયો કહીને એની હાંસી ઉડાવવામાં આવે છે. આજનો ઈજનેર કે દાકતર કે વકીલ એના વ્યવસાયમાં નિષ્ણાત હશે, પણ એક વિકસિત માનવ લેખે એ અનેક રીતે ઊણો હશે. આથી જ તો ઘણા દાક્તરો માનવતા વિનાના હોય એવો આપણને અનુભવ થાય છે. ઘણા ઈજનેરો ભ્રષ્ટાચારી બનીને દેશને પારવાર નુકશાન કરતા હોય છે. અને વકીલો તો મુકદ્દમો જીતવાને જ લક્ષ્ય ગણે છે, એમાં સાધનશુદ્ધિનો આગ્રહ રાખવાનું એમને પરવડતું નથી. આપણે જે થવા ઈચ્છતા હોઈએ તે થવાનો આપણો વિશિષ્ટાધિકાર કોઈ નકારી કાઢતું નથી, પણ એની પૂર્વશરત એ છે કે સૌથી પહેલાં આપણે માનવ્યનો વિકાસ કરેલો હોવો જોઈએ અને માનવતાનું ગૌરવ કરવાનું આપણે અનિવાર્ય ગણ્યું હોવું જોઈએ. વાંદરાના હાથમાં અસ્ત્રો આપો તો કદાચ એ પોતાનું જ ગળું કાપે. અસંસ્કૃત માનવીના હાથમાં અણુબોમ્બ જેવું સંહારક શસ્ત્ર આવી પડતાં એણે માનવીનો જ વિનાશ કર્યો છે. આપણે જે નથી બની શક્યા તે છીએ એવું દેખાડવાનો આપણે દંભ કરવો ન જોઈએ. આવો દંભ કોઠે પડી ન જાય તે માટેની પ્રતિકારકશક્તિ આપનાર શિક્ષણ આપણને મળ્યું હોય છે ખરું ?
             source -----Readgujarati.com વિદ્યા વિનાશને માર્ગે – સુરેશ જોષી

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

स्वभाव..........

 कुछ ..
सुन्दर शुभाषित ...जो ..हमने पढ़े और अच्छे  लगे तो सौचा  आपसे क्यों   छुपाये .....?

 स्वभाव के बारे ...मैं ...
1.


स्वभावो न उपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा ।

सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ॥

उपदेश देकर स्वभाव बदला नहीं जाता । पानी को खूब गर्म करने के बावजुद, वह फिर से (अपने स्वभावानुसार) शीत हो हि जाता है ।


2.


न तेजस्तेजस्वी प्रसृतमपरेषां प्रसहते ।

स तस्य स्वो भावः प्रकृति नियतत्वादकृतकः ॥

तेजस्वी इन्सान दूसरे के तेज को सहन नहीं कर सकता, क्यों कि वह उसका जन्मजात, प्रकृति ने तय किया हुआ स्वभाव है ।

3.

व्याघ्रः सेवति काननं च गहनं सिंहो गुहां सेवते


हंसः सेवति पद्मिनीं कुसुमितां गृधः श्मशानस्थलीम् ।

साधुः सेवति साधुमेव सततं नीचोऽपि नीचं जनम्

या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते ॥

शेर गहरे जंगल में, और सिंह गुफा में रहता है; हंस विकसित कमलिनी के पास रहेना पसंद करता है, गीध को स्मशान अच्छा लगता है । वैसे हि साधु, साधु की और नीच पुरुष नीच की सोबत करता है; याने कि जन्मजात स्वभाव किसी से छूटता नहीं है ।


4.

निम्नोन्नतं वक्ष्यति को जलानाम्


विचित्रभावं मृगपक्षिणां च ।

माधुर्यमिक्षौ कटुतां च निम्बे

स्वभावतः सर्वमिदं हि सिद्धम् ॥

पानी को ऊँचाई और गहराई किसने दिखायी ? पशु – पँछीयों में रही हुई विचित्रता उन्हें किसने सीखायी ? गन्ने में मधुरता और नीम में कटुता कौन लाया ? ये सब स्वभाव से हि सिद्ध होता है ।



5.
हेलया राजहंसेन यत्कृतं कलकूजितम् ।


न तद् वर्षशतेनापि जानात्याशिक्षितुं बकः ॥

राजहंस सहज जो नाजुक कलरव करता है, वैसा कलरव सौ साल तक प्रयत्न करनेवाला बगुला नहीं कर सकता ।



6.
वचो हि सत्यं परमं विभूषणम्


यथांगनायाः कृशता कटौ तथा ।

द्विजस्य विद्यैव पुनस्तथा क्षमा

शीलं हि सर्वस्य नरस्य भूषणम् ॥

जैसे पतली कमर स्त्री का और विद्या ब्राह्मण का भूषण है, वैसे सत्य और क्षमा परम् विभूषण हैं । पर शील तो शील तो सब मनुष्यों का भूषण है ।

7.
वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्वित्तमायाति याति च ।


अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ॥

चारित्र्य का रक्षण करना चाहिए । धन तो आता है और जाता है । वित्त से क्षीण होनेवाला क्षीण नहीं है, पर शील से क्षीण होनेवाला नष्ट होता है ।

8.
शीलं रक्षतु मेघावी प्राप्तुमिच्छुः सुखत्रयम् ।


प्रशंसां वित्तलाभं च प्रेत्य स्वर्गे च मोदनम् ॥

प्रशंसा, वित्तलाभ और स्वर्ग का आनंद – ये तीन सुख पाने की इच्छा रखनेवाले बुद्धिमान इन्सान ने शील का रक्षण करना चाहिए ।


9.

वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्वित्तमायाति याति च ।


अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ॥

चारित्र्य का रक्षण करना चाहिए । धन तो आता है और जाता है । वित्त से क्षीण होनेवाला क्षीण नहीं है, पर शील से क्षीण होनेवाला नष्ट होता है ।


10.

अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।


अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतद्विदुर्बुधाः ॥

कर्म से, मन से, और वचन से सब प्राणियों का अद्रोह, अनुराग (प्रेम) और दान – इन्हें हि बुद्धिमान लोग शील कहते हैं ।

11.

परोपदेशकुशलाः दृश्यन्ते बहवो जनाः ।


स्वभावमतिवर्तन्तः सहस्रेषु अपि दुर्लभाः ॥

दूसरों को उपदेश करने में अनेक लोग कुशल होते हैं, पर उसके मुताबिक वर्तन करनेवाले हज़ारों में एखाद भी दुर्लभ होता है ।







रविवार, 1 जुलाई 2012

...लक्ष्य ......आप अपना खुद का संसार रचते हैं

नमस्कार दोस्तों ....
 आज फ़िर  बहुत ही अच्छी बात पढ़ने को मिली .....यही............... नेट के माध्यम से .... तो .....बहुत ही अच्छी लगी और कुछ लाभदायी ...भी ....वही  यहाँ पेस्ट  कर रहा हूँ ........

Lakshya











सारांश:

SOURCE --http://pustak.org/home.php?bookid=8256
              कुछ व्यक्ति अपने सभी लक्ष्य क्यों हासिल कर लेते हैं, जबकि बाक़ी लोग बेहतर ज़िंदगी के सिर्फ़ सपने देखते रह जाते हैं? बेस्टसेलिंग लेखन ब्रायन ट्रेसी आपके सपनों को साकार करने का ऐसा रास्ता दिखाते हैं, जिस पर चलकर लाखों लोगों ने शून्य से शुरू करके महान सफलता हासिल की है। इस पुस्तक में ट्रेसी वे अनिवार्य सिद्धांत बताते हैं, जिनकी मदद से आप भी अपने सपने साकार कर सकते हैं।



लक्ष्य कैसे तय करें और उन्हें हासिल कैसे करें? ट्रेसी इसका एक सरल, सशक्त और असरदार तरीक़ा बताते हैं, जिसका प्रयोग करके दस लाख से ज़्यादा लोगों ने असाधारण परिणाम पाए हैं।



ट्रेसी के बताए इक्कीस सिद्धांतों पर चलकर आप किसी भी लक्ष्य को हासिल कर सकते है–चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो। इसके अलावा इससे आप यह भी सीखेंगे कि अपनी व्यक्तिगत शक्तियों को कैसे पहचानें, आपके जीवन में सबसे मूल्यवान क्या है और भविष्य में अपनी मनचाही उपलब्धियाँ हासिल करने के लिए ध्यान कैसे केंद्रित करें। ट्रेसी बताते हैं कि आप अपना आत्मविश्वास कैसे बढ़ा सकते हैं, राह में आने वाली हर समस्या या बाधा को कैसे सुलझा सकते हैं मुश्किलों से कैसे उबर सकते हैं, चुनौतियों से कैसे निबट सकते हैं और हर लक्ष्य को हासिल कैसे कर सकते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस पुस्तक में आप सफलता का एक आजमाया हुआ सिस्टम सीखेंगे, जिसका प्रयोग आप ज़िंदगी भर कर सकते हैं।



ब्रायन ट्रेसी दुनिया के शीर्षस्थ मैनेजमेंट परामर्शदाता, प्रशिक्षक और वक्ताओं में से एक हैं। इस पुस्तक में बताई गई विधियों का प्रयोग करके वे शून्य से शिखर पर पहुँचे हैं। वे हर साल दुनिया भर में 2,50.000 से ज़्यादा लोगों को संबोधित करते है। ट्रेसी परामर्शदाता और प्रशिक्षक के रूप में 1,000 से ज़्यादा कॉरपोरेशन्स को अपनी सेवाएँ दे चुके हैं, जिनमें आईबीएम, फ़ोर्ड, जेरॉक्स, एचपी और फ़ेडरल एक्सप्रेस शामिल हैं। उन्होंने 35 पुस्तकें लिखी हैं और 300 से ज़्यादा ऑडियो-वीडियो प्रोग्राम्स तैयार किए हैं।

1

अपनी संभावना का ताला खोलें

आम इंसान की संभावना उस महासागर की तरह है, जिसमें यात्रा नहीं की गई है, उस नए महाद्वीप की तरह है, जिसे खोजा नहीं गया है। संभावनाओं की पूरी दुनिया मुक्त होने और महान काम करने के लिए मार्गदर्शन का इंतज़ार कर रही है।

–ब्रायन ट्रेसी

सफलता का मतलब लक्ष्य है और बाक़ी सारी चीज़ें कमेंट्री हैं। सभी सफल लोग पूरी तरह लक्ष्य केंद्रित होते हैं। वे जानते हैं कि वे क्या चाहते हैं और उसे हासिल करने के लिए वे हर दिन अपना पूरा ध्यान केंद्रित करते हैं।



लक्ष्य तय करने की आपकी क्षमता ही सफलता की सबसे प्रमुख योग्यता है। लक्ष्य आपके सकारात्मक मस्तिष्क का ताला खोलते हैं और मंज़िल तक पहुँचाने वाले मददग़ार विचारों तथा ऊर्जा को मुक्त करते हैं। लक्ष्यों के बिना आप बस ज़िंदगी की लहरों पर डूबते-उतराते रहते हैं, जबकि लक्ष्य होने पर आप तीर की तरह उड़कर सीधे निशाने पर पहुँच जाते हैं।



सच तो यह है कि आपमें इतनी ज़्यादा नैसर्गिक संभावना है कि उसका पूरा इस्तेमाल करने के लिए आपको शायद सौ से ज़्यादा बार जन्म लेना पड़ेगा। आपने अब तक जो भी हासिल किया है, वह आपकी सच्ची संभावना का सिर्फ़ एक छोटा सा अंश है। सफलता का एक नियम यह है : इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप कहाँ से आ रहे हैं; फ़र्क़ तो इस बात से पड़ता है कि आप कहाँ जा रहे हैं। और आप कहाँ जा रहे हैं, यह सिर्फ़ आप और आपके विचार ही तय करते हैं।



स्पष्ट लक्ष्य होने पर आपका आत्मविश्वास बढ़ता है, आपकी क्षमता का विकास होता है और आपकी प्रेरणा का स्तर ऊँचा होता है। जैसा कि सेल्स प्रशिक्षक टॉम हॉपकिन्स कहते हैं, ‘‘लक्ष्य उपलब्धि की अँगीठी का ईंधन हैं।’’

आप अपना खुद का संसार रचते हैं

शायद मानव इतिहास की महानतम खोज यह है कि आपके मस्तिष्क में आपके जीवन के लगभग हर पहलू का निर्माण करने की शक्ति होती है। मानव निर्मित जगत में आप अपने चारों ओर जो भी चीज़ देखते हैं, वह किसी इंसान के दिमाग़ में एक विचार के रूप में आई थी और उसके बाद ही भौतिक जगत् में साकार हुई। आपके जीवन की हर चीज़ किसी विचार, इच्छा, आशा या सपने के रूप में शुरू हुई थी–या तो आपके दिमाग़ में या फिर किसी और के दिमाग़ में। आपके विचार रचनात्मक होते हैं। वे आपकी दुनिया और आपके साथ होने वाली हर चीज़ को आकार देते हैं।



सभी धर्मों, सभी दर्शनों, मेटाफ़िज़िक्स, मनोविज्ञान और सफलता का महान सार यह है : आप जिसके बारे में ज़्यादातर वक़्त सोचते हैं, वही बन जाते हैं। आपका बाहरी जगत अंततः आपके आंतरिक जगत का प्रतिबिंब बन जाता है। आपको वही प्रतिबिंब दिखता है, जिसके बारे में आप ज़्यादातर समय सोचते हैं। आप जिसके बारे में भी सोचते हैं, वह लगातार आपकी ज़िंदगी में प्रकट होता है।



कई हज़ार सफल लोगों से पूछा गया कि वे ज़्यादातर समय किस चीज़ के बारे में सोचते हैं। सफल लोगों का सबसे आम जवाब यह था कि वे ज़्यादातर वक़्त अपनी मनचाही चीज़ और उसे पाने के बारे में सोचते हैं।



असफल और दुखी लोग ज़्यादातर वक्त अनचाही चीज़ों के बारे में सोचते और बातें करते हैं। वे अपनी समस्याओं और चिंताओं के बारे में बातचीत करते हैं तथा ज़्यादातर समय दूसरों को दोष देते रहते हैं। लेकिन सफल लोग अपने विचारों और बातों को अपने सबसे प्रबल इच्छित लक्ष्यों पर केंद्रित रखते हैं। वे ज़्यादातर वक़्त उस चीज़ के बारे में सोचते और बातें करते हैं, जिसे वे पाना चाहते हैं।



स्पष्ट लक्ष्यों के बिना जीना घने कोहरे में कार चलाने जैसा है। चाहे आपकी कार कितनी ही दमदार हो, चाहे इंजीनियरिंग कितनी ही बेहतरीन हो, आप धीमे-धीमे, झिझकते हुए कार चलाएँगे और बढ़िया से बढ़िया सड़क पर भी गति नहीं पकड़ पाएँगे। लक्ष्य स्पष्ट करने से कोहरा तत्काल छँट जाता है और आपको अपनी योग्यताओं तथा ऊर्जाओं पर ध्यान केंद्रित करने और उनका इस्तेमाल करने का मौक़ा मिल जाता है। स्पष्ट लक्ष्य आपको यह सामर्थ्य देते हैं कि आप अपनी ज़िंदगी के एक्सीलरेटर को दबा दें और उस सफलता की ओर तेज़ी से बढ़ें, जिसे आप वाक़ई हासिल करना चाहते हैं।

आपका स्वचालित लक्ष्य-केंद्रित कार्य

इस प्रयोग के बारे में सोचें : आप एक पत्रवाहक कबूतर (homing pigeon) को उसके बसेरे से बाहर निकालकर एक पिंजरे में रखते हैं, उस पिंजरे पर कंबल ढँककर एक बक्से में पैक कर देते हैं और फिर उस बक्से को एक बंद ट्रक में रख देते हैं। आप किसी भी दिशा में हज़ार मील दूर चले जाएँ और इसके बाद अपना ट्रक खोलें, बक्सा बाहर निकालें, कंबल हटाएँ और कबूतर को पिंजरे से बाहर निकाल दें। वह फौरन हवा में उड़ जाएगा, तीन चक्कर लगाएगा और फिर बिना किसी ग़लती के एक हज़ार मील दूर स्थित अपने बसेरे की तरफ़ चल देगा। दुनिया के किसी भी अन्य प्राणी के पास यह अविश्वसनीय साइबरनेटिक, लक्ष्य-केंद्रित हुनर नहीं होता है–सिवाय इंसान के।



आपमें भी लक्ष्य हासिल करने की वही योग्यता है, जो पत्रवाहक कबूतर में हैं। दरअसल, आपमें एक और अद्भूत चीज़ है। जब आपका लक्ष्य बिलकुल स्पष्ट होता है, तो आपको तो यह पता करने की भी ज़रूरत नहीं है कि यह कहाँ है या इसे कैसे हासिल करना है। आप ठीक-ठीक क्या पाना चाहते हैं, बस इतना फ़ैसला भर कर लेने से ही आप बिना किसी ग़लती के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने लगेंगे और आपका लक्ष्य बिना किसी ग़लती के आपकी ओर बढ़ने लगेगा। बिलकुल सही समय और जगह पर आप और आपका लक्ष्य एक-दूसरे से मिल जाएँगे।



आपके मस्तिष्क की गहराई में स्थित इस अविश्वसनीय साइबरनेटिक मेकेनिज़्म की वजह से आप लगभग हमेशा अपने लक्ष्य हासिल कर लेते हैं, चाहे वे जो भी हों। अगर आपका लक्ष्य रात को घर आकर टीवी देखना है, तो आप लगभग हमेशा इसे पा लेंगे। अगर आपका लक्ष्य सेहत, ख़ुशी और दौलत से भरी अद्भुत ज़िंदगी जीना हो, तो आप इसे भी पा लेंगे। ठीक कंप्यूटर की तरह ही आपका लक्ष्य खोजने वाला मेकेनिज़्म भी अपनी तरफ़ से कोई निर्णय नहीं लेता। यह स्वचालित होता है और आपकी मनचाही चीज़ को लगातार आपकी ओर लाता है, चाहे वह जो भी हो।



प्रकृति आपके लक्ष्यों के आकार के बारे में परवाह नहीं करती। अगर आप छोटे लक्ष्य तय करते हैं, तो आपका स्वचालित लक्ष्य-प्राप्ति तंत्र आपको छोटे लक्ष्य हासिल करने में समर्थ बनाएगा। अगर आप बड़े लक्ष्य तय करते हैं, तो यह नैसर्गिक क्षमता आपको बड़े लक्ष्य हासिल करने में समर्थ बनाएगी। आपके लक्ष्यों का आकार, प्रकार और विवरण पूरी तरह आप पर निर्भर करता है। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि आप ज़्यादातर वक़्त किस चीज़ के बारे में सोचने का चुनाव करते हैं।

लोग लक्ष्य तय क्यों नहीं करते

वह एक अच्छा सवाल है : अगर लक्ष्य खोजना स्वचालित है, तो फिर इतने कम लोगों के पास स्पष्ट, लिखित, नापने योग्य, समयबद्ध लक्ष्य क्यों होते हैं? हर किसी के पास ऐसे लक्ष्य क्यों नहीं होते, जिनकी दिशा में वे हर दिन काम करें? यह जीवन का एक बड़ा रहस्य है। मुझे यक़ीन है कि चार कारणों से लोग अपने लक्ष्य तय नहीं करते :

वे लक्ष्यों को महत्वपूर्ण नहीं मानते

पहली बात, ज़्यादातर लोगों को लक्ष्यों के महत्व का एहसास ही नहीं होता। अगर आप ऐसे घर में पले-बढ़े हैं, जहाँ किसी के पास लक्ष्य नहीं रहे हों या फिर ऐसे समूह में रहे हों, जहाँ लक्ष्यों पर कभी बातचीत न हुई हो या उन्हें महत्व न दिया गया हो, तो वयस्क होने के बाद भी आप लक्ष्यों की शक्ति से अनजान रह सकते हैं। आपको यह पता ही नहीं चलेगा कि लक्ष्य तय करने और हासिल करने की आपकी योग्यता आपकी ज़िंदगी पर किसी दूसरी योग्यता से ज़्यादा असर डालती है। अपने आस-पास ग़ौर से देखें। आपके कितने दोस्तों या परिजनों के पास स्पष्ट लक्ष्य हैं और वे अपने लक्ष्यों के प्रति समर्पित हैं?

वे जानते ही नहीं हैं कि लक्ष्य कैसे तय किए जाते हैं

लोगों के पास लक्ष्य न होने का दूसरा कारण यह है कि वे यह जानते ही नहीं हैं कि लक्ष्य तय कैसे किए जाते हैं। इससे भी बुरी बात, कि कई लोग सोचते हैं कि उनके पास पहले से ही लक्ष्य हैं, जबकि उनके पास दरअसल इच्छाओं या सपनों की श्रृंखला भर होती है, जैसे ‘‘खुश रहो,’’ या ‘‘बहुत सा पैसा बनाओ’’ या ‘‘अच्छा पारिवारिक जीवन जियो।’’



लेकिन उन्हें लक्ष्य नहीं कहा जा सकता। ये तो सिर्फ़ फंतासियाँ हैं, जो हर एक के पास होती हैं। लक्ष्य, इच्छा से एकदम अलग होता है। यह स्पष्ट होता है, लिखित होता है और विशिष्ट होता है। इसे किसी को भी जल्दी से और आसानी से बताया जा सकता है। आप इसकी दिशा में अपनी प्रगति को नाप सकते हैं। जब आप इसे हासिल कर लेते हैं या नहीं कर पाते, तो आप यह बात जान जाते हैं।



यह संभव है कि किसी नामी यूनिवर्सिटी से बड़ी डिग्री लेने के बावजूद आपको लक्ष्य निर्धारण के बारे में एक घंटे का भी प्रशिक्षण न मिला हो। लगता है, जैसे हमारे स्कूलों और यूनिवर्सिटीज़ की शैक्षिक सामग्री तय करने वाले लोग ज़िंदगी में सफलता हासिल करने में लक्ष्य निर्धारण के महत्व को लेकर बिलकुल अंधे हैं। और ज़ाहिर है, अगर बालिग़ होने तक आपने लक्ष्यों के बारे में कभी सुना ही नहीं है, जैसा मेरे साथ हुआ था, तो आपको पता भी नहीं होता कि वे आपके हर काम में कितने महत्वपूर्ण होते हैं।

वे असफलता से डरते हैं

लोगों के लक्ष्य तय न करने का तीसरा कारण है असफलता का डर। असफलता से दिल को चोट पहुँचती है। यह भावनात्मक और अक्सर आर्थिक दृष्टि से भी दुखदायी और कष्टकारी होती है। हर व्यक्ति कभी न कभी असफल हो चुका है। हर बार हम ज़्यादा सतर्क होने और भविष्य में सफलता से बचने का संकल्प करते हैं। इसके अलावा, कई लोग अचेतन रूप से ख़ुद को नुक़सान पहुँचाने वाली भारी ग़लती करते हैं असफलता से बचने के लिए वे लक्ष्य ही तय नहीं करते। वे सफलता की अपनी संभावना से काफी निचले स्तर पर ही काम करते-करते ज़िंदगी गुज़ार देते हैं।

उन्हें अस्वीकृति का डर होता है

लोगों के पास लक्ष्य न होने का चौथा कारण है अस्वीकृति (rejection) का डर। लोग इस बात से डरते हैं कि अगर उन्होंने कोई लक्ष्य तय किया और कामयाब नहीं हो पाए, तो दूसरे लोग उनकी आलोचना करेंगे या हँसी उड़ाएँगे। यह भी एक कारण है कि शुरुआत में आपको अपने लक्ष्य गोपनीय रखने चाहिए। किसी को भी न बताएँ। दूसरों को परिणाम देखने दें, उन्हें पहले से कुछ भी न बताएँ। जो वे जानते ही नहीं हैं, उससे वे आपको चोट नहीं पहुँचा सकते।

शीर्षस्थ 3 प्रतिशत लोगों में शामिल हों

मार्क मैक्कॉरमैक ने अपनी पुस्तक व्हाट दे डोन्ट टीच यू एट हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल में 1979 और 1989 के बीच हार्वर्ड में हुए एक अध्ययन के बारे में बताया है। 1979 में हार्वर्ड के एमबीए ग्रेजुएट्स से पूछा गया, ‘‘क्या आपने अपने भविष्य के लिए स्पष्ट, लिखित लक्ष्य तय किए हैं और उन्हें हासिल करने की कोई योजना बनाई है?’’ पता चला कि सिर्फ़ 3 प्रतिशत ग्रेजुएट्स के पास लिखित लक्ष्य और योजनाएँ थीं। तेरह प्रतिशत के पास लक्ष्य तो थे, लेकिन उन्होंने लिखे नहीं थे। 84 प्रतिशत के पास स्पष्ट लक्ष्य ही नहीं थे, सिवाय इसके कि वे बिज़नेस स्कूल से जाने के बाद गर्मियों का आनंद लें।



दस साल बाद 1989 में शोधकर्ताओं ने उस क्लास के सदस्यों से दोबारा संपर्क किया। उन्होंने पाया कि जिन 13 प्रतिशत के पास अलिखित लक्ष्य थे, वे लक्ष्य न बनाने वाले 84 प्रतिशत विद्यार्थियों से औसतन दोगुना कमा रहे थे। लेकिन उन्हें सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह थी कि हार्वर्ड छोड़ते वक़्त जिन 3 प्रतिशत ग्रेजुएट्स के पास स्पष्ट लिखित लक्ष्य थे वे बाकी सभी 97 प्रतिशत से औसतन दस गुना ज़्यादा कमाई कर रहे थे।



गुरुवार, 14 जून 2012

मधुमेह रोगियों के लिए 201 टिप्स....बिमल छाजेड़...

Madhumeh Rogiyon Ke Liye 201 Tipsइन्टरनेट एक एसा माध्यम है जिसके ज़रिये हम बहुत सी अच्छी पुस्तकों का अध्ययन कर सकते है ..वैसेही कुछ पुस्तकों के कुछ अंश यहाँ मैंने उपरोक्त सौर्स से लिए है ..मुजे आनंद होगा अगर आप मैसे किसीको भी अगर पसंद आये ...


source............http://pustak.org/home.php?bookid=7953
 
 

                                               प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

                             आधुनिक समय में मधुमेह एक आम बीमारी बनती जा रही है। पूरे संसार तथा भारत में मधुमेह रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यह दीर्घकालीन रोग एक धीमी मौत की तरह रोगी के गुर्दों को नष्ट कर देता है। हृदय रोग, कोमा की अवस्था तथा गैंग्रीन रोग भी इसी की देन हैं। वैसे इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है। परंतु जीवनशैली में बदलाव, शिक्षा तथा खान-पान की आदतों में सुधार द्वारा रोग को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। यदि रोग बढ़ जाए तो भी एलोपैथी तथा आयुर्वैदिक दवाओं, इंसुलिन व जीवनशैली में बदलाव द्वारा रोग पर काबू पाया जा सकता है।




स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही तथा अशिक्षा ही मधुमेह का प्रमुख कारण है। अनेक मधुमेह रोगी मधुमेह के कारण व सुधार के उपाय तक नहीं जानते।

डॉ. बिमल छाजेड़ (एम.डी.) एक जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ हैं। उन्होंने दिल्ली में ‘साओल हृदय केंद्र’ की स्थापना भी की है। डॉ. छाजेड़ ने जीवनशैली में सुधार तथा दवाओं के मेल से हृदय व मधुमेह रोगियों के लिए नवीन चिकित्सा पद्धति विकसित की है। ये योग, ध्यान, तनाव प्रबंधन, व्यायाम तथा आहार में बदलाव को बाइपास सर्जरी तथा एंजियोप्लास्टी का विकल्प मानते हैं। देश के सभी प्रमुख शहरों में नियमित रूप से उनकी कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं।



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सुप्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. बिमल छाजेड़ का दावा है कि हृदय की धमनियों में आई रुकावटों के लिए बाइपास सर्जरी आवश्यक नहीं है। यह कोई स्थाई समाधान नहीं देती। वर्तमान में इस रोग से ग्रस्त रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। इस रोग का मुख्य कारण तनाव है। हृदयरोग से ग्रस्त लोगों को अपने खान-पान का उचित ध्यान रखना चाहिए। योग एवं ध्यान जैसी पद्धतियों के द्वारा डॉ. छाजेड़ ने अनेक रोगियों को इस भयंकर रोग से मुक्ति दिलाई है। वे रोगियों को बिना तेल का भोजन ग्रहण करने की सलाह देते हैं।



–जनसत्ता

भाग-(क)

मधुमेह क्या है?

‘डायबिटीज मेलाइट्स’ एक जाना-पहचाना रोग है, जिसमें रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है तथा शरीर की कोशिकाएं शर्करा का उपयोग नहीं कर पातीं। यह रोग ‘इंसुलिन’ नामक रसायन की कमी से होता है, जिसका स्राव शरीर में अग्नाशय (पैंक्रियाज) द्वारा होता है।



डायबिटीज मेलाइट्स (हारपरग्लाइसीमिया, हाई शुगर, हाई ग्लूकोज, मधुमेय ग्लूकोज इनटोलरेंस के नाम से भी जाना जाता है), का साधारण भाषा में अर्थ है–‘मीठा मूत्र’ क्योंकि प्रायः देखा गया है कि मधुमेह रोगियों के मूत्र में शर्करा पाई जाती है। उच्च रक्तचाप तथा मोटापे के साथ इस रोग को ‘मेटाबॉलिक सिंड्रोम’ कहा जाता है। इस रोग को मेलाइट्स इसलिए कहते हैं ताकि इसे डायबिटिज इंसीपिडस (Insipidus) से अलग किया जा सके जिसमें बहुमूत्र की समस्या तो आती है परंतु मूत्र में शर्करा नहीं पाई जाती। डायबिटीज मेलाइट्स सामान्यतः ‘डायबिटीज’ के नाम से ही प्रसिद्ध है। डायबिटीज या मधुमेह एक ऐसा रोग है जिसमें रोगी कभी भी तत्काल लक्षणों की शिकायत नहीं करते किंतु रक्त में ग्लूकोज का बढ़ता हुआ स्तर शरीर के भीतर अवयवों तथा हृदय व गुर्दे आदि को भी नष्ट कर देता है इसलिए इसे ‘धीमी मौत’ भी कहते हैं।



यह एक दीर्घकालीन रोग है, रोगी 30-40 वर्ष तक इस रोग के साथ जीवित रहते हैं। यदि रोगी अपनी ब्लड ग्लूकोज का स्तर नियंत्रित रखे तथा पूरी देखभाल करे तो रोग उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। वैसे तो नियमित खान-पान ही रोग को काफी हद तक संभाल लेता है किंतु व्यायाम, तनाव प्रबंधन, योग तथा रोग की संपूर्ण जानकारी के साथ रोग का निदान और भी सरल हो जाता है। यदि इस रोग से संबंधित इन बातों पर पूरा ध्यान दिया जाए तो रोगी को दवाओं का सेवन भी नहीं करना पड़ता।



कई बार जीवनशैली में सुधार तथा दवाओं के प्रयोग से भी रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है। यदि रक्त में ग्लूकोज का स्तर नियंत्रित रखने के अन्य उपाय कारगर न रहे तो इंसुलिन एक रामबाण औषधि के रूप में मौजूद है।



मधुमेह क्यों होता है?

हमारे भोजन में कार्बोहाइड्रेट एक प्रमुख तत्त्व है, यही कैलोरी व ऊर्जा का स्रोत है। वास्तव में शरीर के 60 से 70% कैलोरी इन्हीं से प्राप्त होती है। कार्बोहाइड्रेट पाचन तंत्र में पहुंचते ही ग्लूकोज के छोटे-छोटे कणों में बदल कर रक्त प्रवाह में मिल जाते हैं इसलिए भोजन लेने के आधे घंटे भीतर ही रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है तथा दो घंटे में अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है।



दूसरी ओर शरीर तथा मस्तिष्क की सभी कोशिकाएं इस ग्लूकोज का उपयोग करने लगती हैं। ग्लूकोज छोटी रक्त नलिकाओं द्वारा प्रत्येक कोशिका में प्रवेश करता है, वहां इससे ऊर्जा प्राप्त की जाती है। यह प्रक्रिया दो से तीन घंटे के भीतर रक्त में ग्लूकोज के स्तर को घटा देती है। अगले भोजन के बाद यह स्तर पुनः बढ़ने लगता है। सामान्य स्वस्थ व्यक्ति में भोजन से पूर्व रक्त में ग्लूकोज का स्तर 70 से 100 मि.ग्रा./डे.ली. रहता है। भोजन के पश्चात यह स्तर 120-140 मि.ग्रा./डे.ली. हो जाता है तथा धीरे-धीरे कम होता चला जाता है।



मधुमेह में इंसुलिन की कमी के कारण कोशिकाएं ग्लूकोज का उपयोग नहीं कर पातीं क्योंकि इंसुलिन के अभाव में ग्लूकोज कोशिकाओं में प्रवेश ही नहीं कर पाता। इंसुलिन एक द्वार रक्षक की तरह ग्लूकोज को कोशिकाओं में प्रवेश करवाता है ताकि ऊर्जा उत्पन्न हो सके। यदि ऐसा न हो सके तो शरीर की कोशिकाओं के साथ-साथ अन्य अंगों को भी रक्त में ग्लूकोज के बढ़ते स्तर के कारण हानि होती है। यदि स्थिति उस प्यासे की तरह है जो अपने पास पानी होने पर भी उसे चारों ओर ढूंढ़ रहा है।



इन द्वार रक्षकों (इंसुलिन) की संख्या में कमी के कारण रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ कर 140 मि.ग्रा./डे.ली. से भी अधिक हो जाए तो व्यक्ति मधुमेह का रोगी माना जाता है। असावधान रोगियों में यह स्तर बढ़ कर 500 मि.ग्रा./ड़े.ली. तक भी जा सकता है।



मधुमेह रोग जटिलताओं में भरा है। सालों साल यदि रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ा रहे तो प्रत्येक अंग की छोटी रक्त नलिकाएं नष्ट हो जाती हैं जिसे माइक्रो एंजियोपैथी कहा जाता है। तंत्रिकातंत्र की खराबी ‘न्यूरोपैथी, गुर्दों की खराबी ‘नेफरोपैथी’ व नेत्रों की खराबी ‘रेटीनोपैथी’ कहलाती है। इसके अलावा हृदय रोगों का आक्रमण होते भी देर नहीं लगती।



मधुमेह के प्रकार

डायबिटीज मेलाइट्स को निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है–



1. आई.डी.डी.एम. इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज मेलाइट्स (इंसुलिन, आश्रित मधुमेह) टाइप–।

2. एन.आई.डी.डी.एम. नॉन इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज मेलाइट्स (इंसुलिन अनाश्रित मधुमेह) टाइप–॥

3. एम.आर.डी.एम. मालन्यूट्रिशन रिलेटिड डायबिटीज मेलाइट्स (कुपोषण जनित मधुमेह)

4. आई.जी.टी.(इंपेयर्ड ग्लूकोज टोलरेंस)

5. जैस्टेशनल डायबिटीज

6. सैकेंडरी डायबिटीज



1. टाइप–। (इंसुलिन आश्रित मधुमेह)–टाइप–। मधुमेह में अग्नाशय इंसुलिन नामक हार्मोन नहीं बना पाता जिससे ग्लूकोज शरीर की कोशिकाओं को ऊर्जा नहीं दे पाता। इस टाइप में रोगी को रक्त में ग्लूकोज का स्तर सामान्य रखने के लिए नियमित रूप से इंसुलिन के इंजेक्शन लेने पड़ते हैं। इसे ‘ज्यूविनाइल ऑनसैट डायबिटीज’ के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग प्रायः किशोरावस्था में पाया जाता है। इस रोग में ऑटोइम्यूनिटी के कारण रोगी का वजन कम हो जाता है।



2. टाइप-।। (इंसुलिन अनाश्रित मधुमेह)–लगभग 90% मधुमेह रोगी टाइप-।। डायबिटीज के ही रोगी हैं। इस रोग में अग्नाशय इंसुलिन बनाता तो है परंतु इंसुलिन कम मात्रा में बनती है, अपना असर खो देती है या फिर अग्नाशय से ठीक समय पर छूट नहीं पाती जिससे रक्त में ग्लूकोज का स्तर अनियंत्रित हो जाता है। इस प्रकार के मधुमेह में जेनेटिक कारण भी महत्वपूर्ण हैं। कई परिवारों में यह रोग पीढ़ी दर पीढ़ी पाया जाता है। यह वयस्कों तथा मोटापे से ग्रस्त व्यक्तियों में धीरे-धीरे अपनी जड़े जमा लेता है।



अधिकतर रोगी अपना वजन घटा कर, नियमित आहार पर ध्यान दे कर तथा औषधि ले कर इस रोग पर काबू पा लेते हैं।



3. एम.आर.डी.एम.(कुपोषण जनित मधुमेह)–भारत जैसे विकासशील देश में 15-30 आयु वर्ग के किशोर तथा किशोरियां कुपोषण से ग्रस्त हैं। इस दशा में अग्नाशय पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता। रोगियों को इंसुलिन के इंजेक्शन देने पड़ते हैं। मधुमेह के टाइप–। रोगियों के विपरीत इन रोगियों में इंसुलिन के इंजेक्शन बंद करने पर कीटोएसिडोसिस विकसित नहीं हो पाता।



4. आई.जी.टी.(इंपेयर्ड ग्लूकोज टोलरेंस)–जब रोगी को 75 ग्राम ग्लूकोज का घोल पिला दिया जाए और रक्त में ग्लूकोज का स्तर सामान्य तथा मधुमेह के बीच हो जाए तो यह स्थिति आई.टी.जी. कहलाती है। इस श्रेणी के रोगी में प्रायः मधुमेह के लक्षण दिखाई नहीं देते परंतु ऐसे रोगियों में भविष्य में मधुमेह हो सकता है।



5. जैस्टेशनल डायबिटीज (गर्भावस्था के दौरान)–गर्भावस्था के दौरान होने वाली मधुमेह जैस्टेशनल डायबिटीज कहलाती है। 2-3% गर्भावस्था में ऐसा होता है। इसके दौरान गर्भावस्था में मधुमेह से संबंधित जटिलताएं बढ़ जाती हैं तथा भविष्य में माता तथा संतान को भी मधुमेह होने की आशंका बढ़ जाती है।



6. सेकेंडरी डायबिटीज–जब अन्य रोगों के साथ मधुमेह हो तो उसे सेकेंडरी डायबिटीज कहते हैं। इसमें अग्नाशय नष्ट हो जाता है जिससे इंसुलिन का स्राव असामान्य हो जाता है, जैसे–



(1) अग्नाशय से संबंधित रोग–

अग्नाशय में सूजन

अग्नाशय का कैंसर

हमारी विरासत........तेजपाल सिंह धामा....प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश...........

source------------http://pustak.org/home.php?bookid=5413

Hamari Virasat
नमस्कार दोस्तों ...
इन्टरनेट एक एसा माध्यम है जिसके ज़रिये हम बहुत सी अच्छी पुस्तकों का अध्ययन कर सकते है ..वैसेही कुछ पुस्तकों के कुछ अंश यहाँ मैंने  उपरोक्त सौर्स से लिए है ..मुजे आनंद होगा अगर आप मैसे किसीको भी अगर पसंद आये ...











हे आर्य भारत मां !
असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे,


सुरतरूवर शाखा लेखनी पत्रमुर्वी

लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालम्।

तदपि तव गुणानामीश ! पारम् न याति।



अर्थात् कज्जलगिरि की स्याही समुद्र के पात्र में घोली गयी हो, कल्पवृक्ष की शाखा की लेखनी हो, कागज पृथ्वी हो और मां सरस्वती स्वयं लिखने वाली हो, तथापि हे आर्य मां। तुम्हारे गुणों का वर्णन कर पाना अशक्य एवं असंभव है।

भूमिका

इतिहास का शाब्दिक अर्थ होता है ऐसा ही हुआ है। सच्चा इतिहास बतलाता है कि ईश्वर कभी किसी मनुष्य किसी देश अथवा किसी मनुष्य समूह की अधोगति तब तक नहीं करता जब तक कि मनुष्य, देश व जाति अज्ञानी तथा कुकर्मी स्वयं न बन जाए। शुभकर्म का फल आत्मीय तथा सामाजिक आरोग्यता, बल, बुद्धि, सुख, अभ्युदय व देश स्वतंत्रता और दुष्ट कर्मो का फल आत्मीय (निज की) तथा सामाजिक रोग, दुर्बलता, दुःख या दरिद्रता व देश की पराधीनता है। इतिहास गवाह है कि जब तक किसी मनुष्य विशेष या साधारण ने तथा जनमानस ने पूर्वकाल में कोई भी राजनीति, धर्म संबंधित आदि भूल की, तो उसको या उनको फल भोगना पड़ा।



हम भारतवर्ष की संतान हैं। हमारे पूर्वजों के कार्यकलापों के कारण ही हमारे इतिहास का निर्माण हुआ है। जब इतिहास को हमारे पूर्वजों ने निर्मित किया है तो अपना इतिहास लिखने का अधिकार हमको ही है, न किस विदेशी विद्वानों को। राम-रावण की ऐतिहासिक लड़ाई को विदेशी जन कवि की कल्पना मानते हैं और हमारे पूर्वज आर्यों को कहते हैं कि वे भारत में बाहर से आये हैं। जब हमारी स्मृति में पृथु हैं, जिसने पृथ्वी को गौरवान्वित किया, हम मनु को जानते हैं, जिन्होंने मानव को सुसंस्कृत बनाया, हम सृष्टि संवत को भी जानते हैं, लेकिन हमारी स्मृति में यह क्यों, नहीं कि हम भारतीय नहीं हैं ? हमारे पूर्वज आर्य कहीं बाहर से आये हैं। हे आर्यों की सन्तान। मेरे देश के इन मासूम बच्चों का क्या होगा ? जिन्हें पढ़ाया जाता है कि आपके पूर्वज आर्य घुमक्कड़ थे, ग्वाले थे, बाहर से आये, अतः यह देश आपका नहीं है, तो इस बारे में आपकी राय क्या होगी



नष्टे मूले नैव फलं न पुष्पम्



जिस देश की सभ्यता एवं संस्कृति को मिटाना हो तो उस देश का इतिहास मिटा दो। स्मारक, साहित्य तथा वास्तविक संपत्ति चरित्र को मिटा दो। संसार के नक्शे से फिर वह देश स्वतः ही मिट जाएगा।



अश्लील साहित्य की सार्वजनिक स्थानों पर बिक्री की खुली छूट, चित्रहार, गंदी फिल्में, गान्धर्व, पैशाच, राक्षस आदि म्लेच्छ विवाह की जिस राष्ट्र में खुली छूट हो, उस देश की सभ्यता व संस्कृति स्वतः नष्ट हो जाएगी। इसी तरह विदेशी जनों पाश्चात्यता के गुलाम भारतीयों ने भारतवर्ष का नाश करने के लिए, भारत के स्वाभिमान व सभ्यता संस्कृति को नष्ट करने के लिए निम्न उपाय निकाल डाले।



आर्यों का आदि देश मध्य एशिया मानकर, भारत को अनेक देशों का उपमहाद्वीप मानकर, वास्को-डि-गामा के आगमन से भारत के इतिहास का श्रीगणेश करके, जैसे कि उसके पहले भारत कहीं खो गया था, जो उसे खोज निकाला ? मिथ्या वेद भाष्य करके जैसे राष्ट्रीय अनुसंधान प्रशिक्षण परिषद् की प्राचीन भारत नामक पुस्तक में है :-



1. आर्यों का जीवन स्थायी नहीं था।

2. ऋग्वेद के दस्यु संभवतः इस देश के मूल निवासी थे।

3. हड़प्पा संस्कृति का विध्वंस आर्यों ने किया।

4. अथर्ववेद में भूत प्रेतों के लिए ताबीज।

5. पशुबलि के कारण बैल उपलब्ध नहीं।



भला इन षड्यंत्रों से भारत को कब तब बचा पायेंगे ? राष्ट्रीय स्वदेशाभिमान, स्वाभिमान, भारतीय सभ्यता-संस्कृति को कैसे सुरक्षित रखा जा सकेगा ? इस पुस्तक का लेखक कृषि विज्ञान में स्नातकोत्तर तो है लेकिन किसी भी विश्वविद्यालय से इतिहास विषय का स्नातक नहीं है, न ही इसने इतिहास विषय में विशेष योग्यता ही प्राप्त की है, किन्तु विद्यार्थी अवस्था से ही भारतीय सभ्यता संस्कृति के प्रति इसकी विशेष रुचि व अनुराग रहा है और इसकी यह इच्छा तब से ही थी कि इतिहास जैसे महत्त्वपूर्ण विषय के पठन-पाठन के क्रम में शोधपूर्ण प्रामाणिक परिवर्तन अवश्य किये जायें। इसके अलावा लेखक ने प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए इतिहास विषय का गहन अध्ययन किया। वह प्रशासनिक अधिकारी तो न बन सका, क्योंकि भ्रांतिपूर्ण इतिहास, इसकी शुष्कता अंधकार युग को दूर कर इसे ऐसे रूप में जनता के सामने उपस्थित करने में लग गया, जिससे कि लोग पुरातनकाल के इतिहास के पठन-पाठन में परिस्थितियों से तुलना कर लाभान्वित हों, इसी उद्देश्य को सामने रख दिव्य भारत के प्राचीन गौरवशाली इतिहास की एक झलक शोधपूर्ण तरीके से संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत की गयी है।



यहां यह भी बता देना आवश्यक है कि लेखक यह दावा कदापि नहीं करता कि इस पुस्तक में जो घटनाएं लिखी गयी हैं वे सब निर्भ्रान्त और ठीक ही हैं, कारण इतिहास एक ऐसा अगाध और अपार विषय है कि किसी भी ऐतिहासिक सिद्धांत के विषय में यह कह देना कि बस, यही परम सत्य है, बड़े दुस्साहस का काम है, क्योंकि इतिहास के अन्वेषण का कार्य जारी है और आगे भी जारी रहेगा। कारण सहित कार्य को दिखाने वाला ही पूर्ण इतिहास होता है। इतिहास को बुद्धि से भी परखकर पढ़ना चाहिए, क्योंकि इतिहास में झूठी कथाएं भी हो सकती हैं तथा इतिहास में कई सच्चे वाक्य आश्चर्यजनक भी होते हैं। जैसे प्राचीनकाल में आज से अधिक विज्ञान था।



विदेशियों ने हमारे इतिहास को मोम का पुतला बना दिया है। जिधर चाहते हैं खींच ले जाते हैं। पश्चिमी इतिहासविदों और विद्वानों यथा म्योर, एलफिंस्टन, मनसियर डेल्बो, पोकाक, विलियम कार्नेट डा. जार्ज पोलेस, डेल्स एवं एलिजाबेथ राल्स आदि ने भी यह रहस्योद्धाटन किया है कि मार्टिन व्हीलर, स्टुअर्ट पिगट और जान मार्शल जैसे विद्वानों ने भी तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा है। अतः शोधर्पूर्ण गंभीरता से तर्कपूर्वक अपने इतिहास पर विचार करना हम सभी भारतवासियों का श्रेष्ठ कर्त्तव्य है, ताकि हमारी सभ्यता एवं संस्कृति इस तामसी विचारों वाले संसार में, जो कीचड़ से भी बद्तर है, में कमल की भांति खिल उठे।

धियो यो न प्रचोदयात्।

तेजपाल सिंह धामा



दिव्य भारत की कीर्ति कथा

अत्र ते कीर्तयिष्यामि वर्ष भारत भारतम्।

प्रियमिन्द्रस्य देवस्य मनोवैवस्वतय च।।

पृथोस्तु राजन्वैन्यस्य तथेक्ष्वाकार्महानत्मन।

ययातेरम्बरीषस्य मान्धातुर्नहुषस्य

तथैव मुचुकुन्दस्य शिषैरौशनिरस्य।

ऋषभस्य तथैलस्य नृगस्य नृपतेस्तथा।

कुशिकस्य च दुर्धर्ष गाधेश्चैव महात्मनः।

सोमकस्य च दुर्धर्ष दिलीपस्य तथैव च।।

अन्येषां च महाराज क्षत्रियाणां बलीय साम्।

सर्वेषामेव राजेन्द्रप्रियं भारत भारतम्।।

महाभारत, भीष्म पर्व अ. 9 श्लोक 5-9



भावार्थ: आओ हे भारत अब मैं तुम्हें भारतदेश का कीर्तिमान सुनाता हूं। वह भारत जो इन्द्रदेव को प्रिय हैं, जो मन वैवस्वत, आदिराज पृथुवैन्य और महात्मा अक्ष्वाकु को प्यारा था, जो भारत ययाति, अम्बरीष, मान्धाता, नहुष मुचुकुन्द और औशीनर शिवि को प्रिय था; ऋषभ ऐल और नृग जिस भारत को प्यार करते थे; और जो भारत कुशिक गाधि, सोमक, दिलीप और अनेकानेक शक्तिशाली सम्राटों को प्यारा था; हे नरेन्द्र ! उस दिव्य देश की कीर्तिकथा मैं तुम्हें सुनाऊंगा।

अध्याय 1

सृष्टि रचना

रचना सृष्टि की उत्पत्ति से ही प्रारंभ होता है, लेकिन उत्पत्ति का जिक्र आते ही सर्वप्रथम प्रश्न उठता है कि सृष्टि का रचनाकार है कौन ? सृष्टि की रचना का विचार जिसके मन में आया वह शक्ति क्या है ? अकेली है ? या अनेक हैं ? आज का व्यक्ति आंख मूंदकर कोई बात मान लेने को तैयार नहीं। वह हर बात को विज्ञान की कसौटी पर कसना चाहता है। अभी तक बड़े छोटे, खरे खोटे की पहचान का सर्वोत्कृष्ट आधार विज्ञान ही माना जाता है।




विज्ञान अभी तक ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करता। भौतिकवादियों का कहना है कि सृष्टि की अंतिम सत्ता न आत्मा है न परमात्मा। यह सत्ता विद्युत की तीन तंरगों इलेक्ट्रान प्रोटान तथा न्यूट्रान का अविरल प्रवाह है। सृष्टि ह्रास की बात विज्ञान स्वीकार करता है और यदि सृष्टि बनती-बिगड़ती है तो विद्युत तंरगों का प्रवाह विच्छेद हो जाता है और फिर प्रवाहित हो जाता है। भौतिकी के अनुसार कोई गति बिना गति देने वाले के नहीं हो सकती और यदि गति देने वाला न हो तो शुरू में ही तरंगों का प्रवाह कैसे प्रवाहित होगा ? और विच्छेद हो जाने पर पुनः किसी अन्य शक्ति के बिना गतिमान कैसे होगा ? वह अन्य शक्ति ईश्वर के अलावा और क्या हो सकती है ?

सोमवार, 11 जून 2012

2012 महाविनाश या नये युग का आरंभ....अशोक कुमार शर्मा

2012 Mahavinash Ya Naye Yug Ka Arambha











प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश...

source......http://pustak.org/home.php?bookid=7413
17 दिसम्बर, सन् 2008 में नासा ने पृथ्वी के भीतरी चुम्बकीय क्षेत्र में सौर-कणों की एक परत की खोज की और यह निष्कर्ष निकाला कि अगली उच्च सौर गतिविधि सन् 2012 में होगी। उस समय पृथ्वी इस शताब्दी का सबसे भयानक विस्फोट देखेगी। अगर सन् 2012 में पृथ्वी को ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा, तो भी ऐसे बहुत से विध्वंसों से पृथ्वी के तबाह होने की पूरी आशंका है।




फ्रांस में निर्मित सर्न हैड्रॉन कोलाइडर मशीन जो दुनिया की सबसे बड़ी और आधुनिक मशीन है, अचानक ही ब्लैक होल पैदा कर देगी। यह ब्लैक होल धीरे-धीरे पृथ्वी समेत सौरमण्डल के सभी ग्रहों को निगल जाएगा।

हमारी पृथ्वी एक ऐसे धूमकेतु की ओर तेजी से बढ़ रही है जिसकी टक्कर पृथ्वी के समस्त प्राणियों और पेड़-पौधों को खत्म कर देगी।



आज इंटरनेट और वेबसाइटें जीवित बचने की तकनीकों से भरी पड़ी हैं और अकस्मात ही 21 दिसम्बर, सन् 2012 सभी के लिए चर्चा का विषय बन गया है। एक ऐसा दिन जिसे कई प्राचीन सभ्यताओं और भविष्यवाणियों में प्रलय का दिन बताया गया।

क्या सचमुच हम सभी 21 दिसम्बर, 2012 को समाप्त होने जा रहे हैं ?

क्या माया कैलेंडर मिस्र और अन्य प्राचीन सभ्यताओं में इसी प्रलय का जिक्र किया गया है ?



क्या यह सत्य है कि दिसम्बर 2012 में सूर्य आकाश गंगा के केन्द्र में होगा और महाविनाश का कारण बनेगा ?

क्या निब्रू और हरकोल्यबस ग्रह पृथ्वी की ओर बढ़ रहे हैं ?

क्या हम वैश्विक विनाश की ओर बढ़ रहे हैं ?



प्रगैतिहासिक काल से अनगिनत ऐसी भविष्यवाणियाँ की जा चुकी हैं जिसमें पृथ्वी के सम्पूर्ण विनाश की बात कही गई। क्या वह समय आ गया है ? नॉन फिक्शन लेखक अशोक कुमार शर्मा, पीएचडी, जिन्होंने पहली बार नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियों की व्याख्या की और कई बेस्ट सेलर पुस्तकें, जैसे द कम्प्लीट प्रोफेसिस ऑफ नास्त्रेदमस, ‘विश्व प्रसिद्ध भविष्यवाणियां’, ‘द प्रोफेसिस फॉर द न्यू मिलेनियम’ तथा ‘द रेयर प्रीडिक्शन्स’ प्रस्तुत कीं।

इस पुस्तक में अब तक की सभी भविष्यवाणियों का विश्लेषण करके क्या निष्कर्ष निकाला गया है आप स्वयं पढ़ें।

आधुनिक दुनिया के डर और भविष्यवाणियों से संबंधित एक तथ्यपरक यात्रा।

प्रथम अध्यायविषय-प्रवेश

यद्यपि संसाधनों और मूल ढाँचों की कमी तो प्राचीन या आदिम सभ्यताओं को रही होगी परन्तु फिर भी उनके पास ब्राह्मण्ड एवं आकाशीय घटनाओं के बारे में विशिष्ट ज्ञान उपलब्ध था। उनके पास ऐसे सन्त, भविष्यवेत्ता और खगोलशास्त्रियों, ज्योतिषियों इत्यादि का समर्थन करने की एक पूरी परम्परा रही थी। लगभग सम्पूर्ण विश्व में न जाने कितनी वेधशालाएं मंदिर इत्यादि मिलते हैं जिससे ग्रह नक्षत्रों एवं अन्य आकाशीय पिण्डों का अवलोकन होता था। हम देखते हैं कि प्राचीन काल में खगोलशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र भविष्यवाणी कथन के प्रारंभिक विकास में तीन मूलभूत विशेषताएं थीं–



1. खगोलशास्त्री ग्रह नक्षत्र की चालों का सूक्ष्म अध्ययन एवं गणना तो करते थे, पर उनका उद्देश्य सिर्फ अपने शासकों के हितों की ओर ही केंद्रित था। इसलिए इस ज्ञान को गुप्त ही रखा गया।



2. राशिचक्र महीनों (Zodiac months) की खोज की संभावना बनी सूर्य के मार्ग पर दीर्घवृत्तीय चलनों के सिद्धांतों से, जिसमें पूरे वर्ष की 12 राशि-समूहों में विभाजित कर दिया गया जिससे हर भाग की माप 30॰ आए।



3. प्राचीन खगोलशास्त्रियों ने सूर्य व चन्द्र की गतियों के अध्ययन हेतु कुछ नियम भी बनाए। सितारों के प्रमुख समूहों में जानवरों की आकृतियों के साथ सादृश्य खोजा गया और इस प्रकार खगोलशास्त्र में कुछ नई चीजों का समावेश हुआ। खगोलशास्त्र के कई स्कूल पैदा हो गए और कई सिद्धांत या पद्धतियाँ पैदा हुई। इस ज्ञान को मिट्टी के आकारों तथा चित्रात्मक पाठ के साथ सहेजा गया। धीरे-धीरे हर विकासशील सभ्यता के पास आकाशीय गतियों के आधार पर भविष्यवाणी करने का एक खास तरीका आ गया।



भविष्य कथन के बारे में ऐसा दावा किया जाता है कि खगोलशास्त्र में दस्तावेजों की बहुलता के साथ कई संहिताएं, कई देशों में आज से लगभग 2500 वर्ष पहले तैयार की गई थीं।

इसका विवरण भारत में सर्वप्रथम वेदों में मिलता है जिसमें कई खगोलशास्त्रीय धारणाओं का उल्लेख है। ऋग्वेद में ब्रह्मण्ड के उद्भव और बनावट के बारे में कई मेधावी उक्तियाँ मिलती हैं जैसे पृथ्वी गोलाकार होने के कारण स्वयं समर्पित रहती है तथा वर्ष के 360 दिवसों को बारह से भाग करने पर 30 दिनों का एक महीना बन जाता है। प्रागैतिहासिक काव्य-ग्रन्थों, यथा रामायण एवं महाभारत में भी खगोलशास्त्र के बड़े तर्क-सम्मत संदर्भ हैं तथा भविष्यवाणी की कला का भी उल्लेख है।



प्राची भारतीय खगोलशास्त्रियों जैसे लगधा, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, भास्कर, ब्रह्मगुप्त, लल्ला, श्रीपति एवं वटेश्वर ने कई पुस्तकों का भी प्रणयन किया। प्राचीन युग में खगोलशास्त्रीय उपकरणों एवं गणित के आधार पर सूर्य माप और काल-गणना बड़ी चतुरता से की गई।



कई विदेशी यात्रियों ने प्राचीन भारत में इस कला के विकास पर काफी विशुद्धता से वर्णन किया है। उनके अनुसार यहाँ वाचनालयों में बड़ी दुर्लभ पुस्तकें उपलब्ध थीं जिनको बाद में मंगोल एवम् रोमन लुटेरों ने लूटा और बचा भी लिया।

शीघ्र ही ज्ञान और अनुभव के आधार पर भारत, मिस्र और यूनान के आने वाले समय को पहले से जानने के लिए रुचि पैदा होने लगी। खगोलशास्त्रीगण ग्रहण, भूकम्प, बाढ़, सूखा, अकाल इत्यादि के बारे में भविष्यवाणी कर और शासकों को आगाह करने लगे। कुछ एक राज्यों में तो राज-ज्योतिषी का पद भी बना दिया। इस प्रकार जन्मकुंडली-ज्योतिष का कई भारतीय राज्यों में विकास होने लगा। मिस्र और रोम में भी ज्योतिष लोकप्रिय होने लगी। किसी जातक की जन्म कुंडली बनाना और ग्रहों की स्थिति के अनुसार उसके आगामी जीवन के बारे में बताने की पद्धति का निर्माण शासक प्राचीन एवं यूनानी विद्वानों की महत्ती उपलब्धि है।



यूनानी खगोलशास्त्रीय हिप्पारकूस को श्रेय जाता है कि उसने अयनों (प्रिसेशन ऑफ दी इक्वेनॉक्सेस) का सिद्धांत विकसित किया जिससे किसी व्यक्ति के भाग्य पर ग्रहों का प्रभाव स्पष्ट होता है। प्रारंभ के ज्योतिष विस्तृत विवरण के साथ आकाशीय पिण्डों की चाल का अध्ययन करने में सक्षम हो चुके थे। उन्होंने पाया कि अयनों (इक्विनॉक्स) की प्रक्रिया साल में दो बार होती है जब पृथ्वी अपने अयन से सूर्य की ओर या उससे परे नहीं झुकी प्रतीत होती है। अयन या इक्विनॉक्स शब्द उन तिथियों का प्रतीक है जब ऐसा होता है। शब्द ‘इक्विनॉक्स’ लैटिन के शब्द ‘एक्यूस’ (बराबर) से निकला है और ‘नॉक्स’ का अर्थ रात्रि होता है क्योंकि इक्विनॉक्स के आस-पास रात और दिन की अवधि लगभग बराबर ही रहती है।



मध्यकाल में ज्योतिषी (एस्ट्रोलॉजर्स) को गणितज्ञ कहा जाता था। ऐतिहासिक दृष्टि से प्रारंभ में मैथमैटिक्स शब्द का प्रयोग उन विद्वानों के लिए होता था जो ज्योतिष शास्त्र, खगोलशास्त्र और गणित में माहिर होते थे। चूंकि औषधि-विज्ञान भी थोड़ा-बहुत ज्योतिष पर निर्भर करता है इसलिए चिकित्सक लोग भी गणित और ज्योतिष का अध्ययन करने लगे। लेकिन मध्ययुग तथा पुनर्जागरणकालीन ज्योतिषियों ने ग्रहचाल अध्ययन की ताकत मोल नहीं ली और चेहरा देखकर ही भविष्यवाणी करने में लिप्त रहे। इन लोगों में कीरोमैन्सी (पामिस्ट्री या हस्तरेखा शास्त्र) भी पढ़ना प्रारम्भ किया और उसी आधार पर जन्मकुण्डलियां भी बनाने लगे।

नई राहें नए इरादे.......बराक ओबामा....प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश.....

source....http://pustak.org/home.php?bookid=7428Nayee Rahen Naye Irade












आज पूरा विश्व एक परिवर्तन चाह रहा है। असफल नीतियों और पथभ्रष्ट राजनीति ने ऐसी भयावह स्थिति पैदा कर दी है, जिसमें हर ओर केवल भटकाव और उदासी फैली है।


ऐसे में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने आशा की एक किरण दिखाई है। उनका विश्वास है कि दृढ़-निश्चय से ईमानदारी के साथ सबको साथ लेकर चलने की मंशा से हर विषम परिस्थिति का सामना किया जा सकता है और विकास के पथ पर आगे बढ़ा जा सकता है। वे कहते हैं कि हमने कठिनाइयों और अपने हिस्से की असफलताओं का सामना किया; परंतु उनसे सीखा कि चुनौती चाहे जितनी भी बड़ी हो और हालात कितने भी बुरे हों, परिवर्तन हमेशा संभव है; यदि आप उसके लिए काम करने, संघर्ष करने और सबसे बढ़कर उसमें विश्वास रखने के लिए तैयार हैं।

सकारात्मक परिवर्तन की इसी ललक को मन में जाग्रत् करने के लिए प्रेरित करती है विचारोत्तेजक तथा दिशा-निर्धारक पुस्तक नई राहें, नए इरादे।

अमेरिका की आशाहम इस समय एक कड़ी चुनौती और महान् अवसर के दौर में हैं। पूरे अमेरिका में परिवर्तन की माँग को लेकर समवेत स्वर उठ रहे हैं। अमेरिकावासी कुछ सामान्य चीजें चाहते हैं, जो पिछले आठ वर्षों में वाशिंगटन उन्हें दे नहीं पाया है–एक ऐसी अर्थव्यवस्था, जो कड़ी मेहनत करनेवालों के प्रयासों की कद्र करती हो; एक ऐसी सुरक्षा नीति, जो हम सबके सामने खड़े खतरों का मुकाबला करने के लिए दुनिया को साथ लेकर चलती हो तथा अमेरिका को अधिक सुरक्षित बनाती हो; एक ऐसी राजनीति जो लोगों को दलगत सोच से ऊपर उठाकर उन्हें सामूहिक हितों के लिए कार्य करना सिखाती हो। उनकी माँगें बहुत बड़ी नहीं हैं। यह ऐसा परिवर्तन है जिसके अमेरिकावासी अधिकारी हैं।



फिर भी हमारा देश युद्ध में फँसा हुआ है, हमारी अर्थव्यवस्था अस्थिर है और हमारी पृथ्वी संकट में है। अमेरिकी परिवार एक ऐसी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के साथ जी रहे हैं, जिसकी लागत तो अधिक है परंतु लाभ कम है, जो परिवारों और व्यवसायों को दिवालिया बना देती है; ऐसे स्कूलों के साथ जो बहुत बड़ी संख्या में हमारे बच्चों के लिए अवसर पैदा नहीं कर पाते तथा एक ऐसी सेवानिवृत्ति व्यवस्था, जो कदाचित् अपने वादे के अनुसार नहीं दे पाएगी। देश भर में लोग अपनी गाड़ियों में ईंधन तथा शॉपिंग ट्रालियों में सामान भरने के लिए रिकॉर्ड कीमतें अदा कर रहे हैं। बहुत बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक इस बात से चिंताग्रस्त हैं कि क्या वे अपने बच्चों का पालन-पोषण सुरक्षित वातावरण में कर पाएँगे तथा उन्हें एक बेहतर जीवन प्रदान कर सकेंगे ?



परंतु ये चुनौतियाँ अपरिहार्य नहीं थीं। वे दोषपूर्ण नीतियों तथा असफल नेतृत्व की देन हैं। जिस तरह से हमारी दुनिया और अर्थव्यवस्था बदली है, वाशिंगटन की सोच इक्कीसवीं सदी की कसौटियों के साथ उसी रफ्तार से नहीं चल पाई। अमेरिका की प्रतिस्पर्द्धात्मक क्षमता में निवेश करने या राष्ट्रीय सुरक्षा पर मँडरा रही नई चुनौतियों का सामना करने के बजाय हमने सर्वाधिक संपन्न अमेरिकियों के टैक्स में कटौती तथा इराक में एक ऐसे निस्सीय युद्ध के प्रति प्रतिबद्धता देखी है, जो हमें अधिक सुरक्षित नहीं बना रहा है और साथ ही हमारी सुरक्षा को जिन शक्तियों से सचमुच खतरा है, उनसे भी हमारा ध्यान हटा रहा है। परिणामस्वरूप, बहुत कम अमेरिकियों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था का लाभ उठाया है तथा अधिकाधिक अमेरिकी ज्यादा मेहनत करके कम प्रतिफल पा रहे हैं और हमारा देश अपनी नियति पर से नियंत्रण खोता जा रहा है।



इस नई सदी के आरंभिक वर्ष कुछ अलग होने चाहिए थे–जब अमेरिका के नेताओं में इतनी शक्ति थी कि वे प्रतिकूलता को अवसर में बदल सकते थे, इतनी बुद्धिमत्ता थी कि वे निकट भविष्य को देख सकते थे, इतना साहस था कि वे पारंपरिक सोच और घिसे-पिटे विचारों को चुनौती दे सकते थे। हम अपनी अर्थव्यवस्था को नए सिरे से गढ़ सकते थे तथा नए खतरों का सामना उन तरीकों से कर सकते थे, जिनमें भावी संभावना छिपी हुई हो।



इसके बजाय ये पिछले आठ वर्ष अप्रतिष्ठित विचारों के प्रति आसक्ति और अड़ियलपन के लिए याद किए जाएँगे। जरा सोचिए कि यदि हम एकजुट होते और मिलकर कार्य करते तो हम क्या कर सकते थे ? अपने बच्चों के लिए विश्वस्तरीय शिक्षा के प्रति सचमुच प्रतिबद्ध होने और उन्हें कल के रोजगारों के लिए तैयार करने के बजाय हमने ‘कोई बच्चा पीछे न रह जाए’ कानून पास कर दिया, जिसके उद्देश्य तो सही थे, परंतु जिसके लिए पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं कराया गया तथा हम शिक्षकों, प्राचार्यों और स्कूल बोर्डों को सशक्त बनाने में असफल रहे। खनिज तेल की अपनी तल को छोड़ने के बजाय हम उस रास्ते पर चलते रहे जो हमारे डॉलरों को निरंकुश और अत्याचारी शासकों के पास भेजता रहा है, हमारी पृथ्वी को खतरे में डालता है और हम अमेरिकियों को एक गैलन पेट्रोल के लिए 4 डॉलर खर्च करने के लिए मजबूर करता है। हमारी खस्ताहाल सड़कों और पुलों के पुनर्निर्माण एवं नवप्रवर्तन में निवेश के बजाय हमने समृद्धतम अमेरिकियों को करों में छूट देने के नाम पर करोड़ों डॉलर खर्च कर दिए। सभी अमेरिकियों के लिए स्वास्थ्य-सेवा लागतों में कमी करने के बजाय हमने कुछ नहीं किया तथा प्रीमियमों, सह-भुगतान और जेब खर्चों को आसमान छूते देखा है। और, जब हम अल कायदा को खदेड़ रहे थे तब दुनिया को अपने साथ लेने के बजाय हम इराक में एक ऐसे युद्ध पर सौकड़ों अरब डॉलर खर्च करते रहे, जिसे कभी अधिकृत या शुरू नहीं किया जाना चाहिए था।



पिछले आठ वर्ष अमेरिकी जनता की नहीं वरन् अमेरिकी नेतृत्व की असफलता के वर्ष रहे हैं।

बराक ओबामा का विश्वास है कि हम अपनी दिशा बदल सकते हैं और ऐसा हमें करना ही चाहिए। वे भविष्य को आशावादिता के साथ देखते हैं। हमारे देश ने पहली बार विपत्ति का सामना नहीं किया; और जब भी किया है, हमारी जनता ने दृढ़ इच्छाशक्ति जुटाकर उन चुनौतियों से निपटने के उपाय खोजे हैं। यह घड़ी कुछ अलग नहीं है। मिल-जुलकर कार्य करने से हम अपनी अर्थव्यवस्था को फिर से जीवंत बना सकते हैं तथा प्रत्येक परिवार को सफल होने के अवसर प्रदान कर सकते हैं। हम सब को संकट में डालनेवाले अंतरराष्ट्रीय खतरों का मुकाबला करने में हम दुनिया का नेतृत्व कर सकते हैं। हम अपने बुनियादी अमेरिकी मूल्यों का पुनः सबलीकरण करके अपने राष्ट्र को परिपूर्ण बना सकते हैं और इस समय हम ऐसे निवेश कर सकते हैं, जो इस नई वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिका को सबसे आगे खड़ा कर देंगे।



इस चुनाव में विकल्प वामपंथ और दक्षिणापंथ या रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स के बीच नहीं है। हमारे सामने विकल्प–भूतकाल व भविष्य के बीच है।



वास्तविक परिवर्तन लाने के लिए हमें एक नए प्रकार की राजनीति की आवश्यकता है, जो अमेरिकी जनता को अपनी सरकार से पुनः जोड़े और जो मतपेटी में एक वोट का ही आश्वासन न दे, बल्कि उन्हें एक ऐसी आवाज प्रदान करे जिसकी वाशिंगटन उपेक्षा नहीं कर सकता। प्रत्येक पृष्ठभूमि और देश के प्रत्येक कोने से आए अमेरिकी एक ऐसी राजनीति की लालसा रखते हैं जो हमें तोड़कर खंड-खंड करने के बजाय एकता के सूत्र में बाँधे। वे जो कुछ चाहते हैं–और हमारे देश को जिसकी जरूरत है–वह अंध-अविवेकी सहमति नहीं है। अमेरिकी हर बात पर सहमत नहीं होते और न ही हमें होना चाहिए। परंतु हमें परिभाषित करनेवाले सभी लेबलों और श्रेणियों के बावजूद अमेरिकी शालीन, उदार एवं संवेदनशील लोग हैं, जो अपने सामने खड़ी सामूहिक चुनौतियों और अपनी सामूहिक आशाओं को लेकर एक हैं। जब उस बुनियादी अच्छाई और देशभक्ति का आह्वान किया जाता है, तब हमारा देश उनका भरपूर परिचय देता है। बराक ओबामा का उसमें गहरा विश्वास है। राष्ट्रपति के रूप में वे इस ओवल कार्यालय के वर्तमान पदाधिकारी की तुलना में बिलकुल अलग तरह से कार्य करेंगे।



राष्ट्रपति के रूप में बराक ओबामा पहले दिन से ही कार्यशैली में ऐसे आचार संबंधी ऐतिहासिक सुधार करेंगे, जो व्हाइट हाउस को पीपल्स हाउस में तब्दील कर दे।

बराक ओबामा• उस रिवॉल्विंग दरवाजे को बंद कर देंगे, जो सरकारी कर्मचारियों के लिए अपनी प्रशासकीय जिम्मेदारियों को सत्ता के दलालों के रूप में इस्तेमाल किया जाना संभव बना देता है।



• बिना बॉली के ठेकों की बुराई समाप्त कर देंगे तथा पदासीन रीजनीतिज्ञों को उपहार देना पूरी तरह से प्रतिबंधित कर देंगे।



• नौकरियाँ दलगत या विचारधारा के आधार पर नहीं, बल्कि केवल योग्यता और अनुभव के आधार पर देंगे।



• सरकार को और अधिक खुली व पारदर्शी बनाने के लिए इंटरनेट का उपयोग करेंगे, ताकि कोई भी यह देख सके कि वाशिंगटन का काम लोगों की सेवा करना है।



वाशिंगटन को चुस्त-दुरुस्त बनाकर हम देश के सामने खड़ी चुनौतियों का सामना करने में समर्थ होंगे। सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है–अर्थव्यवस्था को उछाल के साथ शुरू करना और यह सुनिश्चित करना कि अधिक-से-अधिक लोगों को उसका लाभ मिल सके।
 
                              क्या ऐसी ही कोई सोच हमारे किसीभी राजनेता मैं है ....?

यजुर्वेद युवाओं के लिए.........प्रवेश सक्सेना ..प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश..................

Yajurved Yuvaon Ke Liye











सारांश:






‘वेद : युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की तीसरी पुस्तक ‘यजुर्वेद : युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें यजुर्वेद के 112 मन्त्रों को ऋग्वेद की तरह दम शीर्षकों के अन्तर्गत समाहित किया गया है। ज्ञान-शिक्षा, स्वास्थ्य-योग, मानसिक स्वास्थ्य, धर्म-नैतिकता, अर्थ-धनैश्चर्य घर-परिवार, समाज, राष्ट्र, पर्यावरण तथा वेश्विकता जैसे विषयों पर इन मन्त्रों के माध्यम से चर्चा हुई है। यजुर्वेद मुख्यतः कर्म से सम्बद्ध है। यह कर्म यज्ञ है, जिसे यहाँ श्रेष्ठतम बताया गया है। पारम्परिक दृष्टि से ‘यज्ञ’ का सीमित अर्थ होता है–अग्नि में आहुति देना। परन्तु ‘यज्ञ’ का व्यापक अर्थ भी है, जहाँ समर्पण भाव मुख्य रहता है। अतः समाजोपयोगी सभी कर्म यज्ञ के अन्तर्गत आ जाते हैं।



इन मन्त्रों में ज्ञान, दीर्घायु व धन-सम्पत्ति तथा सुरक्षादि पाने के लिए प्रार्थनाएँ हैं। क्रीड़ा, योगादि शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। धर्म कर्तव्य तथा नैतिकता से जुड़ा है। यह लोभ प्रवृत्ति ही है, जिससे संसार में उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिलता है, इसी के कारण एक ओर भय व आतंक पनपते हैं तो दूसरी ओर पर्यावरण-प्रदूषण होता है। आधुनिक युग में यज्ञपरक जीवन परोपकार भावना से युक्त मानव-जनों की अपेक्षा है। शान्ति’ के लिए किया जाने वाला ‘शान्तिपाठ’ इसी वेद की देन है।

यजुर्वेदयजुर्वेद को मनुस्मृति में ‘वायु’ से सम्बद्ध बताया गया है। ऋग्वेद अग्नि तथा सामवेद सूर्य से सम्बद्घ है। ‘वायु’ गति का प्रतीक है। वायु यजुर्वेद की गति या कर्म सम्बन्धी विशेषता का परिचायक है क्योंकि गति और कर्म एक-दूसरे के पर्याप्त ही हैं। जहाँ गति होती है वहाँ कर्मशीलता होती है। अकर्मण्यता जड़ता का प्रतीक है, ठहराव का प्रतीक है। यजुर्वेद में कर्मशीलता की प्रधानता है, कर्म की मुख्यता है। ‘कर्म’ में ही यज्ञ करना भी निहित है। यज्ञ को यह वेद श्रेष्ठतम कर्म मानता है। यजुर्वेद ‘अध्वर्यु’ नामक पुरोहित के लिए है। जैसे ऋग्वेद में ‘होता’ देवों का आहवान करता, यज्ञ का निर्देशन करता था उसी प्रकार ‘अध्वर्यु’ यज्ञ का संपादन और संचालन करता था। इस कार्य में गति और वेग दोनों अपेक्षित हैं। यह गति कर्मेन्द्रियों-ज्ञानेन्द्रियों की गति है तथा मन का वेग भी है। विचारों का वेग तथा बुद्धि का प्रवाह भी।



यजुर्वेद का अर्थ है ‘यजुषों का वेद’–यजुष् शब्द के निम्न अर्थ हैं–वे मन्त्र जिनसे यज्ञयागादि किए जाते हैं। अनियताक्षरों से समाप्त होने वाले वाक्य को यजुः कहते हैं। गद्यात्मक मन्त्रों का नाम ‘यजुः’ होता है। जहाँ तक शुक्ल-यजुर्वेद का प्रश्न है वहाँ छन्दों का निर्देश सिद्ध करता है कि यह वेद छन्दात्मक है। कृष्णयजुर्वेद अवश्य ही गद्यात्मक है।



यजुर्वेद की शाखाएँ–महाभाष्यकार पतञ्जलि ने यजुर्वेद की एक सौ एक शाखाओं का उल्लेख किया है। इनमें से आज मात्र 6 शाखाएँ उपलब्ध हैं। यज़ुर्वेद के दो मुख्य भेद हैं–शुक्लयजुर्वेद तथा कृष्णयजुर्वेद। शुक्लयजुर्वेद की दो शाखाएँ माध्यान्दिन तथा काण्व हैं और कृष्णयजुर्वेद की चार शाखाएँ हैं–तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक तथा कपिष्ठलकठ।



शुक्लयजुर्वेद तथा कृष्णयजुर्वेद में भेद–शुक्ल और कृष्ण का भेद इन दोनों के स्वरूप पर आधारित है। इस वेद के दो सम्प्रदाय हैं–ब्रह्म और आदित्य। ब्रह्मसम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व कृष्णयजुर्वेद करता है तथा आदित्यसम्प्रदाय का शुक्लयजुर्वेद। इन दोनों का भेद इनकी विषयवस्तु से होता है। शुक्ल का अर्थ होता है श्वेत या शुद्ध। इसका शुक्लत्व इस बात में है कि इसमें केवल मन्त्रों का संग्रह है। दूसरी ओर, कृष्ण का अर्थ होता है काला या ‘अशुद्ध’। यहाँ ‘अशुद्ध’ का अर्थ ‘ग़लत’ नहीं है अपितु मन्त्र के साथ ब्राह्मणअंश के मिश्रण से है।



इसके अतिरिक्त शुक्लयजुर्वेद में केवल मन्त्र हैं, उनकी व्याख्याएँ तथा विभिन्न यज्ञों में उनके विनियोग (एप्लीकेशन) की बात नहीं बताई गई है। कृष्णयजुर्वेद में मन्त्रों के साथ उनकी व्याख्याएँ तथा आख्यान तो हैं ही, साथ ही उनके विनियोग भी बताए गए हैं।

एक और मत के अनुसार ‘कृष्णयजुर्वेद’ की शाखाओं का विस्तार प्रायः दक्षिण भारत में तथा ‘शुक्लयजुर्वेद’ का उत्तर भारत में है।



शुक्लयजुर्वेद की विषयवस्तु–शुक्लयजुर्वेद का एक नाम वाजसनेयी संहिता भी है क्योंकि याज्ञवल्क्य वाजस़नेयी इसके प्रथम आचार्य थे। इसकी कण्व तथा ‘माध्यन्दिन’ दो शाखाएँ हैं। सामान्य रूप से जब भी यजुर्वेद का उल्लेख होता है इसी वेद से अभिप्राय होता है। शुक्लयजुर्वेद में चालीस अध्याय हैं तथा 2086 मन्त्र हैं।



पहले तीन अध्यायों में दर्श (अमावस्या) और पूर्णमास तथा अग्निहोत्र और चातुर्मास्य से सम्बद्ध मन्त्र हैं। चतुर्थ से दशम अध्यायपर्यन्त अध्यायों में सोमयाग, वाजपेय तथा राजसूय नामक यज्ञों के मंत्र संगृहीत हैं। एकादश से अष्टादश अध्याय तक के मन्त्रों का विषय अग्निचयन है। उन्नीस से इक्कीस अध्याय तक सौत्रामणी यज्ञ के मन्त्र हैं। इस यज्ञ में अश्विनौ, सरस्वती तथा इन्द्र को पवित्र मन्त्र संकलित हैं। छब्बीस से उनतीस अध्यायों में विभिन्न यज्ञों के पूरक मन्त्र संकलित हैं। तीसवें अध्याय का विषय पुरुषमेध है। सर्वमेध यज्ञ के मन्त्र अगले तीन अध्यायों में संकलित हैं। चौंतीसवें में शिवसंकल्प के प्रसिद्ध मन्त्र हैं। अगले अध्याय में पितृमेध तथा छत्तीस से अड़तीस तक प्रवर्ग्य यज्ञ से सम्बद्ध मन्त्र संगृहीत हैं। अन्तिम अध्याय प्रसिद्ध ईशोपनिषद्र है।



इन चालीस अध्यायों में से पहले पच्चीस अध्याय को ही यजुर्वेद का मौलिक अंश माना जाता है। परम्परा के अनुसार 26-35 तक के अध्याय खिल अथवा प्रक्षिप्त हैं। भाषा और विषयवस्तु के आधार पर पाश्चात्य विद्वान् पहले 18 को ही मौलिक मानते हैं।



यजुर्वेद को मुख्यरूप से कर्मकाण्डपरक माना जाता है। ‘कर्म’ यहाँ ‘यज्ञ का पर्याय ही है। भले ही यह वेद ‘यज्ञुपरक’ है परन्तु प्रसग्ङानुसार अन्य-अन्य विषयों का समावेश भी यहाँ हुआ है। मनोविज्ञान, दर्शन, अध्यात्म तथा पर्यावर्ण सम्बन्धी प्रभूत सामग्री यहाँ उपलब्ध है।



16वें अध्याय में शतरुद्रीयहोम के प्रसंग में रुद्र की कल्पना तथा अवधारणा विवेचित हुई है। तत्त्कालीन व्यवसाय, पेशे तथा कलाकौशल आदि का परिचय 30वें अध्याय से मिलता है। पुरुषसूक्त तथा हिरण्यगर्भसूक्त के मन्त्र उल्लिखित हुए हैं। ‘शिवसंकल्प-सूत्र’ में मनोवैज्ञानिक तथ्यों का उदघाटन हुआ है। अन्तिम अध्याय तो ईशोपनिषद्र ही है जहाँ दार्शनिक भावों को अभिव्यक्ति दी गई है।

शिक्षा का सिद्धान्त

आशिक्षायै प्रश्निनमुपशिक्षाया अभिप्रश्निननं मर्यादायै प्रश्नविवाकम्।।

ऋषि :–नारायणः । देवता–विद्वान्। छन्दः–भुरिगत्यष्टः।

शब्दार्थ : (आशिक्षायै प्रश्निनं) शिक्षा के लिए प्रश्न पूछने वाले को, (उपशिक्षाया अभिप्रश्निन) अभ्यास के लिए जिज्ञासु को तथा (मर्यादायै प्रश्नविवाकम्) नियमव्यवस्था के लिए प्रश्नसमाधानकर्त्ता को (नियुक्त करो)।



व्याख्या : सामान्यतः आचार्य या गुरु शिष्य का आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक होता है। वह अनुभवहीन की स्वयं ज्ञानार्जित करने के लिए सहायता करता है। ‘‘आचार्यदेवो भव’ कहकर इसीलिए आचार्य का सम्मान किया जाता रहा है। भारतीय संस्कृति में अज्ञान से ज्ञान की ओर ले चलने वाले गुरु की महत्ता सदा से विद्यमान रही है। शिक्षा चाहे आध्यात्मिक हो या बौद्धिक–एक सुन्दर सिद्धान्त पर आधृत रही है। और वह सुन्दर सिद्धान्त है कि आचार्य या गुरु, आज की भाषा में कहें तो शिक्षक की भूमिका एक पथ-प्रदर्शक की है, गाइड की है। बाकी सब शिष्य या छात्र को स्वयं ही करना होता है। धर्म के सम्बन्ध में इसका अर्थ होगा कि हर व्यक्ति को स्वयं के लिए उन सत्यों का उदघाटन खुद करना होगा जो परमसत्य से सम्बन्द्ध हैं। या सीधे-सादे शब्दों में कहें कि ‘सत्य’ की या ‘परमसत्या’ की तलाश व्यक्ति को खुद करनी होती है। यह ‘तलाश’ प्रश्नों की अपेक्षा रखती है। यजुर्वेद का यह मन्त्रांश शिक्षा के चरम उद्देश्य को अभियञ्जित कर रहा है।



शिक्षा-शिक्षण या ज्ञान के लिए प्रश्नकर्ता को नियुक्त करना चाहिए। यह अनुभूत सत्य है कि जिस विषय को गहराई से जानना हो उसके लिए प्रश्न-प्रश्न मन में जागने चाहिए। असली शिक्षक वही जो व्यक्ति के मन में ‘प्रश्न’ जगा सके और सच्चा शिष्य या छात्र वह जो प्रश्न पूछने का साहस जुटा सके। ज्ञानार्जन की प्रथम सीढ़ी ‘प्रश्न’ ही है। प्रश्न अभ्यास के लिए भी ज़रूरी हैं। प्यारे बच्चों ! जानते हो न, तुम्हारी पाठ्यपुस्तकों में पाठ के अन्त में प्रश्न दिए रहते हैं। उनके उत्तर ढूँढ़ना, उन्हें लिखना, याद करना–यह सब शिक्षण-विधि के अन्तर्गत ही आता है। ‘अभिप्रश्निः’ का एक अर्थ है चारों ओर से प्रश्न करना। कोई भी विषय हो–उसका कोई एक बना-बनाया उत्तर नहीं होता। अनेक-अनेक आयाम होते हैं एक-एक विषय के गहराई से समझने के लिए तरह-तरह से सोचना होगा, तरह-तरह की समस्याएँ उठानी होंगी। फिर समाधान मिलेंगे। मन्त्र का अन्तिम अंश है–मर्यादा के लिए ‘प्रश्नविवाक’ होना चाहिए। मर्यादा उस व्यवस्था को कहते हैं जो मननशील मनुष्य स्वसम्मति से सबके पालन के लिए निश्चित करते हैं। मर्यादापालन एक प्रकार से आत्माशासन है। कहना न होगा शिक्षाप्राप्ति, ज्ञानार्जन या किसी भी आध्यात्मिक या वैज्ञानिक ख़ोज के लिए आत्मानुशासन की ज़रूरत होती है। आत्मानुशासन के लिए प्रश्नों का समाधानकर्ता चाहिए। प्रश्न पूछने में न संकोच करो, न उनके उत्तर ढूँढ़ने में आलस करो।



भारतीय शिक्षाव्यवस्था में छात्र की मौलिकता को प्रेरित करने के लिए ‘प्रश्न’ पूछने की स्वतन्त्रता सदा रही है। कुछ लोग भले ही मानते रहें कि शिष्य को आँख मूँदकर गुरु की बात माननी चाहिए या गुरु जो मार्ग खोजता है उसी पर चलने को शिष्य बाध्य होता है। वास्तव में गुरु का कार्य, शिक्षक की भूमिका शिष्य/छात्र में जिज्ञासा जगाने की ही है। आगे का मार्ग उसे खुद तयकरना होता है। ‘प्रश्न विवाक’ का अर्थ पंच या न्यायाधीश भी होता है। सत्य-असत्य, भले-बुरे का निर्णय जैसे पंच या न्यायाधीश करता है वैसे ही व्यक्ति को ज्ञानमार्ग पर चलते हुए प्रश्न-प्रतिप्रश्न करके अपने अनुभव में वृद्धि करनी चाहिए तथा स्वयं विवेक से भले-बुरे का निर्णय करना चाहिए।



रविवार, 10 जून 2012

भारत की आवाज़.......ए पी जे अब्दुल कलाम....

                 

                                                                       सारांश:
Bharat Ki Awaz

                          डॉ. कलाम का मानना है कि किसी भी देश की आत्मा उसमें रहने वाले लोग होते हैं, और उनकी उन्नति में ही देश की उन्नति है। आदर्शवाद से ओतप्रोत, लेकिन वास्तविकता से जुड़ी भारत की आवाज़ दर्शाती है कि व्यक्गित और राष्ट्रीय स्तर पर प्रगति संभव है, बशर्ते हम इस सिद्धांत पर चलें कि ‘‘देश किसी भी व्यक्ति या संगठन से बढ़कर होता है’’ और यह समझें कि ‘‘केवल सीमारहित मस्तिष्क ही सीमारहित समाज का निर्माण कर सकते हैं।’’


 
 
‘‘मुझे लगता है कि हमें देश के लिए एक अलग दृष्टिकोण की आवश्यकता है, ठीक वैसा ही दृष्टिकोण जैसा अंग्रेज़ों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम के समय हमारा था। उस समय राष्ट्रवाद की भावना बहुत प्रबल थी। भारत को एक विकसित राष्ट्र में बदलने के लिए आवश्यक यह दूसरा दृष्टिकोण एक बार फिर राष्ट्रवाद की भावना को शीर्ष पर लाएगा।’’







विकाश के लाभ उठाने के बाद अब भारत के लोग अधिक शिक्षा, अधिक अवसरों और अधिक विकास के लिए बेताब हैं। लेकिन समृद्ध और संगठित भारत के निर्माण का उनका यह सपना कहीं-न-कहीं चूर-चूर होता दिखाई दे रहा है : देश को बांटने वाली राजनीति, बढ़ती आर्थिक विषमता और देश तथा उसकी सीमाओं पर मौजूद डर और अशांति के दानव देश के मर्मस्थल पर चोट कर रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में देश और उसकी अवधारणा की रक्षा कैसे की जाए और विकास के लक्ष्य पर कैसे आगे बढ़ा जाए ?






यह पुस्तक कुछ ऐसे ही प्रश्न उठाती है और उनके उत्तर तलाशती है।






डॉ. कलाम का मानना है कि किसी भी देश की आत्मा उसमें रहने वाले लोग होते हैं, और उनकी उन्नति में ही देश की उन्नति है। आदर्शवाद से ओतप्रोत, लेकिन वास्तविकता से जुड़ी भारत की आवाज़ दर्शाती है कि व्यक्गित और राष्ट्रीय स्तर पर प्रगति संभव है, बशर्ते हम इस सिद्धांत पर चलें कि ‘‘देश किसी भी व्यक्ति या संगठन से बढ़कर होता है’’ और यह समझें कि ‘‘केवल सीमारहित मस्तिष्क ही सीमारहित समाज का निर्माण कर सकते हैं।’’






भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम देश के अब तक के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति सिद्ध हुए हैं। वे भारत के उन लाखों युवाओं के आदर्श हैं जो उन्हीं की तरह मेहनत और ईमानदारी से सफलता पाना चाहते हैं।






भारत की गिनती भी एक दिन विकसित देशों में की जाएगी, इसी विश्वास और संकल्प के साथ डॉ. कलाम राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बावजूद आज भी लोगों के बीच जाकर उनसे मिलते हैं, बातचीत करते हैं और उन्हें प्रोत्साहित करते हैं। लोग उनकी बात मंत्रमुग्ध होकर सुनते हैं, खासकर युवाओं के लिए उनकी कही हर बात विशेष महत्त्व रखती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि देश के पुनरुत्थान की अगर कोई उम्मीद शेष है, तो वह केवल डॉ. कलाम ही हैं। शायद इसी कारण राष्ट्रपति के रूप में वे जहां भी गए, और आज भी वे जहां भी जाते हैं, लोग उनसे अपने मन में जब-तब उठने वाले ढेरों प्रश्न करते हैं।






भारत की आवाज़ उनसे पूछे गए ऐसे ही कुछ बेहद दिलचस्प, प्रासंगिक और कुछ अप्रासंगिक लेकिन रोचक प्रश्नों का संकलन है। ये प्रश्न भारत के युवाओं के सपनों, सरोकारों और महत्त्वाकांक्षाओं की झलक पेश करते हैं, और डॉ. कलाम के उत्तर सशक्त, संगठित और समृद्ध भारत के निर्माण की राह दिखाते हैं।






यह पुस्तक विकसित भारत के निर्माण की राह दिखाती है। युवाओं को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।


—दैनिक ट्रिब्यून


‘नंबर वन’ तो अपने कलाम साहब हैं ही और इस पुस्तक से मालूम होता है कि वे अपने देश को बड़ा बनाने का सपना हकीकत में कैसे बदलते देखना चाहते हैं।


—खुसवंत सिंह


‘भारत की आवाज़’ पढ़ने से पता चलता है कि राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद भी कलाम इतने लोकप्रिय क्यों हैं। इस पुस्तक में कहीं कलाम एक दार्शनिक के रूप में नज़र आते हैं तो कहीं उनकी बातों में एक जननेता की झलक दिखाई देती है।


—तहलका


भारत की आवाज़


स्वतन्त्रता आंदोलन ने हमारे अंदर यह भाव पैदा कर दिया कि राष्ट्र किसी व्यक्ति या संस्था से बड़ा होता है। किन्तु विगत कुछ दशकों से यह राष्ट्रीय भाव लुप्त होता जा रहा है। आज आवश्यकता है कि सभी राजनैतिक दल आपस में सहयोग करें और इस ज्वलंत प्रश्न का उत्तर दें—‘‘भारत कब एक विकसित राष्ट्र बनेगा ?’’






धर्म-निरपेक्षता के सिद्धान्त के प्रति अटूट निष्ठा होना चाहिए। धर्म-निरपेक्षता हमारी राष्ट्रियता का आधार है और हमारी सभ्यता का एक प्रबल पक्ष है। सभी धर्मों के नेताओं को एक ही तरह का संदेश देना चाहिए जिससे लोगों के दिल-दिमाग में एकता का भाव पैदा हो जिससे हमारा देश खुशहाल और सम्पन्न हो सके।






आज समय की माँग है कि हर नागरिक अनुशासित आचरण करे, इससे जागरूक नागरिकों का निर्माण होगा। किसी देश के लोग जितने अच्छे होते हैं वह देश उतना ही अच्छा होता है। किसी देश की संरचना में वहाँ की जनता के






जीवन-मूल्य, नैतिकता और आचरण प्रकट होते हैं। ये बहुत महत्त्वपूर्ण कारक होते हैं जो निर्धारित करते हैं कि देश प्रगति के पथ पर चलेगा या फिर ठहराव के दौर से गुज़रेगा।






हमें अपने दैनिक जीवन में ईमानदारी, निष्ठा और सहनशीलता जैसे मूल्यों का पालन करना है। इससे हमारी राजनीति राष्ट्रनीति में बदल जाएगी। हमें सामाजिक स्तर पर यह सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा कि हम अपने देश के लिए क्या कर सकते हैं।






हमने अपने पूर्वजों द्वारा किए गए कार्यों और उनकी छोड़ी गई विरासत से बहुत लाभ उठाया है। अब यह हमारा अधिकार और दायित्व है कि हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए एक सकारात्मक परंपरा स्थापित करें जिसके कारण वह हमें याद रखेगी।






यदि 54 करोड़ युवा इस भावना के साथ काम करें ‘‘मैं यह कर सकता हूँ’’, ‘‘हम यह कर सकते हैं’’ और ‘‘भारत यह कर सकता है’’, तो भारत को विकसित देश बनने से कोई नहीं रोक सकता






व्यक्ति का विकास अधिक महत्त्वपूर्ण है या राष्ट्र का ? व्यक्ति का विकास राष्ट्र के विकास में किस प्रकार सहायक हो सकता है ?


—हीबा जेमी, लेडी डोआक कॉलेज, मदुरै


किसी भी राष्ट्र का विकास उसकी जनता के द्वारा ही किया जाता है। इसलिए, व्यक्ति का विकास ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है। हमें व्यक्ति के विकास का एक ऐसा कार्यक्रम बनाना चाहिए, जिससे ऐसे जागृत नागरिकों का निर्माण हो, जो राष्ट्र के विकास का कार्य कर सकें।






आपके विचार में, सैनिक, शिक्षक, डॉक्टर, और वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ—इनमें से देश की सर्वोत्तम सेवा कौन करता है ?


—तरन्नुम, केन्द्रीय विद्यालय, पठानकोट


इनमें से प्रत्येक व्यक्ति देश की उत्तम सेवा कर सकता है।






• सैनिक का कार्य है देश के एक अरब से अधिक नागरिकों की रात-दिन इस तरह सुरक्षा करना कि वे शान्तिपूर्वक देश के विकास का कार्य करते रह सकें।


• शिक्षक का कार्य है जागृत नागरिकों और भविष्य के नेताओं का निर्माण।


• डॉक्टर का ध्येय-वाक्य होने चाहिए—‘मानवता के कष्टों का, अपने दिमाग का सही उपयोग करते हुए निवारण करना।’


• वैज्ञानिक का कार्य है निरन्तर विकास के लिए नये-नये उपाय प्रदान करना।


• राजनीतिज्ञ का कार्य है समाज के सभी वर्गों के सभी कार्यों का समग्र राष्ट्रीय विकास की दिशा में आयोजन करना।


और इन सबके लिए श्रेष्ठ मनुष्य बनना बहुत आवश्यक है।






विकसित भारत के आपके विज़न में सामान्य व्यक्ति किस प्रकार अपना योगदान कर सकता है ?


—लालमणि, विकास भारती, मुंगेर


सामान्य व्यक्ति अपने क्षेत्र के अशिक्षित व्यक्तियों को पढ़ना-लिखाना सिखा सकता है—इर्द-गिर्द पेड़-पौधे बो सकता है और उनकी देखभाल कर सकता है; इलाके को साफ़-सुथरा रखने का काम कर सकता है और देश-हित के लिए अवांछनीय कार्यों की अधिकारियों को सूचना दे सकता है।






भारत को पूर्ण विकसित राष्ट्र के रूप में निर्मित करने के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा क्या है ?


—डेविड पी. कॉन, कनेक्टिकट कॉलेज, अमेरिका


हमारे विकसित राष्ट्र के रूप में बढ़ने के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है हमारी पराजयवादी मनोवृत्ति। एक बाधा यह भी है कि हमारे लक्ष्य हमेशा छोटे होते हैं। सच बात तो यह है कि छोटे लक्ष्य रखना अपराध है। हमारे लोग जब ऊँचे और बड़े लक्ष्य निर्धारित करने लगेंगे, तब सब ठीक हो जाएगा और जनता का नेतृत्व करने के लिए तो ऐसे लोग चाहिए जो मिशनरी भावना से काम करें और जिनमें नेतृत्व करने की विशेष योग्यता भी हो
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