Facebook Badge

गुरुवार, 14 जून 2012

मधुमेह रोगियों के लिए 201 टिप्स....बिमल छाजेड़...

Madhumeh Rogiyon Ke Liye 201 Tipsइन्टरनेट एक एसा माध्यम है जिसके ज़रिये हम बहुत सी अच्छी पुस्तकों का अध्ययन कर सकते है ..वैसेही कुछ पुस्तकों के कुछ अंश यहाँ मैंने उपरोक्त सौर्स से लिए है ..मुजे आनंद होगा अगर आप मैसे किसीको भी अगर पसंद आये ...


source............http://pustak.org/home.php?bookid=7953
 
 

                                               प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

                             आधुनिक समय में मधुमेह एक आम बीमारी बनती जा रही है। पूरे संसार तथा भारत में मधुमेह रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यह दीर्घकालीन रोग एक धीमी मौत की तरह रोगी के गुर्दों को नष्ट कर देता है। हृदय रोग, कोमा की अवस्था तथा गैंग्रीन रोग भी इसी की देन हैं। वैसे इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है। परंतु जीवनशैली में बदलाव, शिक्षा तथा खान-पान की आदतों में सुधार द्वारा रोग को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। यदि रोग बढ़ जाए तो भी एलोपैथी तथा आयुर्वैदिक दवाओं, इंसुलिन व जीवनशैली में बदलाव द्वारा रोग पर काबू पाया जा सकता है।




स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही तथा अशिक्षा ही मधुमेह का प्रमुख कारण है। अनेक मधुमेह रोगी मधुमेह के कारण व सुधार के उपाय तक नहीं जानते।

डॉ. बिमल छाजेड़ (एम.डी.) एक जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ हैं। उन्होंने दिल्ली में ‘साओल हृदय केंद्र’ की स्थापना भी की है। डॉ. छाजेड़ ने जीवनशैली में सुधार तथा दवाओं के मेल से हृदय व मधुमेह रोगियों के लिए नवीन चिकित्सा पद्धति विकसित की है। ये योग, ध्यान, तनाव प्रबंधन, व्यायाम तथा आहार में बदलाव को बाइपास सर्जरी तथा एंजियोप्लास्टी का विकल्प मानते हैं। देश के सभी प्रमुख शहरों में नियमित रूप से उनकी कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं।



----------------------------------------------------------------------------

सुप्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. बिमल छाजेड़ का दावा है कि हृदय की धमनियों में आई रुकावटों के लिए बाइपास सर्जरी आवश्यक नहीं है। यह कोई स्थाई समाधान नहीं देती। वर्तमान में इस रोग से ग्रस्त रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। इस रोग का मुख्य कारण तनाव है। हृदयरोग से ग्रस्त लोगों को अपने खान-पान का उचित ध्यान रखना चाहिए। योग एवं ध्यान जैसी पद्धतियों के द्वारा डॉ. छाजेड़ ने अनेक रोगियों को इस भयंकर रोग से मुक्ति दिलाई है। वे रोगियों को बिना तेल का भोजन ग्रहण करने की सलाह देते हैं।



–जनसत्ता

भाग-(क)

मधुमेह क्या है?

‘डायबिटीज मेलाइट्स’ एक जाना-पहचाना रोग है, जिसमें रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है तथा शरीर की कोशिकाएं शर्करा का उपयोग नहीं कर पातीं। यह रोग ‘इंसुलिन’ नामक रसायन की कमी से होता है, जिसका स्राव शरीर में अग्नाशय (पैंक्रियाज) द्वारा होता है।



डायबिटीज मेलाइट्स (हारपरग्लाइसीमिया, हाई शुगर, हाई ग्लूकोज, मधुमेय ग्लूकोज इनटोलरेंस के नाम से भी जाना जाता है), का साधारण भाषा में अर्थ है–‘मीठा मूत्र’ क्योंकि प्रायः देखा गया है कि मधुमेह रोगियों के मूत्र में शर्करा पाई जाती है। उच्च रक्तचाप तथा मोटापे के साथ इस रोग को ‘मेटाबॉलिक सिंड्रोम’ कहा जाता है। इस रोग को मेलाइट्स इसलिए कहते हैं ताकि इसे डायबिटिज इंसीपिडस (Insipidus) से अलग किया जा सके जिसमें बहुमूत्र की समस्या तो आती है परंतु मूत्र में शर्करा नहीं पाई जाती। डायबिटीज मेलाइट्स सामान्यतः ‘डायबिटीज’ के नाम से ही प्रसिद्ध है। डायबिटीज या मधुमेह एक ऐसा रोग है जिसमें रोगी कभी भी तत्काल लक्षणों की शिकायत नहीं करते किंतु रक्त में ग्लूकोज का बढ़ता हुआ स्तर शरीर के भीतर अवयवों तथा हृदय व गुर्दे आदि को भी नष्ट कर देता है इसलिए इसे ‘धीमी मौत’ भी कहते हैं।



यह एक दीर्घकालीन रोग है, रोगी 30-40 वर्ष तक इस रोग के साथ जीवित रहते हैं। यदि रोगी अपनी ब्लड ग्लूकोज का स्तर नियंत्रित रखे तथा पूरी देखभाल करे तो रोग उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। वैसे तो नियमित खान-पान ही रोग को काफी हद तक संभाल लेता है किंतु व्यायाम, तनाव प्रबंधन, योग तथा रोग की संपूर्ण जानकारी के साथ रोग का निदान और भी सरल हो जाता है। यदि इस रोग से संबंधित इन बातों पर पूरा ध्यान दिया जाए तो रोगी को दवाओं का सेवन भी नहीं करना पड़ता।



कई बार जीवनशैली में सुधार तथा दवाओं के प्रयोग से भी रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है। यदि रक्त में ग्लूकोज का स्तर नियंत्रित रखने के अन्य उपाय कारगर न रहे तो इंसुलिन एक रामबाण औषधि के रूप में मौजूद है।



मधुमेह क्यों होता है?

हमारे भोजन में कार्बोहाइड्रेट एक प्रमुख तत्त्व है, यही कैलोरी व ऊर्जा का स्रोत है। वास्तव में शरीर के 60 से 70% कैलोरी इन्हीं से प्राप्त होती है। कार्बोहाइड्रेट पाचन तंत्र में पहुंचते ही ग्लूकोज के छोटे-छोटे कणों में बदल कर रक्त प्रवाह में मिल जाते हैं इसलिए भोजन लेने के आधे घंटे भीतर ही रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है तथा दो घंटे में अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है।



दूसरी ओर शरीर तथा मस्तिष्क की सभी कोशिकाएं इस ग्लूकोज का उपयोग करने लगती हैं। ग्लूकोज छोटी रक्त नलिकाओं द्वारा प्रत्येक कोशिका में प्रवेश करता है, वहां इससे ऊर्जा प्राप्त की जाती है। यह प्रक्रिया दो से तीन घंटे के भीतर रक्त में ग्लूकोज के स्तर को घटा देती है। अगले भोजन के बाद यह स्तर पुनः बढ़ने लगता है। सामान्य स्वस्थ व्यक्ति में भोजन से पूर्व रक्त में ग्लूकोज का स्तर 70 से 100 मि.ग्रा./डे.ली. रहता है। भोजन के पश्चात यह स्तर 120-140 मि.ग्रा./डे.ली. हो जाता है तथा धीरे-धीरे कम होता चला जाता है।



मधुमेह में इंसुलिन की कमी के कारण कोशिकाएं ग्लूकोज का उपयोग नहीं कर पातीं क्योंकि इंसुलिन के अभाव में ग्लूकोज कोशिकाओं में प्रवेश ही नहीं कर पाता। इंसुलिन एक द्वार रक्षक की तरह ग्लूकोज को कोशिकाओं में प्रवेश करवाता है ताकि ऊर्जा उत्पन्न हो सके। यदि ऐसा न हो सके तो शरीर की कोशिकाओं के साथ-साथ अन्य अंगों को भी रक्त में ग्लूकोज के बढ़ते स्तर के कारण हानि होती है। यदि स्थिति उस प्यासे की तरह है जो अपने पास पानी होने पर भी उसे चारों ओर ढूंढ़ रहा है।



इन द्वार रक्षकों (इंसुलिन) की संख्या में कमी के कारण रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ कर 140 मि.ग्रा./डे.ली. से भी अधिक हो जाए तो व्यक्ति मधुमेह का रोगी माना जाता है। असावधान रोगियों में यह स्तर बढ़ कर 500 मि.ग्रा./ड़े.ली. तक भी जा सकता है।



मधुमेह रोग जटिलताओं में भरा है। सालों साल यदि रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ा रहे तो प्रत्येक अंग की छोटी रक्त नलिकाएं नष्ट हो जाती हैं जिसे माइक्रो एंजियोपैथी कहा जाता है। तंत्रिकातंत्र की खराबी ‘न्यूरोपैथी, गुर्दों की खराबी ‘नेफरोपैथी’ व नेत्रों की खराबी ‘रेटीनोपैथी’ कहलाती है। इसके अलावा हृदय रोगों का आक्रमण होते भी देर नहीं लगती।



मधुमेह के प्रकार

डायबिटीज मेलाइट्स को निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है–



1. आई.डी.डी.एम. इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज मेलाइट्स (इंसुलिन, आश्रित मधुमेह) टाइप–।

2. एन.आई.डी.डी.एम. नॉन इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज मेलाइट्स (इंसुलिन अनाश्रित मधुमेह) टाइप–॥

3. एम.आर.डी.एम. मालन्यूट्रिशन रिलेटिड डायबिटीज मेलाइट्स (कुपोषण जनित मधुमेह)

4. आई.जी.टी.(इंपेयर्ड ग्लूकोज टोलरेंस)

5. जैस्टेशनल डायबिटीज

6. सैकेंडरी डायबिटीज



1. टाइप–। (इंसुलिन आश्रित मधुमेह)–टाइप–। मधुमेह में अग्नाशय इंसुलिन नामक हार्मोन नहीं बना पाता जिससे ग्लूकोज शरीर की कोशिकाओं को ऊर्जा नहीं दे पाता। इस टाइप में रोगी को रक्त में ग्लूकोज का स्तर सामान्य रखने के लिए नियमित रूप से इंसुलिन के इंजेक्शन लेने पड़ते हैं। इसे ‘ज्यूविनाइल ऑनसैट डायबिटीज’ के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग प्रायः किशोरावस्था में पाया जाता है। इस रोग में ऑटोइम्यूनिटी के कारण रोगी का वजन कम हो जाता है।



2. टाइप-।। (इंसुलिन अनाश्रित मधुमेह)–लगभग 90% मधुमेह रोगी टाइप-।। डायबिटीज के ही रोगी हैं। इस रोग में अग्नाशय इंसुलिन बनाता तो है परंतु इंसुलिन कम मात्रा में बनती है, अपना असर खो देती है या फिर अग्नाशय से ठीक समय पर छूट नहीं पाती जिससे रक्त में ग्लूकोज का स्तर अनियंत्रित हो जाता है। इस प्रकार के मधुमेह में जेनेटिक कारण भी महत्वपूर्ण हैं। कई परिवारों में यह रोग पीढ़ी दर पीढ़ी पाया जाता है। यह वयस्कों तथा मोटापे से ग्रस्त व्यक्तियों में धीरे-धीरे अपनी जड़े जमा लेता है।



अधिकतर रोगी अपना वजन घटा कर, नियमित आहार पर ध्यान दे कर तथा औषधि ले कर इस रोग पर काबू पा लेते हैं।



3. एम.आर.डी.एम.(कुपोषण जनित मधुमेह)–भारत जैसे विकासशील देश में 15-30 आयु वर्ग के किशोर तथा किशोरियां कुपोषण से ग्रस्त हैं। इस दशा में अग्नाशय पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता। रोगियों को इंसुलिन के इंजेक्शन देने पड़ते हैं। मधुमेह के टाइप–। रोगियों के विपरीत इन रोगियों में इंसुलिन के इंजेक्शन बंद करने पर कीटोएसिडोसिस विकसित नहीं हो पाता।



4. आई.जी.टी.(इंपेयर्ड ग्लूकोज टोलरेंस)–जब रोगी को 75 ग्राम ग्लूकोज का घोल पिला दिया जाए और रक्त में ग्लूकोज का स्तर सामान्य तथा मधुमेह के बीच हो जाए तो यह स्थिति आई.टी.जी. कहलाती है। इस श्रेणी के रोगी में प्रायः मधुमेह के लक्षण दिखाई नहीं देते परंतु ऐसे रोगियों में भविष्य में मधुमेह हो सकता है।



5. जैस्टेशनल डायबिटीज (गर्भावस्था के दौरान)–गर्भावस्था के दौरान होने वाली मधुमेह जैस्टेशनल डायबिटीज कहलाती है। 2-3% गर्भावस्था में ऐसा होता है। इसके दौरान गर्भावस्था में मधुमेह से संबंधित जटिलताएं बढ़ जाती हैं तथा भविष्य में माता तथा संतान को भी मधुमेह होने की आशंका बढ़ जाती है।



6. सेकेंडरी डायबिटीज–जब अन्य रोगों के साथ मधुमेह हो तो उसे सेकेंडरी डायबिटीज कहते हैं। इसमें अग्नाशय नष्ट हो जाता है जिससे इंसुलिन का स्राव असामान्य हो जाता है, जैसे–



(1) अग्नाशय से संबंधित रोग–

अग्नाशय में सूजन

अग्नाशय का कैंसर

हमारी विरासत........तेजपाल सिंह धामा....प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश...........

source------------http://pustak.org/home.php?bookid=5413

Hamari Virasat
नमस्कार दोस्तों ...
इन्टरनेट एक एसा माध्यम है जिसके ज़रिये हम बहुत सी अच्छी पुस्तकों का अध्ययन कर सकते है ..वैसेही कुछ पुस्तकों के कुछ अंश यहाँ मैंने  उपरोक्त सौर्स से लिए है ..मुजे आनंद होगा अगर आप मैसे किसीको भी अगर पसंद आये ...











हे आर्य भारत मां !
असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे,


सुरतरूवर शाखा लेखनी पत्रमुर्वी

लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालम्।

तदपि तव गुणानामीश ! पारम् न याति।



अर्थात् कज्जलगिरि की स्याही समुद्र के पात्र में घोली गयी हो, कल्पवृक्ष की शाखा की लेखनी हो, कागज पृथ्वी हो और मां सरस्वती स्वयं लिखने वाली हो, तथापि हे आर्य मां। तुम्हारे गुणों का वर्णन कर पाना अशक्य एवं असंभव है।

भूमिका

इतिहास का शाब्दिक अर्थ होता है ऐसा ही हुआ है। सच्चा इतिहास बतलाता है कि ईश्वर कभी किसी मनुष्य किसी देश अथवा किसी मनुष्य समूह की अधोगति तब तक नहीं करता जब तक कि मनुष्य, देश व जाति अज्ञानी तथा कुकर्मी स्वयं न बन जाए। शुभकर्म का फल आत्मीय तथा सामाजिक आरोग्यता, बल, बुद्धि, सुख, अभ्युदय व देश स्वतंत्रता और दुष्ट कर्मो का फल आत्मीय (निज की) तथा सामाजिक रोग, दुर्बलता, दुःख या दरिद्रता व देश की पराधीनता है। इतिहास गवाह है कि जब तक किसी मनुष्य विशेष या साधारण ने तथा जनमानस ने पूर्वकाल में कोई भी राजनीति, धर्म संबंधित आदि भूल की, तो उसको या उनको फल भोगना पड़ा।



हम भारतवर्ष की संतान हैं। हमारे पूर्वजों के कार्यकलापों के कारण ही हमारे इतिहास का निर्माण हुआ है। जब इतिहास को हमारे पूर्वजों ने निर्मित किया है तो अपना इतिहास लिखने का अधिकार हमको ही है, न किस विदेशी विद्वानों को। राम-रावण की ऐतिहासिक लड़ाई को विदेशी जन कवि की कल्पना मानते हैं और हमारे पूर्वज आर्यों को कहते हैं कि वे भारत में बाहर से आये हैं। जब हमारी स्मृति में पृथु हैं, जिसने पृथ्वी को गौरवान्वित किया, हम मनु को जानते हैं, जिन्होंने मानव को सुसंस्कृत बनाया, हम सृष्टि संवत को भी जानते हैं, लेकिन हमारी स्मृति में यह क्यों, नहीं कि हम भारतीय नहीं हैं ? हमारे पूर्वज आर्य कहीं बाहर से आये हैं। हे आर्यों की सन्तान। मेरे देश के इन मासूम बच्चों का क्या होगा ? जिन्हें पढ़ाया जाता है कि आपके पूर्वज आर्य घुमक्कड़ थे, ग्वाले थे, बाहर से आये, अतः यह देश आपका नहीं है, तो इस बारे में आपकी राय क्या होगी



नष्टे मूले नैव फलं न पुष्पम्



जिस देश की सभ्यता एवं संस्कृति को मिटाना हो तो उस देश का इतिहास मिटा दो। स्मारक, साहित्य तथा वास्तविक संपत्ति चरित्र को मिटा दो। संसार के नक्शे से फिर वह देश स्वतः ही मिट जाएगा।



अश्लील साहित्य की सार्वजनिक स्थानों पर बिक्री की खुली छूट, चित्रहार, गंदी फिल्में, गान्धर्व, पैशाच, राक्षस आदि म्लेच्छ विवाह की जिस राष्ट्र में खुली छूट हो, उस देश की सभ्यता व संस्कृति स्वतः नष्ट हो जाएगी। इसी तरह विदेशी जनों पाश्चात्यता के गुलाम भारतीयों ने भारतवर्ष का नाश करने के लिए, भारत के स्वाभिमान व सभ्यता संस्कृति को नष्ट करने के लिए निम्न उपाय निकाल डाले।



आर्यों का आदि देश मध्य एशिया मानकर, भारत को अनेक देशों का उपमहाद्वीप मानकर, वास्को-डि-गामा के आगमन से भारत के इतिहास का श्रीगणेश करके, जैसे कि उसके पहले भारत कहीं खो गया था, जो उसे खोज निकाला ? मिथ्या वेद भाष्य करके जैसे राष्ट्रीय अनुसंधान प्रशिक्षण परिषद् की प्राचीन भारत नामक पुस्तक में है :-



1. आर्यों का जीवन स्थायी नहीं था।

2. ऋग्वेद के दस्यु संभवतः इस देश के मूल निवासी थे।

3. हड़प्पा संस्कृति का विध्वंस आर्यों ने किया।

4. अथर्ववेद में भूत प्रेतों के लिए ताबीज।

5. पशुबलि के कारण बैल उपलब्ध नहीं।



भला इन षड्यंत्रों से भारत को कब तब बचा पायेंगे ? राष्ट्रीय स्वदेशाभिमान, स्वाभिमान, भारतीय सभ्यता-संस्कृति को कैसे सुरक्षित रखा जा सकेगा ? इस पुस्तक का लेखक कृषि विज्ञान में स्नातकोत्तर तो है लेकिन किसी भी विश्वविद्यालय से इतिहास विषय का स्नातक नहीं है, न ही इसने इतिहास विषय में विशेष योग्यता ही प्राप्त की है, किन्तु विद्यार्थी अवस्था से ही भारतीय सभ्यता संस्कृति के प्रति इसकी विशेष रुचि व अनुराग रहा है और इसकी यह इच्छा तब से ही थी कि इतिहास जैसे महत्त्वपूर्ण विषय के पठन-पाठन के क्रम में शोधपूर्ण प्रामाणिक परिवर्तन अवश्य किये जायें। इसके अलावा लेखक ने प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए इतिहास विषय का गहन अध्ययन किया। वह प्रशासनिक अधिकारी तो न बन सका, क्योंकि भ्रांतिपूर्ण इतिहास, इसकी शुष्कता अंधकार युग को दूर कर इसे ऐसे रूप में जनता के सामने उपस्थित करने में लग गया, जिससे कि लोग पुरातनकाल के इतिहास के पठन-पाठन में परिस्थितियों से तुलना कर लाभान्वित हों, इसी उद्देश्य को सामने रख दिव्य भारत के प्राचीन गौरवशाली इतिहास की एक झलक शोधपूर्ण तरीके से संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत की गयी है।



यहां यह भी बता देना आवश्यक है कि लेखक यह दावा कदापि नहीं करता कि इस पुस्तक में जो घटनाएं लिखी गयी हैं वे सब निर्भ्रान्त और ठीक ही हैं, कारण इतिहास एक ऐसा अगाध और अपार विषय है कि किसी भी ऐतिहासिक सिद्धांत के विषय में यह कह देना कि बस, यही परम सत्य है, बड़े दुस्साहस का काम है, क्योंकि इतिहास के अन्वेषण का कार्य जारी है और आगे भी जारी रहेगा। कारण सहित कार्य को दिखाने वाला ही पूर्ण इतिहास होता है। इतिहास को बुद्धि से भी परखकर पढ़ना चाहिए, क्योंकि इतिहास में झूठी कथाएं भी हो सकती हैं तथा इतिहास में कई सच्चे वाक्य आश्चर्यजनक भी होते हैं। जैसे प्राचीनकाल में आज से अधिक विज्ञान था।



विदेशियों ने हमारे इतिहास को मोम का पुतला बना दिया है। जिधर चाहते हैं खींच ले जाते हैं। पश्चिमी इतिहासविदों और विद्वानों यथा म्योर, एलफिंस्टन, मनसियर डेल्बो, पोकाक, विलियम कार्नेट डा. जार्ज पोलेस, डेल्स एवं एलिजाबेथ राल्स आदि ने भी यह रहस्योद्धाटन किया है कि मार्टिन व्हीलर, स्टुअर्ट पिगट और जान मार्शल जैसे विद्वानों ने भी तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा है। अतः शोधर्पूर्ण गंभीरता से तर्कपूर्वक अपने इतिहास पर विचार करना हम सभी भारतवासियों का श्रेष्ठ कर्त्तव्य है, ताकि हमारी सभ्यता एवं संस्कृति इस तामसी विचारों वाले संसार में, जो कीचड़ से भी बद्तर है, में कमल की भांति खिल उठे।

धियो यो न प्रचोदयात्।

तेजपाल सिंह धामा



दिव्य भारत की कीर्ति कथा

अत्र ते कीर्तयिष्यामि वर्ष भारत भारतम्।

प्रियमिन्द्रस्य देवस्य मनोवैवस्वतय च।।

पृथोस्तु राजन्वैन्यस्य तथेक्ष्वाकार्महानत्मन।

ययातेरम्बरीषस्य मान्धातुर्नहुषस्य

तथैव मुचुकुन्दस्य शिषैरौशनिरस्य।

ऋषभस्य तथैलस्य नृगस्य नृपतेस्तथा।

कुशिकस्य च दुर्धर्ष गाधेश्चैव महात्मनः।

सोमकस्य च दुर्धर्ष दिलीपस्य तथैव च।।

अन्येषां च महाराज क्षत्रियाणां बलीय साम्।

सर्वेषामेव राजेन्द्रप्रियं भारत भारतम्।।

महाभारत, भीष्म पर्व अ. 9 श्लोक 5-9



भावार्थ: आओ हे भारत अब मैं तुम्हें भारतदेश का कीर्तिमान सुनाता हूं। वह भारत जो इन्द्रदेव को प्रिय हैं, जो मन वैवस्वत, आदिराज पृथुवैन्य और महात्मा अक्ष्वाकु को प्यारा था, जो भारत ययाति, अम्बरीष, मान्धाता, नहुष मुचुकुन्द और औशीनर शिवि को प्रिय था; ऋषभ ऐल और नृग जिस भारत को प्यार करते थे; और जो भारत कुशिक गाधि, सोमक, दिलीप और अनेकानेक शक्तिशाली सम्राटों को प्यारा था; हे नरेन्द्र ! उस दिव्य देश की कीर्तिकथा मैं तुम्हें सुनाऊंगा।

अध्याय 1

सृष्टि रचना

रचना सृष्टि की उत्पत्ति से ही प्रारंभ होता है, लेकिन उत्पत्ति का जिक्र आते ही सर्वप्रथम प्रश्न उठता है कि सृष्टि का रचनाकार है कौन ? सृष्टि की रचना का विचार जिसके मन में आया वह शक्ति क्या है ? अकेली है ? या अनेक हैं ? आज का व्यक्ति आंख मूंदकर कोई बात मान लेने को तैयार नहीं। वह हर बात को विज्ञान की कसौटी पर कसना चाहता है। अभी तक बड़े छोटे, खरे खोटे की पहचान का सर्वोत्कृष्ट आधार विज्ञान ही माना जाता है।




विज्ञान अभी तक ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करता। भौतिकवादियों का कहना है कि सृष्टि की अंतिम सत्ता न आत्मा है न परमात्मा। यह सत्ता विद्युत की तीन तंरगों इलेक्ट्रान प्रोटान तथा न्यूट्रान का अविरल प्रवाह है। सृष्टि ह्रास की बात विज्ञान स्वीकार करता है और यदि सृष्टि बनती-बिगड़ती है तो विद्युत तंरगों का प्रवाह विच्छेद हो जाता है और फिर प्रवाहित हो जाता है। भौतिकी के अनुसार कोई गति बिना गति देने वाले के नहीं हो सकती और यदि गति देने वाला न हो तो शुरू में ही तरंगों का प्रवाह कैसे प्रवाहित होगा ? और विच्छेद हो जाने पर पुनः किसी अन्य शक्ति के बिना गतिमान कैसे होगा ? वह अन्य शक्ति ईश्वर के अलावा और क्या हो सकती है ?

सोमवार, 11 जून 2012

2012 महाविनाश या नये युग का आरंभ....अशोक कुमार शर्मा

2012 Mahavinash Ya Naye Yug Ka Arambha











प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश...

source......http://pustak.org/home.php?bookid=7413
17 दिसम्बर, सन् 2008 में नासा ने पृथ्वी के भीतरी चुम्बकीय क्षेत्र में सौर-कणों की एक परत की खोज की और यह निष्कर्ष निकाला कि अगली उच्च सौर गतिविधि सन् 2012 में होगी। उस समय पृथ्वी इस शताब्दी का सबसे भयानक विस्फोट देखेगी। अगर सन् 2012 में पृथ्वी को ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा, तो भी ऐसे बहुत से विध्वंसों से पृथ्वी के तबाह होने की पूरी आशंका है।




फ्रांस में निर्मित सर्न हैड्रॉन कोलाइडर मशीन जो दुनिया की सबसे बड़ी और आधुनिक मशीन है, अचानक ही ब्लैक होल पैदा कर देगी। यह ब्लैक होल धीरे-धीरे पृथ्वी समेत सौरमण्डल के सभी ग्रहों को निगल जाएगा।

हमारी पृथ्वी एक ऐसे धूमकेतु की ओर तेजी से बढ़ रही है जिसकी टक्कर पृथ्वी के समस्त प्राणियों और पेड़-पौधों को खत्म कर देगी।



आज इंटरनेट और वेबसाइटें जीवित बचने की तकनीकों से भरी पड़ी हैं और अकस्मात ही 21 दिसम्बर, सन् 2012 सभी के लिए चर्चा का विषय बन गया है। एक ऐसा दिन जिसे कई प्राचीन सभ्यताओं और भविष्यवाणियों में प्रलय का दिन बताया गया।

क्या सचमुच हम सभी 21 दिसम्बर, 2012 को समाप्त होने जा रहे हैं ?

क्या माया कैलेंडर मिस्र और अन्य प्राचीन सभ्यताओं में इसी प्रलय का जिक्र किया गया है ?



क्या यह सत्य है कि दिसम्बर 2012 में सूर्य आकाश गंगा के केन्द्र में होगा और महाविनाश का कारण बनेगा ?

क्या निब्रू और हरकोल्यबस ग्रह पृथ्वी की ओर बढ़ रहे हैं ?

क्या हम वैश्विक विनाश की ओर बढ़ रहे हैं ?



प्रगैतिहासिक काल से अनगिनत ऐसी भविष्यवाणियाँ की जा चुकी हैं जिसमें पृथ्वी के सम्पूर्ण विनाश की बात कही गई। क्या वह समय आ गया है ? नॉन फिक्शन लेखक अशोक कुमार शर्मा, पीएचडी, जिन्होंने पहली बार नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियों की व्याख्या की और कई बेस्ट सेलर पुस्तकें, जैसे द कम्प्लीट प्रोफेसिस ऑफ नास्त्रेदमस, ‘विश्व प्रसिद्ध भविष्यवाणियां’, ‘द प्रोफेसिस फॉर द न्यू मिलेनियम’ तथा ‘द रेयर प्रीडिक्शन्स’ प्रस्तुत कीं।

इस पुस्तक में अब तक की सभी भविष्यवाणियों का विश्लेषण करके क्या निष्कर्ष निकाला गया है आप स्वयं पढ़ें।

आधुनिक दुनिया के डर और भविष्यवाणियों से संबंधित एक तथ्यपरक यात्रा।

प्रथम अध्यायविषय-प्रवेश

यद्यपि संसाधनों और मूल ढाँचों की कमी तो प्राचीन या आदिम सभ्यताओं को रही होगी परन्तु फिर भी उनके पास ब्राह्मण्ड एवं आकाशीय घटनाओं के बारे में विशिष्ट ज्ञान उपलब्ध था। उनके पास ऐसे सन्त, भविष्यवेत्ता और खगोलशास्त्रियों, ज्योतिषियों इत्यादि का समर्थन करने की एक पूरी परम्परा रही थी। लगभग सम्पूर्ण विश्व में न जाने कितनी वेधशालाएं मंदिर इत्यादि मिलते हैं जिससे ग्रह नक्षत्रों एवं अन्य आकाशीय पिण्डों का अवलोकन होता था। हम देखते हैं कि प्राचीन काल में खगोलशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र भविष्यवाणी कथन के प्रारंभिक विकास में तीन मूलभूत विशेषताएं थीं–



1. खगोलशास्त्री ग्रह नक्षत्र की चालों का सूक्ष्म अध्ययन एवं गणना तो करते थे, पर उनका उद्देश्य सिर्फ अपने शासकों के हितों की ओर ही केंद्रित था। इसलिए इस ज्ञान को गुप्त ही रखा गया।



2. राशिचक्र महीनों (Zodiac months) की खोज की संभावना बनी सूर्य के मार्ग पर दीर्घवृत्तीय चलनों के सिद्धांतों से, जिसमें पूरे वर्ष की 12 राशि-समूहों में विभाजित कर दिया गया जिससे हर भाग की माप 30॰ आए।



3. प्राचीन खगोलशास्त्रियों ने सूर्य व चन्द्र की गतियों के अध्ययन हेतु कुछ नियम भी बनाए। सितारों के प्रमुख समूहों में जानवरों की आकृतियों के साथ सादृश्य खोजा गया और इस प्रकार खगोलशास्त्र में कुछ नई चीजों का समावेश हुआ। खगोलशास्त्र के कई स्कूल पैदा हो गए और कई सिद्धांत या पद्धतियाँ पैदा हुई। इस ज्ञान को मिट्टी के आकारों तथा चित्रात्मक पाठ के साथ सहेजा गया। धीरे-धीरे हर विकासशील सभ्यता के पास आकाशीय गतियों के आधार पर भविष्यवाणी करने का एक खास तरीका आ गया।



भविष्य कथन के बारे में ऐसा दावा किया जाता है कि खगोलशास्त्र में दस्तावेजों की बहुलता के साथ कई संहिताएं, कई देशों में आज से लगभग 2500 वर्ष पहले तैयार की गई थीं।

इसका विवरण भारत में सर्वप्रथम वेदों में मिलता है जिसमें कई खगोलशास्त्रीय धारणाओं का उल्लेख है। ऋग्वेद में ब्रह्मण्ड के उद्भव और बनावट के बारे में कई मेधावी उक्तियाँ मिलती हैं जैसे पृथ्वी गोलाकार होने के कारण स्वयं समर्पित रहती है तथा वर्ष के 360 दिवसों को बारह से भाग करने पर 30 दिनों का एक महीना बन जाता है। प्रागैतिहासिक काव्य-ग्रन्थों, यथा रामायण एवं महाभारत में भी खगोलशास्त्र के बड़े तर्क-सम्मत संदर्भ हैं तथा भविष्यवाणी की कला का भी उल्लेख है।



प्राची भारतीय खगोलशास्त्रियों जैसे लगधा, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, भास्कर, ब्रह्मगुप्त, लल्ला, श्रीपति एवं वटेश्वर ने कई पुस्तकों का भी प्रणयन किया। प्राचीन युग में खगोलशास्त्रीय उपकरणों एवं गणित के आधार पर सूर्य माप और काल-गणना बड़ी चतुरता से की गई।



कई विदेशी यात्रियों ने प्राचीन भारत में इस कला के विकास पर काफी विशुद्धता से वर्णन किया है। उनके अनुसार यहाँ वाचनालयों में बड़ी दुर्लभ पुस्तकें उपलब्ध थीं जिनको बाद में मंगोल एवम् रोमन लुटेरों ने लूटा और बचा भी लिया।

शीघ्र ही ज्ञान और अनुभव के आधार पर भारत, मिस्र और यूनान के आने वाले समय को पहले से जानने के लिए रुचि पैदा होने लगी। खगोलशास्त्रीगण ग्रहण, भूकम्प, बाढ़, सूखा, अकाल इत्यादि के बारे में भविष्यवाणी कर और शासकों को आगाह करने लगे। कुछ एक राज्यों में तो राज-ज्योतिषी का पद भी बना दिया। इस प्रकार जन्मकुंडली-ज्योतिष का कई भारतीय राज्यों में विकास होने लगा। मिस्र और रोम में भी ज्योतिष लोकप्रिय होने लगी। किसी जातक की जन्म कुंडली बनाना और ग्रहों की स्थिति के अनुसार उसके आगामी जीवन के बारे में बताने की पद्धति का निर्माण शासक प्राचीन एवं यूनानी विद्वानों की महत्ती उपलब्धि है।



यूनानी खगोलशास्त्रीय हिप्पारकूस को श्रेय जाता है कि उसने अयनों (प्रिसेशन ऑफ दी इक्वेनॉक्सेस) का सिद्धांत विकसित किया जिससे किसी व्यक्ति के भाग्य पर ग्रहों का प्रभाव स्पष्ट होता है। प्रारंभ के ज्योतिष विस्तृत विवरण के साथ आकाशीय पिण्डों की चाल का अध्ययन करने में सक्षम हो चुके थे। उन्होंने पाया कि अयनों (इक्विनॉक्स) की प्रक्रिया साल में दो बार होती है जब पृथ्वी अपने अयन से सूर्य की ओर या उससे परे नहीं झुकी प्रतीत होती है। अयन या इक्विनॉक्स शब्द उन तिथियों का प्रतीक है जब ऐसा होता है। शब्द ‘इक्विनॉक्स’ लैटिन के शब्द ‘एक्यूस’ (बराबर) से निकला है और ‘नॉक्स’ का अर्थ रात्रि होता है क्योंकि इक्विनॉक्स के आस-पास रात और दिन की अवधि लगभग बराबर ही रहती है।



मध्यकाल में ज्योतिषी (एस्ट्रोलॉजर्स) को गणितज्ञ कहा जाता था। ऐतिहासिक दृष्टि से प्रारंभ में मैथमैटिक्स शब्द का प्रयोग उन विद्वानों के लिए होता था जो ज्योतिष शास्त्र, खगोलशास्त्र और गणित में माहिर होते थे। चूंकि औषधि-विज्ञान भी थोड़ा-बहुत ज्योतिष पर निर्भर करता है इसलिए चिकित्सक लोग भी गणित और ज्योतिष का अध्ययन करने लगे। लेकिन मध्ययुग तथा पुनर्जागरणकालीन ज्योतिषियों ने ग्रहचाल अध्ययन की ताकत मोल नहीं ली और चेहरा देखकर ही भविष्यवाणी करने में लिप्त रहे। इन लोगों में कीरोमैन्सी (पामिस्ट्री या हस्तरेखा शास्त्र) भी पढ़ना प्रारम्भ किया और उसी आधार पर जन्मकुण्डलियां भी बनाने लगे।

नई राहें नए इरादे.......बराक ओबामा....प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश.....

source....http://pustak.org/home.php?bookid=7428Nayee Rahen Naye Irade












आज पूरा विश्व एक परिवर्तन चाह रहा है। असफल नीतियों और पथभ्रष्ट राजनीति ने ऐसी भयावह स्थिति पैदा कर दी है, जिसमें हर ओर केवल भटकाव और उदासी फैली है।


ऐसे में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने आशा की एक किरण दिखाई है। उनका विश्वास है कि दृढ़-निश्चय से ईमानदारी के साथ सबको साथ लेकर चलने की मंशा से हर विषम परिस्थिति का सामना किया जा सकता है और विकास के पथ पर आगे बढ़ा जा सकता है। वे कहते हैं कि हमने कठिनाइयों और अपने हिस्से की असफलताओं का सामना किया; परंतु उनसे सीखा कि चुनौती चाहे जितनी भी बड़ी हो और हालात कितने भी बुरे हों, परिवर्तन हमेशा संभव है; यदि आप उसके लिए काम करने, संघर्ष करने और सबसे बढ़कर उसमें विश्वास रखने के लिए तैयार हैं।

सकारात्मक परिवर्तन की इसी ललक को मन में जाग्रत् करने के लिए प्रेरित करती है विचारोत्तेजक तथा दिशा-निर्धारक पुस्तक नई राहें, नए इरादे।

अमेरिका की आशाहम इस समय एक कड़ी चुनौती और महान् अवसर के दौर में हैं। पूरे अमेरिका में परिवर्तन की माँग को लेकर समवेत स्वर उठ रहे हैं। अमेरिकावासी कुछ सामान्य चीजें चाहते हैं, जो पिछले आठ वर्षों में वाशिंगटन उन्हें दे नहीं पाया है–एक ऐसी अर्थव्यवस्था, जो कड़ी मेहनत करनेवालों के प्रयासों की कद्र करती हो; एक ऐसी सुरक्षा नीति, जो हम सबके सामने खड़े खतरों का मुकाबला करने के लिए दुनिया को साथ लेकर चलती हो तथा अमेरिका को अधिक सुरक्षित बनाती हो; एक ऐसी राजनीति जो लोगों को दलगत सोच से ऊपर उठाकर उन्हें सामूहिक हितों के लिए कार्य करना सिखाती हो। उनकी माँगें बहुत बड़ी नहीं हैं। यह ऐसा परिवर्तन है जिसके अमेरिकावासी अधिकारी हैं।



फिर भी हमारा देश युद्ध में फँसा हुआ है, हमारी अर्थव्यवस्था अस्थिर है और हमारी पृथ्वी संकट में है। अमेरिकी परिवार एक ऐसी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के साथ जी रहे हैं, जिसकी लागत तो अधिक है परंतु लाभ कम है, जो परिवारों और व्यवसायों को दिवालिया बना देती है; ऐसे स्कूलों के साथ जो बहुत बड़ी संख्या में हमारे बच्चों के लिए अवसर पैदा नहीं कर पाते तथा एक ऐसी सेवानिवृत्ति व्यवस्था, जो कदाचित् अपने वादे के अनुसार नहीं दे पाएगी। देश भर में लोग अपनी गाड़ियों में ईंधन तथा शॉपिंग ट्रालियों में सामान भरने के लिए रिकॉर्ड कीमतें अदा कर रहे हैं। बहुत बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक इस बात से चिंताग्रस्त हैं कि क्या वे अपने बच्चों का पालन-पोषण सुरक्षित वातावरण में कर पाएँगे तथा उन्हें एक बेहतर जीवन प्रदान कर सकेंगे ?



परंतु ये चुनौतियाँ अपरिहार्य नहीं थीं। वे दोषपूर्ण नीतियों तथा असफल नेतृत्व की देन हैं। जिस तरह से हमारी दुनिया और अर्थव्यवस्था बदली है, वाशिंगटन की सोच इक्कीसवीं सदी की कसौटियों के साथ उसी रफ्तार से नहीं चल पाई। अमेरिका की प्रतिस्पर्द्धात्मक क्षमता में निवेश करने या राष्ट्रीय सुरक्षा पर मँडरा रही नई चुनौतियों का सामना करने के बजाय हमने सर्वाधिक संपन्न अमेरिकियों के टैक्स में कटौती तथा इराक में एक ऐसे निस्सीय युद्ध के प्रति प्रतिबद्धता देखी है, जो हमें अधिक सुरक्षित नहीं बना रहा है और साथ ही हमारी सुरक्षा को जिन शक्तियों से सचमुच खतरा है, उनसे भी हमारा ध्यान हटा रहा है। परिणामस्वरूप, बहुत कम अमेरिकियों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था का लाभ उठाया है तथा अधिकाधिक अमेरिकी ज्यादा मेहनत करके कम प्रतिफल पा रहे हैं और हमारा देश अपनी नियति पर से नियंत्रण खोता जा रहा है।



इस नई सदी के आरंभिक वर्ष कुछ अलग होने चाहिए थे–जब अमेरिका के नेताओं में इतनी शक्ति थी कि वे प्रतिकूलता को अवसर में बदल सकते थे, इतनी बुद्धिमत्ता थी कि वे निकट भविष्य को देख सकते थे, इतना साहस था कि वे पारंपरिक सोच और घिसे-पिटे विचारों को चुनौती दे सकते थे। हम अपनी अर्थव्यवस्था को नए सिरे से गढ़ सकते थे तथा नए खतरों का सामना उन तरीकों से कर सकते थे, जिनमें भावी संभावना छिपी हुई हो।



इसके बजाय ये पिछले आठ वर्ष अप्रतिष्ठित विचारों के प्रति आसक्ति और अड़ियलपन के लिए याद किए जाएँगे। जरा सोचिए कि यदि हम एकजुट होते और मिलकर कार्य करते तो हम क्या कर सकते थे ? अपने बच्चों के लिए विश्वस्तरीय शिक्षा के प्रति सचमुच प्रतिबद्ध होने और उन्हें कल के रोजगारों के लिए तैयार करने के बजाय हमने ‘कोई बच्चा पीछे न रह जाए’ कानून पास कर दिया, जिसके उद्देश्य तो सही थे, परंतु जिसके लिए पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं कराया गया तथा हम शिक्षकों, प्राचार्यों और स्कूल बोर्डों को सशक्त बनाने में असफल रहे। खनिज तेल की अपनी तल को छोड़ने के बजाय हम उस रास्ते पर चलते रहे जो हमारे डॉलरों को निरंकुश और अत्याचारी शासकों के पास भेजता रहा है, हमारी पृथ्वी को खतरे में डालता है और हम अमेरिकियों को एक गैलन पेट्रोल के लिए 4 डॉलर खर्च करने के लिए मजबूर करता है। हमारी खस्ताहाल सड़कों और पुलों के पुनर्निर्माण एवं नवप्रवर्तन में निवेश के बजाय हमने समृद्धतम अमेरिकियों को करों में छूट देने के नाम पर करोड़ों डॉलर खर्च कर दिए। सभी अमेरिकियों के लिए स्वास्थ्य-सेवा लागतों में कमी करने के बजाय हमने कुछ नहीं किया तथा प्रीमियमों, सह-भुगतान और जेब खर्चों को आसमान छूते देखा है। और, जब हम अल कायदा को खदेड़ रहे थे तब दुनिया को अपने साथ लेने के बजाय हम इराक में एक ऐसे युद्ध पर सौकड़ों अरब डॉलर खर्च करते रहे, जिसे कभी अधिकृत या शुरू नहीं किया जाना चाहिए था।



पिछले आठ वर्ष अमेरिकी जनता की नहीं वरन् अमेरिकी नेतृत्व की असफलता के वर्ष रहे हैं।

बराक ओबामा का विश्वास है कि हम अपनी दिशा बदल सकते हैं और ऐसा हमें करना ही चाहिए। वे भविष्य को आशावादिता के साथ देखते हैं। हमारे देश ने पहली बार विपत्ति का सामना नहीं किया; और जब भी किया है, हमारी जनता ने दृढ़ इच्छाशक्ति जुटाकर उन चुनौतियों से निपटने के उपाय खोजे हैं। यह घड़ी कुछ अलग नहीं है। मिल-जुलकर कार्य करने से हम अपनी अर्थव्यवस्था को फिर से जीवंत बना सकते हैं तथा प्रत्येक परिवार को सफल होने के अवसर प्रदान कर सकते हैं। हम सब को संकट में डालनेवाले अंतरराष्ट्रीय खतरों का मुकाबला करने में हम दुनिया का नेतृत्व कर सकते हैं। हम अपने बुनियादी अमेरिकी मूल्यों का पुनः सबलीकरण करके अपने राष्ट्र को परिपूर्ण बना सकते हैं और इस समय हम ऐसे निवेश कर सकते हैं, जो इस नई वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिका को सबसे आगे खड़ा कर देंगे।



इस चुनाव में विकल्प वामपंथ और दक्षिणापंथ या रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स के बीच नहीं है। हमारे सामने विकल्प–भूतकाल व भविष्य के बीच है।



वास्तविक परिवर्तन लाने के लिए हमें एक नए प्रकार की राजनीति की आवश्यकता है, जो अमेरिकी जनता को अपनी सरकार से पुनः जोड़े और जो मतपेटी में एक वोट का ही आश्वासन न दे, बल्कि उन्हें एक ऐसी आवाज प्रदान करे जिसकी वाशिंगटन उपेक्षा नहीं कर सकता। प्रत्येक पृष्ठभूमि और देश के प्रत्येक कोने से आए अमेरिकी एक ऐसी राजनीति की लालसा रखते हैं जो हमें तोड़कर खंड-खंड करने के बजाय एकता के सूत्र में बाँधे। वे जो कुछ चाहते हैं–और हमारे देश को जिसकी जरूरत है–वह अंध-अविवेकी सहमति नहीं है। अमेरिकी हर बात पर सहमत नहीं होते और न ही हमें होना चाहिए। परंतु हमें परिभाषित करनेवाले सभी लेबलों और श्रेणियों के बावजूद अमेरिकी शालीन, उदार एवं संवेदनशील लोग हैं, जो अपने सामने खड़ी सामूहिक चुनौतियों और अपनी सामूहिक आशाओं को लेकर एक हैं। जब उस बुनियादी अच्छाई और देशभक्ति का आह्वान किया जाता है, तब हमारा देश उनका भरपूर परिचय देता है। बराक ओबामा का उसमें गहरा विश्वास है। राष्ट्रपति के रूप में वे इस ओवल कार्यालय के वर्तमान पदाधिकारी की तुलना में बिलकुल अलग तरह से कार्य करेंगे।



राष्ट्रपति के रूप में बराक ओबामा पहले दिन से ही कार्यशैली में ऐसे आचार संबंधी ऐतिहासिक सुधार करेंगे, जो व्हाइट हाउस को पीपल्स हाउस में तब्दील कर दे।

बराक ओबामा• उस रिवॉल्विंग दरवाजे को बंद कर देंगे, जो सरकारी कर्मचारियों के लिए अपनी प्रशासकीय जिम्मेदारियों को सत्ता के दलालों के रूप में इस्तेमाल किया जाना संभव बना देता है।



• बिना बॉली के ठेकों की बुराई समाप्त कर देंगे तथा पदासीन रीजनीतिज्ञों को उपहार देना पूरी तरह से प्रतिबंधित कर देंगे।



• नौकरियाँ दलगत या विचारधारा के आधार पर नहीं, बल्कि केवल योग्यता और अनुभव के आधार पर देंगे।



• सरकार को और अधिक खुली व पारदर्शी बनाने के लिए इंटरनेट का उपयोग करेंगे, ताकि कोई भी यह देख सके कि वाशिंगटन का काम लोगों की सेवा करना है।



वाशिंगटन को चुस्त-दुरुस्त बनाकर हम देश के सामने खड़ी चुनौतियों का सामना करने में समर्थ होंगे। सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है–अर्थव्यवस्था को उछाल के साथ शुरू करना और यह सुनिश्चित करना कि अधिक-से-अधिक लोगों को उसका लाभ मिल सके।
 
                              क्या ऐसी ही कोई सोच हमारे किसीभी राजनेता मैं है ....?

यजुर्वेद युवाओं के लिए.........प्रवेश सक्सेना ..प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश..................

Yajurved Yuvaon Ke Liye











सारांश:






‘वेद : युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की तीसरी पुस्तक ‘यजुर्वेद : युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें यजुर्वेद के 112 मन्त्रों को ऋग्वेद की तरह दम शीर्षकों के अन्तर्गत समाहित किया गया है। ज्ञान-शिक्षा, स्वास्थ्य-योग, मानसिक स्वास्थ्य, धर्म-नैतिकता, अर्थ-धनैश्चर्य घर-परिवार, समाज, राष्ट्र, पर्यावरण तथा वेश्विकता जैसे विषयों पर इन मन्त्रों के माध्यम से चर्चा हुई है। यजुर्वेद मुख्यतः कर्म से सम्बद्ध है। यह कर्म यज्ञ है, जिसे यहाँ श्रेष्ठतम बताया गया है। पारम्परिक दृष्टि से ‘यज्ञ’ का सीमित अर्थ होता है–अग्नि में आहुति देना। परन्तु ‘यज्ञ’ का व्यापक अर्थ भी है, जहाँ समर्पण भाव मुख्य रहता है। अतः समाजोपयोगी सभी कर्म यज्ञ के अन्तर्गत आ जाते हैं।



इन मन्त्रों में ज्ञान, दीर्घायु व धन-सम्पत्ति तथा सुरक्षादि पाने के लिए प्रार्थनाएँ हैं। क्रीड़ा, योगादि शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। धर्म कर्तव्य तथा नैतिकता से जुड़ा है। यह लोभ प्रवृत्ति ही है, जिससे संसार में उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिलता है, इसी के कारण एक ओर भय व आतंक पनपते हैं तो दूसरी ओर पर्यावरण-प्रदूषण होता है। आधुनिक युग में यज्ञपरक जीवन परोपकार भावना से युक्त मानव-जनों की अपेक्षा है। शान्ति’ के लिए किया जाने वाला ‘शान्तिपाठ’ इसी वेद की देन है।

यजुर्वेदयजुर्वेद को मनुस्मृति में ‘वायु’ से सम्बद्ध बताया गया है। ऋग्वेद अग्नि तथा सामवेद सूर्य से सम्बद्घ है। ‘वायु’ गति का प्रतीक है। वायु यजुर्वेद की गति या कर्म सम्बन्धी विशेषता का परिचायक है क्योंकि गति और कर्म एक-दूसरे के पर्याप्त ही हैं। जहाँ गति होती है वहाँ कर्मशीलता होती है। अकर्मण्यता जड़ता का प्रतीक है, ठहराव का प्रतीक है। यजुर्वेद में कर्मशीलता की प्रधानता है, कर्म की मुख्यता है। ‘कर्म’ में ही यज्ञ करना भी निहित है। यज्ञ को यह वेद श्रेष्ठतम कर्म मानता है। यजुर्वेद ‘अध्वर्यु’ नामक पुरोहित के लिए है। जैसे ऋग्वेद में ‘होता’ देवों का आहवान करता, यज्ञ का निर्देशन करता था उसी प्रकार ‘अध्वर्यु’ यज्ञ का संपादन और संचालन करता था। इस कार्य में गति और वेग दोनों अपेक्षित हैं। यह गति कर्मेन्द्रियों-ज्ञानेन्द्रियों की गति है तथा मन का वेग भी है। विचारों का वेग तथा बुद्धि का प्रवाह भी।



यजुर्वेद का अर्थ है ‘यजुषों का वेद’–यजुष् शब्द के निम्न अर्थ हैं–वे मन्त्र जिनसे यज्ञयागादि किए जाते हैं। अनियताक्षरों से समाप्त होने वाले वाक्य को यजुः कहते हैं। गद्यात्मक मन्त्रों का नाम ‘यजुः’ होता है। जहाँ तक शुक्ल-यजुर्वेद का प्रश्न है वहाँ छन्दों का निर्देश सिद्ध करता है कि यह वेद छन्दात्मक है। कृष्णयजुर्वेद अवश्य ही गद्यात्मक है।



यजुर्वेद की शाखाएँ–महाभाष्यकार पतञ्जलि ने यजुर्वेद की एक सौ एक शाखाओं का उल्लेख किया है। इनमें से आज मात्र 6 शाखाएँ उपलब्ध हैं। यज़ुर्वेद के दो मुख्य भेद हैं–शुक्लयजुर्वेद तथा कृष्णयजुर्वेद। शुक्लयजुर्वेद की दो शाखाएँ माध्यान्दिन तथा काण्व हैं और कृष्णयजुर्वेद की चार शाखाएँ हैं–तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक तथा कपिष्ठलकठ।



शुक्लयजुर्वेद तथा कृष्णयजुर्वेद में भेद–शुक्ल और कृष्ण का भेद इन दोनों के स्वरूप पर आधारित है। इस वेद के दो सम्प्रदाय हैं–ब्रह्म और आदित्य। ब्रह्मसम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व कृष्णयजुर्वेद करता है तथा आदित्यसम्प्रदाय का शुक्लयजुर्वेद। इन दोनों का भेद इनकी विषयवस्तु से होता है। शुक्ल का अर्थ होता है श्वेत या शुद्ध। इसका शुक्लत्व इस बात में है कि इसमें केवल मन्त्रों का संग्रह है। दूसरी ओर, कृष्ण का अर्थ होता है काला या ‘अशुद्ध’। यहाँ ‘अशुद्ध’ का अर्थ ‘ग़लत’ नहीं है अपितु मन्त्र के साथ ब्राह्मणअंश के मिश्रण से है।



इसके अतिरिक्त शुक्लयजुर्वेद में केवल मन्त्र हैं, उनकी व्याख्याएँ तथा विभिन्न यज्ञों में उनके विनियोग (एप्लीकेशन) की बात नहीं बताई गई है। कृष्णयजुर्वेद में मन्त्रों के साथ उनकी व्याख्याएँ तथा आख्यान तो हैं ही, साथ ही उनके विनियोग भी बताए गए हैं।

एक और मत के अनुसार ‘कृष्णयजुर्वेद’ की शाखाओं का विस्तार प्रायः दक्षिण भारत में तथा ‘शुक्लयजुर्वेद’ का उत्तर भारत में है।



शुक्लयजुर्वेद की विषयवस्तु–शुक्लयजुर्वेद का एक नाम वाजसनेयी संहिता भी है क्योंकि याज्ञवल्क्य वाजस़नेयी इसके प्रथम आचार्य थे। इसकी कण्व तथा ‘माध्यन्दिन’ दो शाखाएँ हैं। सामान्य रूप से जब भी यजुर्वेद का उल्लेख होता है इसी वेद से अभिप्राय होता है। शुक्लयजुर्वेद में चालीस अध्याय हैं तथा 2086 मन्त्र हैं।



पहले तीन अध्यायों में दर्श (अमावस्या) और पूर्णमास तथा अग्निहोत्र और चातुर्मास्य से सम्बद्ध मन्त्र हैं। चतुर्थ से दशम अध्यायपर्यन्त अध्यायों में सोमयाग, वाजपेय तथा राजसूय नामक यज्ञों के मंत्र संगृहीत हैं। एकादश से अष्टादश अध्याय तक के मन्त्रों का विषय अग्निचयन है। उन्नीस से इक्कीस अध्याय तक सौत्रामणी यज्ञ के मन्त्र हैं। इस यज्ञ में अश्विनौ, सरस्वती तथा इन्द्र को पवित्र मन्त्र संकलित हैं। छब्बीस से उनतीस अध्यायों में विभिन्न यज्ञों के पूरक मन्त्र संकलित हैं। तीसवें अध्याय का विषय पुरुषमेध है। सर्वमेध यज्ञ के मन्त्र अगले तीन अध्यायों में संकलित हैं। चौंतीसवें में शिवसंकल्प के प्रसिद्ध मन्त्र हैं। अगले अध्याय में पितृमेध तथा छत्तीस से अड़तीस तक प्रवर्ग्य यज्ञ से सम्बद्ध मन्त्र संगृहीत हैं। अन्तिम अध्याय प्रसिद्ध ईशोपनिषद्र है।



इन चालीस अध्यायों में से पहले पच्चीस अध्याय को ही यजुर्वेद का मौलिक अंश माना जाता है। परम्परा के अनुसार 26-35 तक के अध्याय खिल अथवा प्रक्षिप्त हैं। भाषा और विषयवस्तु के आधार पर पाश्चात्य विद्वान् पहले 18 को ही मौलिक मानते हैं।



यजुर्वेद को मुख्यरूप से कर्मकाण्डपरक माना जाता है। ‘कर्म’ यहाँ ‘यज्ञ का पर्याय ही है। भले ही यह वेद ‘यज्ञुपरक’ है परन्तु प्रसग्ङानुसार अन्य-अन्य विषयों का समावेश भी यहाँ हुआ है। मनोविज्ञान, दर्शन, अध्यात्म तथा पर्यावर्ण सम्बन्धी प्रभूत सामग्री यहाँ उपलब्ध है।



16वें अध्याय में शतरुद्रीयहोम के प्रसंग में रुद्र की कल्पना तथा अवधारणा विवेचित हुई है। तत्त्कालीन व्यवसाय, पेशे तथा कलाकौशल आदि का परिचय 30वें अध्याय से मिलता है। पुरुषसूक्त तथा हिरण्यगर्भसूक्त के मन्त्र उल्लिखित हुए हैं। ‘शिवसंकल्प-सूत्र’ में मनोवैज्ञानिक तथ्यों का उदघाटन हुआ है। अन्तिम अध्याय तो ईशोपनिषद्र ही है जहाँ दार्शनिक भावों को अभिव्यक्ति दी गई है।

शिक्षा का सिद्धान्त

आशिक्षायै प्रश्निनमुपशिक्षाया अभिप्रश्निननं मर्यादायै प्रश्नविवाकम्।।

ऋषि :–नारायणः । देवता–विद्वान्। छन्दः–भुरिगत्यष्टः।

शब्दार्थ : (आशिक्षायै प्रश्निनं) शिक्षा के लिए प्रश्न पूछने वाले को, (उपशिक्षाया अभिप्रश्निन) अभ्यास के लिए जिज्ञासु को तथा (मर्यादायै प्रश्नविवाकम्) नियमव्यवस्था के लिए प्रश्नसमाधानकर्त्ता को (नियुक्त करो)।



व्याख्या : सामान्यतः आचार्य या गुरु शिष्य का आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक होता है। वह अनुभवहीन की स्वयं ज्ञानार्जित करने के लिए सहायता करता है। ‘‘आचार्यदेवो भव’ कहकर इसीलिए आचार्य का सम्मान किया जाता रहा है। भारतीय संस्कृति में अज्ञान से ज्ञान की ओर ले चलने वाले गुरु की महत्ता सदा से विद्यमान रही है। शिक्षा चाहे आध्यात्मिक हो या बौद्धिक–एक सुन्दर सिद्धान्त पर आधृत रही है। और वह सुन्दर सिद्धान्त है कि आचार्य या गुरु, आज की भाषा में कहें तो शिक्षक की भूमिका एक पथ-प्रदर्शक की है, गाइड की है। बाकी सब शिष्य या छात्र को स्वयं ही करना होता है। धर्म के सम्बन्ध में इसका अर्थ होगा कि हर व्यक्ति को स्वयं के लिए उन सत्यों का उदघाटन खुद करना होगा जो परमसत्य से सम्बन्द्ध हैं। या सीधे-सादे शब्दों में कहें कि ‘सत्य’ की या ‘परमसत्या’ की तलाश व्यक्ति को खुद करनी होती है। यह ‘तलाश’ प्रश्नों की अपेक्षा रखती है। यजुर्वेद का यह मन्त्रांश शिक्षा के चरम उद्देश्य को अभियञ्जित कर रहा है।



शिक्षा-शिक्षण या ज्ञान के लिए प्रश्नकर्ता को नियुक्त करना चाहिए। यह अनुभूत सत्य है कि जिस विषय को गहराई से जानना हो उसके लिए प्रश्न-प्रश्न मन में जागने चाहिए। असली शिक्षक वही जो व्यक्ति के मन में ‘प्रश्न’ जगा सके और सच्चा शिष्य या छात्र वह जो प्रश्न पूछने का साहस जुटा सके। ज्ञानार्जन की प्रथम सीढ़ी ‘प्रश्न’ ही है। प्रश्न अभ्यास के लिए भी ज़रूरी हैं। प्यारे बच्चों ! जानते हो न, तुम्हारी पाठ्यपुस्तकों में पाठ के अन्त में प्रश्न दिए रहते हैं। उनके उत्तर ढूँढ़ना, उन्हें लिखना, याद करना–यह सब शिक्षण-विधि के अन्तर्गत ही आता है। ‘अभिप्रश्निः’ का एक अर्थ है चारों ओर से प्रश्न करना। कोई भी विषय हो–उसका कोई एक बना-बनाया उत्तर नहीं होता। अनेक-अनेक आयाम होते हैं एक-एक विषय के गहराई से समझने के लिए तरह-तरह से सोचना होगा, तरह-तरह की समस्याएँ उठानी होंगी। फिर समाधान मिलेंगे। मन्त्र का अन्तिम अंश है–मर्यादा के लिए ‘प्रश्नविवाक’ होना चाहिए। मर्यादा उस व्यवस्था को कहते हैं जो मननशील मनुष्य स्वसम्मति से सबके पालन के लिए निश्चित करते हैं। मर्यादापालन एक प्रकार से आत्माशासन है। कहना न होगा शिक्षाप्राप्ति, ज्ञानार्जन या किसी भी आध्यात्मिक या वैज्ञानिक ख़ोज के लिए आत्मानुशासन की ज़रूरत होती है। आत्मानुशासन के लिए प्रश्नों का समाधानकर्ता चाहिए। प्रश्न पूछने में न संकोच करो, न उनके उत्तर ढूँढ़ने में आलस करो।



भारतीय शिक्षाव्यवस्था में छात्र की मौलिकता को प्रेरित करने के लिए ‘प्रश्न’ पूछने की स्वतन्त्रता सदा रही है। कुछ लोग भले ही मानते रहें कि शिष्य को आँख मूँदकर गुरु की बात माननी चाहिए या गुरु जो मार्ग खोजता है उसी पर चलने को शिष्य बाध्य होता है। वास्तव में गुरु का कार्य, शिक्षक की भूमिका शिष्य/छात्र में जिज्ञासा जगाने की ही है। आगे का मार्ग उसे खुद तयकरना होता है। ‘प्रश्न विवाक’ का अर्थ पंच या न्यायाधीश भी होता है। सत्य-असत्य, भले-बुरे का निर्णय जैसे पंच या न्यायाधीश करता है वैसे ही व्यक्ति को ज्ञानमार्ग पर चलते हुए प्रश्न-प्रतिप्रश्न करके अपने अनुभव में वृद्धि करनी चाहिए तथा स्वयं विवेक से भले-बुरे का निर्णय करना चाहिए।



रविवार, 10 जून 2012

भारत की आवाज़.......ए पी जे अब्दुल कलाम....

                 

                                                                       सारांश:
Bharat Ki Awaz

                          डॉ. कलाम का मानना है कि किसी भी देश की आत्मा उसमें रहने वाले लोग होते हैं, और उनकी उन्नति में ही देश की उन्नति है। आदर्शवाद से ओतप्रोत, लेकिन वास्तविकता से जुड़ी भारत की आवाज़ दर्शाती है कि व्यक्गित और राष्ट्रीय स्तर पर प्रगति संभव है, बशर्ते हम इस सिद्धांत पर चलें कि ‘‘देश किसी भी व्यक्ति या संगठन से बढ़कर होता है’’ और यह समझें कि ‘‘केवल सीमारहित मस्तिष्क ही सीमारहित समाज का निर्माण कर सकते हैं।’’


 
 
‘‘मुझे लगता है कि हमें देश के लिए एक अलग दृष्टिकोण की आवश्यकता है, ठीक वैसा ही दृष्टिकोण जैसा अंग्रेज़ों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम के समय हमारा था। उस समय राष्ट्रवाद की भावना बहुत प्रबल थी। भारत को एक विकसित राष्ट्र में बदलने के लिए आवश्यक यह दूसरा दृष्टिकोण एक बार फिर राष्ट्रवाद की भावना को शीर्ष पर लाएगा।’’







विकाश के लाभ उठाने के बाद अब भारत के लोग अधिक शिक्षा, अधिक अवसरों और अधिक विकास के लिए बेताब हैं। लेकिन समृद्ध और संगठित भारत के निर्माण का उनका यह सपना कहीं-न-कहीं चूर-चूर होता दिखाई दे रहा है : देश को बांटने वाली राजनीति, बढ़ती आर्थिक विषमता और देश तथा उसकी सीमाओं पर मौजूद डर और अशांति के दानव देश के मर्मस्थल पर चोट कर रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में देश और उसकी अवधारणा की रक्षा कैसे की जाए और विकास के लक्ष्य पर कैसे आगे बढ़ा जाए ?






यह पुस्तक कुछ ऐसे ही प्रश्न उठाती है और उनके उत्तर तलाशती है।






डॉ. कलाम का मानना है कि किसी भी देश की आत्मा उसमें रहने वाले लोग होते हैं, और उनकी उन्नति में ही देश की उन्नति है। आदर्शवाद से ओतप्रोत, लेकिन वास्तविकता से जुड़ी भारत की आवाज़ दर्शाती है कि व्यक्गित और राष्ट्रीय स्तर पर प्रगति संभव है, बशर्ते हम इस सिद्धांत पर चलें कि ‘‘देश किसी भी व्यक्ति या संगठन से बढ़कर होता है’’ और यह समझें कि ‘‘केवल सीमारहित मस्तिष्क ही सीमारहित समाज का निर्माण कर सकते हैं।’’






भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम देश के अब तक के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति सिद्ध हुए हैं। वे भारत के उन लाखों युवाओं के आदर्श हैं जो उन्हीं की तरह मेहनत और ईमानदारी से सफलता पाना चाहते हैं।






भारत की गिनती भी एक दिन विकसित देशों में की जाएगी, इसी विश्वास और संकल्प के साथ डॉ. कलाम राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बावजूद आज भी लोगों के बीच जाकर उनसे मिलते हैं, बातचीत करते हैं और उन्हें प्रोत्साहित करते हैं। लोग उनकी बात मंत्रमुग्ध होकर सुनते हैं, खासकर युवाओं के लिए उनकी कही हर बात विशेष महत्त्व रखती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि देश के पुनरुत्थान की अगर कोई उम्मीद शेष है, तो वह केवल डॉ. कलाम ही हैं। शायद इसी कारण राष्ट्रपति के रूप में वे जहां भी गए, और आज भी वे जहां भी जाते हैं, लोग उनसे अपने मन में जब-तब उठने वाले ढेरों प्रश्न करते हैं।






भारत की आवाज़ उनसे पूछे गए ऐसे ही कुछ बेहद दिलचस्प, प्रासंगिक और कुछ अप्रासंगिक लेकिन रोचक प्रश्नों का संकलन है। ये प्रश्न भारत के युवाओं के सपनों, सरोकारों और महत्त्वाकांक्षाओं की झलक पेश करते हैं, और डॉ. कलाम के उत्तर सशक्त, संगठित और समृद्ध भारत के निर्माण की राह दिखाते हैं।






यह पुस्तक विकसित भारत के निर्माण की राह दिखाती है। युवाओं को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।


—दैनिक ट्रिब्यून


‘नंबर वन’ तो अपने कलाम साहब हैं ही और इस पुस्तक से मालूम होता है कि वे अपने देश को बड़ा बनाने का सपना हकीकत में कैसे बदलते देखना चाहते हैं।


—खुसवंत सिंह


‘भारत की आवाज़’ पढ़ने से पता चलता है कि राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद भी कलाम इतने लोकप्रिय क्यों हैं। इस पुस्तक में कहीं कलाम एक दार्शनिक के रूप में नज़र आते हैं तो कहीं उनकी बातों में एक जननेता की झलक दिखाई देती है।


—तहलका


भारत की आवाज़


स्वतन्त्रता आंदोलन ने हमारे अंदर यह भाव पैदा कर दिया कि राष्ट्र किसी व्यक्ति या संस्था से बड़ा होता है। किन्तु विगत कुछ दशकों से यह राष्ट्रीय भाव लुप्त होता जा रहा है। आज आवश्यकता है कि सभी राजनैतिक दल आपस में सहयोग करें और इस ज्वलंत प्रश्न का उत्तर दें—‘‘भारत कब एक विकसित राष्ट्र बनेगा ?’’






धर्म-निरपेक्षता के सिद्धान्त के प्रति अटूट निष्ठा होना चाहिए। धर्म-निरपेक्षता हमारी राष्ट्रियता का आधार है और हमारी सभ्यता का एक प्रबल पक्ष है। सभी धर्मों के नेताओं को एक ही तरह का संदेश देना चाहिए जिससे लोगों के दिल-दिमाग में एकता का भाव पैदा हो जिससे हमारा देश खुशहाल और सम्पन्न हो सके।






आज समय की माँग है कि हर नागरिक अनुशासित आचरण करे, इससे जागरूक नागरिकों का निर्माण होगा। किसी देश के लोग जितने अच्छे होते हैं वह देश उतना ही अच्छा होता है। किसी देश की संरचना में वहाँ की जनता के






जीवन-मूल्य, नैतिकता और आचरण प्रकट होते हैं। ये बहुत महत्त्वपूर्ण कारक होते हैं जो निर्धारित करते हैं कि देश प्रगति के पथ पर चलेगा या फिर ठहराव के दौर से गुज़रेगा।






हमें अपने दैनिक जीवन में ईमानदारी, निष्ठा और सहनशीलता जैसे मूल्यों का पालन करना है। इससे हमारी राजनीति राष्ट्रनीति में बदल जाएगी। हमें सामाजिक स्तर पर यह सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा कि हम अपने देश के लिए क्या कर सकते हैं।






हमने अपने पूर्वजों द्वारा किए गए कार्यों और उनकी छोड़ी गई विरासत से बहुत लाभ उठाया है। अब यह हमारा अधिकार और दायित्व है कि हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए एक सकारात्मक परंपरा स्थापित करें जिसके कारण वह हमें याद रखेगी।






यदि 54 करोड़ युवा इस भावना के साथ काम करें ‘‘मैं यह कर सकता हूँ’’, ‘‘हम यह कर सकते हैं’’ और ‘‘भारत यह कर सकता है’’, तो भारत को विकसित देश बनने से कोई नहीं रोक सकता






व्यक्ति का विकास अधिक महत्त्वपूर्ण है या राष्ट्र का ? व्यक्ति का विकास राष्ट्र के विकास में किस प्रकार सहायक हो सकता है ?


—हीबा जेमी, लेडी डोआक कॉलेज, मदुरै


किसी भी राष्ट्र का विकास उसकी जनता के द्वारा ही किया जाता है। इसलिए, व्यक्ति का विकास ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है। हमें व्यक्ति के विकास का एक ऐसा कार्यक्रम बनाना चाहिए, जिससे ऐसे जागृत नागरिकों का निर्माण हो, जो राष्ट्र के विकास का कार्य कर सकें।






आपके विचार में, सैनिक, शिक्षक, डॉक्टर, और वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ—इनमें से देश की सर्वोत्तम सेवा कौन करता है ?


—तरन्नुम, केन्द्रीय विद्यालय, पठानकोट


इनमें से प्रत्येक व्यक्ति देश की उत्तम सेवा कर सकता है।






• सैनिक का कार्य है देश के एक अरब से अधिक नागरिकों की रात-दिन इस तरह सुरक्षा करना कि वे शान्तिपूर्वक देश के विकास का कार्य करते रह सकें।


• शिक्षक का कार्य है जागृत नागरिकों और भविष्य के नेताओं का निर्माण।


• डॉक्टर का ध्येय-वाक्य होने चाहिए—‘मानवता के कष्टों का, अपने दिमाग का सही उपयोग करते हुए निवारण करना।’


• वैज्ञानिक का कार्य है निरन्तर विकास के लिए नये-नये उपाय प्रदान करना।


• राजनीतिज्ञ का कार्य है समाज के सभी वर्गों के सभी कार्यों का समग्र राष्ट्रीय विकास की दिशा में आयोजन करना।


और इन सबके लिए श्रेष्ठ मनुष्य बनना बहुत आवश्यक है।






विकसित भारत के आपके विज़न में सामान्य व्यक्ति किस प्रकार अपना योगदान कर सकता है ?


—लालमणि, विकास भारती, मुंगेर


सामान्य व्यक्ति अपने क्षेत्र के अशिक्षित व्यक्तियों को पढ़ना-लिखाना सिखा सकता है—इर्द-गिर्द पेड़-पौधे बो सकता है और उनकी देखभाल कर सकता है; इलाके को साफ़-सुथरा रखने का काम कर सकता है और देश-हित के लिए अवांछनीय कार्यों की अधिकारियों को सूचना दे सकता है।






भारत को पूर्ण विकसित राष्ट्र के रूप में निर्मित करने के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा क्या है ?


—डेविड पी. कॉन, कनेक्टिकट कॉलेज, अमेरिका


हमारे विकसित राष्ट्र के रूप में बढ़ने के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है हमारी पराजयवादी मनोवृत्ति। एक बाधा यह भी है कि हमारे लक्ष्य हमेशा छोटे होते हैं। सच बात तो यह है कि छोटे लक्ष्य रखना अपराध है। हमारे लोग जब ऊँचे और बड़े लक्ष्य निर्धारित करने लगेंगे, तब सब ठीक हो जाएगा और जनता का नेतृत्व करने के लिए तो ऐसे लोग चाहिए जो मिशनरी भावना से काम करें और जिनमें नेतृत्व करने की विशेष योग्यता भी हो
source.............http://pustak.org/home.php?bookid=7846

न भूतो न भविष्यति......नरेन्द्र कोहली........प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश.........................

Na Bhuto Na Bhavisyati











आधी रात हो चुकी थी। अपने मन की अशांति और व्याकुलता से संघर्ष करता, नरेन्द्र अपने कमरे में लेटा हुआ था। भयंकर ऊहापोह से उसका मन जैसे विस्फोट की स्थिति तक पहुँच गया था। विचारों के अंधड़ उसके अस्तित्व के चिथड़े उड़ा देना चाहते थे।



व्याकुलता में उसने अनेक एक बार विभिन्न कोणों से करवटें बदलीं; किंतु किसी करवट भी कल नहीं पड़ रही थी। जब किसी भी प्रकार लेटा नहीं रह सका, तो उठकर खड़ा हो गया। कुछ देर अपना सिर पकड़े पलंग पर बैठा रहा, और फिर विकट व्याकुलता की स्थिति में, कमरे के एक सिरे से दूसरे सिरे तक चक्कर काटने लगा।

उसके मन में कुछ बिंब प्रकट हुए; धन सम्पत्ति, सोना-चांदी और प्रसाद, हाथी-घोड़े, बग्घियाँ, दास-दासियाँ, भोजन व्यंजन, सुंदर स्त्रियाँ, ऐश्वर्य में लिप्त जीवन।

नरेन्द्र की व्याकुलता बढ़ गई। उसके टहलने में अधिक व्यग्रता प्रकट होने लगी, जैसे उन बिंबों से पीछा छुड़ाने का प्रयत्न कर रहा हो। वह टहलता चला गया। तब उसके मन में दूसरे बिंब प्रकट हुए : सन्यासी का जीवन, हिमालय की गुफा, वत्कल वस्त्र, सिर पर जटाएँ, तपस्या, तपस्या और तपस्या, ईश्वर से प्रेम, ईश्वर की भक्ति, ईश्वर के दर्शन, ईश्वर का साक्षात्कार। बिंबों की संख्या इतनी अधिक थी कि वे एक-दूसरे पर आरोपित-प्रत्यारोपित होने लगे।

अपने कमरे में टिक रहना असंभव हो गया। उसका दम घुट रहा था। वह कपाट खोलकर कमरे से बाहर निकल आया।

उसे लगा वह आत्मनियंत्रण खो चुका था।

विभिन्न गलियों के आल जाल के चक्कर काटता हुआ, वह मुख्य सड़क पर पहुँचा। वहाँ से वह गंगा तट की ओर चल पड़ा। गंगा के जल से भीगी हवा उसके मुख से टकराई तो जैसे उसकी आत्मा सुगबुगाई : ‘‘यह उचित नहीं है।

‘‘जानता हूँ।’’ उसने अपनी आत्मा को समझाया, ‘‘किंतु अब रुकना संभव नहीं। प्रतीक्षा नहीं कर सकता मैं। आत्मदमन की भी कोई सीमा होती है।’’ वह आगे बढ़ता चला गया। गंगा का जल था कि अंधकार में एक विराट अंधकार का सागर बह रहा था। तट पर एक ओर कुछ बजरे बँधे खड़े थे। उनमें से छनकर मंद-सा प्रकाश बाहर आ रहा था। उसने अपनी दृष्टि फेर ली। दूर धारा के मध्य भी एक बजरा था, जो न चल रहा था और न ही खड़ा था। नरेन्द्र मुग्ध दृष्टि से उसकी ओर देखता रहा और फिर जैसे उसकी आँखों में एक विकट तृष्णा झलकी।

आतुरता में उसने छलांग लगाई। जल ने फटकर उसके लिए स्थान बना दिया। नरेन्द्र ने अपने कूदने के स्थान से पाँच-छह मीटर आगे, जल में से सिर बाहर निकाला। वह वेग से धारा के बीच वाले बजरे की ओर तैरता चला गया। अंततः वह बजरे के निकट पहुँचा। बजरे से लगा-लगा कुछ देर तैर कर जैसे उसके विषय में कुछ जानकारी प्राप्ति करता रहा। फिर बजरे की पट्टी पकड़, उचककर ऊपर आ गया।

माझी अथवा सेवक लोग बजरे के एक सिरे पर बने छोटे से कक्ष में अथवा उसी के आसपास रहे होंगे। बजरे के मुख्य भाग में कोई नहीं था।

नरेन्द्र दो-एक छोटे कक्षों को निर्विघ्न पार कर, केन्द्र में बने मुख्य कक्ष में आ गया। मध्य भाग में मूल्यवान कालीन बाघंबर बिछाए, पद्मासन लगाए महर्षि देवेन्द्रनाथ ध्यान कर रहे थे। नरेन्द्र उनके सम्मुख खड़ा हो गया।

‘‘महाशय !’’

महर्षि का ध्यान टूटा, आँखें खुलीं। वे विचलित थे और कुछ झुब्ध भी। उनके सामने जैसे कोई छाया खड़ी थी। उन्होंने अपने निकट रखी लालटेन उठाई। नरेन्द्र के चेहरे पर पूरा प्रकाश पड़ा : सिर से पैर तक भीगा हुआ था। कपड़े शरीर से चिपक गए थे। उसके बालों और वस्त्रों से पानी टपक रहा था जिससे फर्श पर बिछा कालीन गीला हो रहा था।

‘‘नरेन्द्रनाथ तुम इस समय यहाँ ?’’

‘‘आप मुझे जानते हैं महर्षि ?’’

‘‘ब्रह्म समाज के उत्सवों के समय तुम्हें गाते हुए सुना है।’’ वे बोले, ‘‘किंतु आधी रात को गंगा के मध्य धारा में खड़े बजरे में? तुम.....’’

‘‘मुझे आपसे एक प्रश्न पूछना है महर्षि ! रुक नहीं सका।’’

‘‘तैर कर आए हो ?’’

‘‘इस समय नौका कहाँ मिलती।’’

देवेन्द्रनाथ प्रच्छन खीज के साथ बोले, ‘‘इतना विकट है तुम्हारा प्रश्न ?’’

‘‘मेरे जीवन मरण का प्रश्न है।’’

‘‘पूछो।’’

नरेन्द्र उनके निकट चला गया। अपनी दृष्टि से जैसे उन्हें चीरता हुआ बोला, ‘‘संसार का लक्ष्य है—इंद्रियभोग, धन-संपत्ति, सोना-चाँदी, प्रासाद, हाथी-घोड़े, दास-दासियाँ, वस्त्राभूषण, भोजन व्यंजन, कामिनी कांचन, पर मनुष्य के जीवन का लक्ष्य क्या है ?’’

देवेन्द्रनाथ उसकी और देखते रहे, कुछ बोले नहीं।

‘‘क्या मानवजीवन का लक्ष्य है—इनमें लिप्त न होगा, इन सबका त्याग ? विसर्जन ?’’

‘‘हाँ पुत्र ! ये सब बंधन हैं। वे जीवात्मा को बांधते हैं। भोग से मुक्ति ही जीवन का लक्ष्य है।’’

‘‘अर्थात् संन्यासी का जीवन। हिमालय की गुफा। वत्कल वस्त्र। सिर पर जटाँ। तपस्या। ईश्वर से प्रेम, ईश्वर की भक्ति। ईश्वर के दर्शन। ईश्वर का साक्षात्कार।’’

‘‘आपने ईश्वर को देखा है ?’’ नरेन्द्र ने जैसे झपट कर पूछा।

देवेन्द्रनाथ उसकी ओर देखते रह गए, कोई उत्तर दे नहीं पाए।

नरेन्द्र का स्वर कुछ और प्रबल हो गया, ‘‘आपने ईश्वर का साक्षात्कार किया है ?’’

महर्षि ने उसकी ओर देखा और जैसे सायास अपने हृदय का सारा माधुर्य वाणी में उँडेला, ‘‘पुत्र ! तुम्हारे नेत्र, एक योगी के नेत्र हैं।’’

नरेन्द्र ने भी उनकी ओर देखा। उसकी आँखों में निराशा और कठोरता थी।

‘‘तुम ध्यान किया करो पुत्र ! मैं तुम्हारे लिए एक महान योगी का भविष्य देख रहा हूँ।’’

नरेन्द्र की आँखों की कठोरता का भाव और भी सघन हो गया। उसमें निराशा उतर आई। उसने एक शब्द भी नहीं कहा और वापस जाने के लिए मुड़ गया।

‘‘सुनो पुत्र ! इस अँधेरे में गंगा में मत कूदना।’’ देवेन्द्रनाथ ने पीछे से कहा।

किंतु नरेन्द्र रुका नहीं, वह चलता चला गया।

‘‘रुक जाओ। मत कूदो।’’ देवेन्द्रनाथ ने पुनः कहा।

‘‘कूद कर ही खोजना होगा। खोज कर कौन कूदता है। नरेन्द्र ने जाते-जाते कहा।

2

विश्वनाथ अपने कक्ष में बैठे, कुछ कागज देख रहे थे। नरेन्द्र ने प्रवेश कर पूछा, ‘‘आपने बुलाया बाबा ?’’

‘‘हाँ !’’ विश्वनाथ ने अपने कागज इत्यादि नीचे रख दिए, ‘‘एफ.ए. में द्वितीय श्रेणी आ गई। अब ?’’

‘‘अब बी.ए.।’’

‘‘अंग्रेज़ी वाला बी.ए. ? या बांग्ला वाला बी.ए. ?

नरेन्द्र ने उसके परिहास की ओर ध्यान नहीं दिया, ‘‘आप नहीं चाहते कि मैं आगे पढ़ूँ ?’’

‘‘नहीं ! बी.ए. करो। मेरी इच्छा है कि तुम विधि की शिक्षा प्राप्त कर, अटर्नी बनो।’’

वितृष्णा से भरा हुआ नरेन्द्र कुछ कहे बिना ही बाहर जाने लगा।

‘‘नरेन्द्र ! पिता के रूप में तुम्हारी शिक्षा के अतिरिक्त भी मेरे कुछ दायित्व हैं।’’

नरेन्द्र ने आधे मुड़कर पूछा, ‘‘क्या बाबा ?’’

‘‘तुम्हारा विवाह !’’

‘‘शास्त्र के अनुसार पच्चीस वर्ष की अवस्था तक ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है।’’

‘‘धर्मशास्त्र के अनुसार !’’ विश्वनाथ बोले, ‘‘किंतु यह अर्थशास्त्र का युग है। पच्चीस वर्ष के लड़के के लिए हमारे समाज में वधू नहीं मिलती। उस अवस्था की सारी लड़कियाँ अपने-अपने ससुराल पहुँच चुकी होती हैं।’’

‘‘पर बाबा ! मैं अभी से बँधना नहीं चाहता। गृहस्थी के दायित्व....’’

‘‘पागल है तू ! बहू हम लाएँगे तो दायित्व हमारा होगा या तुम्हारा ? हमारे रहते तुम्हारे दायित्व का अर्थ ?’’

‘‘संतान का पालन, पिता का दायित्व है और पत्नी का पालन, पति का।’’ नरेन्द्र ने कहा।

‘‘बेकार की बात।’’

‘‘विवाह कर न मैं गृहस्थी के दायित्वों से बच सकता हूँ, न उनके प्रलोभनों से।’’

विश्वनाथ अपने असहाय क्रोध में उसकी ओर देखते रहे। नरेन्द्र चुपचाप कमरे से निकल गया। उसके जाते ही भुवनेश्वरी दूसरे द्वार से कमरे में आई, ‘‘नहीं माना न !’’

‘‘यह तो एकदम ही हाथों से निकला जा रहा है।’’ विश्वनाथ बोले।

3

रविवार के दिन प्रातः ही हेडो तालाब के किनारे, एक गोरा पादरी सड़क पर भाषण की मुद्रा में खड़ा था। वह मदारी के समान भीड़ इकट्ठी हो जाने की प्रतीक्षा कर रहा था। छितरे-छितरे से लोग इधर-उधर आते-जाते दिखाई पड़ रहे थे।

सहसा पादरी बोला, ‘‘हमारा ईश्वर इस सारे संसार को बनाता है। सूरज चाँद सितारे बनाता है। इस सारी कायनात को बनाता है, और हिंदुओं के ईश्वर को बनाता है, इनका कुम्हार।’’

नरेन्द्र के पग थम गए। उसने दृष्टि उठाकर पादरी की ओर देखा। किंतु व्यर्थ के झमेले से बचने के लिए, उसने स्वयं को बलात् आगे धकेला। पादरी के शब्द अब भी उसके कानों में पड़ रहे थे।

‘‘वह गंदा कुम्हार अपने पैरों से रौंदकर इस गंदी मिट्टी से एक घटिया-सी मूर्ति बना देता है और हिंदू उसकी पूजा करने लगते हैं। उसके सम्मुख माथा टेकने लगते हैं। वह उनका ईश्वर हो जाता है।’’

नरेन्द्र सबकुछ अनसुना कर चुपचाप आगे बढ़ जाना चाहता था, किंतु उसके पैरों में जैसे रोक ही लग गई।

‘‘हिंदू का धर्म है या राक्षसों का अघोर तंत्र। पति अपनी पत्नी को प्रतिदिन पीटता है। किसी दिन अधिक क्रोध आ जाए तो उसे जीवित जला देता है। वह नहीं जलाता तो उसकी मृत्यु के बाद, उसके संबंधी उसकी पत्नी को सती बनाने के नाम पर जीवित जला देते हैं। यह कोई धर्म है ?’’

अब नरेन्द्र स्वयं को रोक नहीं पाया। उसने पादरी को तीखी दृष्टि से देखा, पादरी को घेर कर खड़े, उसकी बातें सुन रहे लोगों पर भी घृणा की एक दृष्टि डाली; और फिर भीड़ को धकियाता-सा उस पादरी के सामने जा खड़ा हुआ, ‘‘क्या प्रत्येक हिन्दू पति अपनी पत्नी को जीवित जला देता है ?’’

पादरी ने उपेक्षा से उसकी ओर देखा और उद्दंडता से कहा, ‘‘हाँ ! जला देता है।’’

‘‘तो फिर इतनी सारी सुहागिनें जीवित कैसे हैं ?’’ नरेन्द्र ने उसे डाँटा, ‘‘सारी विधवाओं को जीवित जला दिया जाता है तो तीर्थस्थलों और मन्दिरों में इतनी सारी विधवाओं की भीड़ कहाँ से आ जाती है ?’’

‘‘मंदिर जाता ही कौन है।’’ पादरी बोला, ‘‘हम तो यही जानते हैं कि हिंदू लोग अपनी पत्नियों को जला देते हैं।’’

‘‘कुछ मूर्खों के दुष्कर्मों के कारण तुम सारे हिंदू समाज को कलंकित कर रहे हो। जो जलाता है, उस अपराधी को दंडित न करवाकर तुम हमारे धर्म को कलंकित करने में लगे हो।’’

पादरी को क्रोध आ गया, ‘‘ऐ, ऐ ज्यादा मत बोल।’’

‘‘समाज की कुप्रथाओं को धर्म पर आरोपित करना न्याय नहीं है।’’ नरेन्द्र उग्र हो उठा, ‘‘अंग्रेजों को शराब पीते देखकर हमने तो कभी ईसा को मदिरापान करने का समर्थक नहीं कहा। न ही ईसाई समाज को पियक्कड़ माना।

‘‘ऐ होश में आओ। तुम हमारे पैगंबर का अपमान नहीं कर सकते।’’

‘‘अपने पैगंबर का अपमान तो तुम कर रहे हो—झूठ बोल कर, अन्य धर्मों की झूठी निन्दा कर।’’

‘‘यह झूठ है ?’’ पादरी चिल्लाया, ‘‘क्या तुम्हारे यहाँ सती प्रथा नहीं है ?’’

‘‘ऐसी कोई प्रथा होती तो प्रत्येक घर में पत्नियाँ, पति के शव के साथ चितारोहण रह रही होतीं।’’ नरेन्द्र बोला, ‘‘सती वह नहीं होती, जो पति के साथ चितारोहण करती है।’’

पादरी आपे से बाहर हो गया, ‘‘वही होती है। वही होती है। तुम लोग अंधविश्वासी हो। औरतों को जला देते हो। तुम्हारी माताएँ अपने जीवित बच्चों को नदी में फेंक देती हैं तुम लोग मनुष्य नहीं पशु हो।’’

चारों ओर से लोग जमा होने लगे। धक्का-मुक्की होने लगी। कुछ लोग बीच-बचाव में चीख-चिल्ला रहे थे।

‘‘हम मूर्तिपूजा करते हैं, तो तुम क्या करते हो ?’’ नरेन्द्र ने कहा, ‘‘तुम्हारे गिरजों पर क्या सलीब पर टँगी ईसा की मूर्ति नहीं होती ? माता मरियम की मूर्ति के सम्मुख सिर नहीं झुकाते तुम लोग ?’’

‘‘ऐ जुबान संभाल कर। अंग्रेजों के राज्य में तुम एक पादरी का अपमान कर रहे हो।’’ पादरी ने अपना घूँसा हवा में लहराया, ‘‘जब जेल में सड़ोगे तब जानोगे कि किससे बातें कर रहे हो।’’

भीड़ में से आगे बढ़कर एक बलिष्ठ पुरुष ने पादरी का उठा हुआ हाथ थाम लिया, ‘‘सावधान ! इस बच्चे पर हाथ मत उठाना।’’

हक्का-बक्का सा पादरी उस पुरुष की ओर ही देख रहा था कि एक अन्य व्यक्ति भी आगे बढ़ आया, ‘‘तर्क नहीं कर सका तो घूँसेबाजी पर उतर आया।’’

पादरी का भी एक पक्षधर सामने आ गया, ‘‘तुम चुप रहो। अधिक बकवास करोगे तो तुम्हारे ये सारे दाँत तोड़ दूँगा, जो तुम्हारे मुँह से बाहर निकल आए हैं। वे लोग एक-दूसरे में गुत्थमगुत्था हो रहे थे कि एक सिपाही आ गया, ‘‘ऐ कौन झगड़ा कर रहा है। दंगा करोगे तो मार-मार कर हड्डियाँ तोड़ दूँगा। अंग्रेजों का राज्य है। इसे नवाबी राज मत समझना।’’

‘‘हम दंगा नहीं कर रहे हैं।’’ नरेन्द्र ने कहा, ‘‘पर इन्हें भी तो सँभालिए जो धार्मिक प्रवचन के नाम पर हमारे धर्म का निरंतर अपमान करते रहते हैं।’’

‘‘अच्छा समझा दूँगा इन्हें भी। जिसे देखो वही बड़ा विद्वान हो गया है।

4

संध्या समय विश्वनाथ घर लौटे, तो उनका शरीर थका हुआ था और मन बोझिल था।

‘‘आज बहुत थक गए हो।’’

भुवनेश्वरी ने कहा, ‘‘उठो हाथ-मुँह धोकर कुछ खा-पी लो।’’

विश्वनाथ मंद स्वर में बोले, ‘‘काकी ने वकील के माध्यम से नोटिस भिजवाया है।’’

‘‘क्या ?’’

‘‘हम बिना किसी अधिकार के उनके पति के घर में रह रहे हैं।’’

‘‘उनके पति के घर में ?’’

‘‘वे कहती हैं कि यह भवन उनके पति का है; और हम बल पूर्वक इस पर अधिकार जमाए बैठे हैं। वे असहाय विधवां हैं, इसलिए हमसे लड़ नहीं सकतीं। यदि हमने भवन नहीं खाली किया तो वे अदालत से प्रार्थना करेंगी कि भवन खाली करा कर, पूरी तरह से उन्हें सौंपा जाए।’’

‘‘तो फिर क्या सोचा है तुमने ? काकी के विरुद्ध मुकदमा लड़ोगे ?’’

‘‘तो क्या यह मिथ्या आरोप चुपचाप स्वीकार कर लूँ ?’’ विश्वनाथ बोले।

‘‘नहीं ! असत्य से तो समझौता कभी नहीं !’’ भुवनेश्वरी सहमत हो गई, ‘‘किंतु इस घर में हमारा जीवन विषाक्त हो जाएगा। ऐसा तो काकी का स्वभाव नहीं कि कचहरी में मुकदमा लड़ें और घर में हमसे स्नेह बनाए रखें।’’

‘‘यह तो शायद काली काका के जीवन में भी संभव नहीं होता। पर इस आरोप के रहते मैं इस भवन में नहीं रहूँगा। अब तो अदालत से वैध अधिकार प्राप्त कर ही यहाँ बसूँगा।’’ विश्वनाथ कुछ आवेश में बोले, ‘‘अपने पिता का एकमात्र उत्तराधिकारी होने के कारण, यह भवन मेरा है। सारा का सारा मेरा है।’’

‘‘इस भवन को छोड़ दोगे ?’’

‘‘न्यायालय से न्याय मिलने तक।’’

‘‘तो हम रहेंगे कहाँ ?’’

‘‘कहीं कोई स्थान किराए पर ले लेंगे।’’

‘‘किराए पर ?’’

‘‘हाँ। क्यों ?’’

‘‘अपना घर रहते हुए ?’’

‘‘अपना घर अब है कहाँ ?

5

जनवरी की सुबह थी। ऋतु ठंडी तो थी; किंतु कष्टदायक नहीं थी। प्रेसिडेंसी कॉलेज के वरांडों के परिसर में जैसे समय से पूर्व ही वसंत ऋतु आ गई थी। चारों ओर चहल-पहल थी। नरेन्द्र अपने मित्रों के साथ एक ओर बरामदे में खड़ा था। उसने चपकन और पजामा पहन रखा था और कलाई में पिता की दी हुई घड़ी बाँध रखी थी। अन्य लड़कों ने कोट पतलून पहन रखी थी।

‘‘तुम यही कपड़े पहनोगे ?’’ तरुण ने पूछा।

‘‘पश्चिमी वेशभूषा की तुलना में तो यही ठीक हैं।’’ नरेन्द्र ने उत्तर दिया।

‘‘ये लोग धोती-कुर्ता क्यों नहीं पहनने देते ? बंगाल की जलवायु...पल्टू कह रहा था।

‘‘अंग्रेज़ साहब बहादुर का सरकारी कॉलेज है। अधिकांश अध्यापक अंग्रेज या यूरोपीय हैं। उन्हें हम लोग धोती-कुर्ते में नंगे लगते हैं। वे उसे शिष्ट परिधान नहीं मानते। अब या तो टाई के साथ कोट और पतलून पहनो या फिर चपकन और पजामा।’’ नरेन्द्र हँसा, ‘‘कलाई पर घड़ी भी होना चाहिए।’’

‘‘यह घड़ी तो मेरी समझ में एकदम नहीं आती। कॉलेज में घंटी तो बजती ही है।’’ अमल बोला।

‘‘अरे बंगालियों को समय पालन की शिक्षा भी तो देनी है, वह बिना घड़ी के कैसे संभव है। नरेन्द्र ने ठहाका लगाया।

‘‘अरे नरेन्द्र ! तुमने विषय कौन-कौन से लिए हैं ?’’

‘‘मैंने। मैंने लिए हैं—बंग्ला साहित्य, अंग्रेजी साहित्य, गणित, तर्कशास्त्र और मनोविज्ञान। अर्थात् लॉजिक एंड साइकॉलोजी।’’

‘‘न साहित्य में अधिक अंक मिलते हैं, न साइकॉलोजी में। तुमने ऐसे विषय क्यों लिए ?’’ मणिक चकित था।

‘‘डरता हूँ कहीं अधिक अंक आ गए तो उन्हें कहाँ सँभालूँगा। मेरे पास तो कोई बड़ा बटुवा भी नहीं है।’’

‘‘मैं गंभीरता से पूछ रहा हूँ। प्रत्येक समझदार छात्र वही विषय लेता है, जिसमें सुविधा से अधिक अंक आएँ और प्रथम श्रेणी बने। और तुम....’’माणिक बोला।

‘‘समझदार छात्र अंकों के लिए पढ़ रहे हैं, और मैं....!’’

‘‘और तुम ?’’

मैं पढ़ रहा हूँ ज्ञान के लिए।’’

‘‘फिर परिहास।’’ माणिक ने बुरा-सा मुँह बनाया।

‘‘परिहास नहीं, सत्य बता रहा हूँ। परीक्षा में अधिक अंक आ गए और न मानसिक विकास हुआ, न ज्ञान बढ़ा, तो वे अधिक अंक तुम्हें लज्जित नहीं करेंगे ?’’

‘‘इसमें लज्जा की क्या बात है। संसार अंक देखता है, सर्टिफिकेट। ज्ञान देखता ही कौन है ? सारी नौकरियाँ अंक देखकर ही मिलती हैं।’’ अमल बोला।

‘‘पद के लिए अंक ठीक है। प्रतिभा के लिए नहीं। प्रतिभा को ज्ञान चाहिए।

अंक दूसरों को प्रभावित करने के लिए हैं, ज्ञान अपने परितोष के लिए है।’’ ‘‘और यदि इन विषयों की पढ़ाई से तुम्हें कोई अच्छी नौकरी न मिली ?’’ पल्टू ने पूछा।

‘‘अपना विकास नहीं करना, बस नौकरी करनी है ? नौकरी के लिए अच्छे अंक चाहिए, ज्ञान चाहे हो या न हो। अंकों के लिए हम केवल वे विषय पढ़ें, जिनमें अंक लुटाए जाते हैं। उनका भी उतना ही अध्ययन करें, जितना हमारे पाठ्यक्रम में है। संभव हो तो पाठ्यक्रम के भी वे ही अंश पढ़े, जो परीक्षा में पूछे जाने वाले हैं।’’ नरेन्द्र रुककर बोला, ‘‘यह शिक्षा नहीं है।’’

‘‘तो क्या है ?’’

‘‘व्यवसाय। व्यापार। धंधा।’’

‘‘तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आतीं।’’ माणिक बोला, ‘‘तुम सबकुछ उलझा देते हो। मैं तो एक सरल-सा जीवन जीना चाहता हूँ।’’

अज्ञान में प्रसन्न हो तो प्रसन्न रहो। कोल्हू के बैल के काम को व्यवसाय मानते हो तो मानो। किंतु न जीवन इतना संकीर्ण है और न शिक्षा, कक्षा तक ही सीमित है। मेरे मन में सहस्रों प्रश्न हैं। मुझे उन प्रश्नों के उत्तर चाहिए। अपनी शिक्षा से। अपने अध्यापकों से। नित्यप्रति प्रकाशित होने वाली पुस्तकों से।’’

‘‘कैसे प्रश्न ?’’

‘‘संसार किसने बनाया ? क्यों बनाया ?’’

‘‘इस विषय में मेरा ज्ञान अत्यंत स्पष्ट है। मुझे निश्चित रूप से ज्ञात है कि यह संसार मैंने नहीं बनाया।’’

‘‘और मैं दिन-रात यह सोच-सोच कर परेशान हूँ कि यह संसार कहीं मैंने ही तो नहीं बनाया। नरेन्द्र हँस पड़ा।

6

सुरेश बाबू के घर में अनेक लोग एकत्रित थे। नरेन्द्र भी एक कोने में बैठा था—अन्यमनस्क-सा। किसी के आने की प्रतीक्षा थी।

सुरेश बाबू ने ठाकुर के साथ प्रवेश किया। बहुत आदर से ठाकुर को ले जाकर नियत स्थान पर बिठाया। ठाकुर ने एक उड़ती हुई दृष्टि से सबको देखा।

सुरेश बाबू ने नरेन्द्र को संकेत किया। वह वाद्ययंत्रों के पास जा बैठा। हारमोनियम अपने हाथ में लेकर सुरेश बाबू की ओर देखा।

‘‘गाओ।’’ सुरेश बाबू ने कहा।

‘‘यह लड़का कौन है ?’’ ठाकुर ने पूछा।

‘‘यह नरेन्द्रनाथ दत्त हैं ठाकुर ! कॉलेज में पढ़ता है। इसके पिता, विश्वनाथ दत्त हाईकोर्ट में अटर्नी का काम करते हैं। बहुत भले आदमी हैं, मुहल्ले में तो उन्हें दाता विश्वनाथ कहा जाता है।’’

‘‘यह लड़का भजन ही गाएगा न ?’’

‘‘हाँ ठाकुर !’’

और नरेन्द्र ने गाना आरंभ किया :

‘‘रहना नहीं देस बिराना है।

यह संसार कागद की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है।

यह संसार काटों की बाड़ी, उलझ पुलझ मरि जाना है।

यह संसार झाड़ ओ झाँकर, आग लगे बरि जाना है।

कहत कबीर सुनो भाई साधो ! सतगुरु नाम ठिकाना है।

ठाकुर पूरी तन्मयता से नरेन्द्र का भजन सुन रहे थे। भजन समाप्त होने पर ठाकुर ने कमरे में बैठे लोगों पर दृष्टि डाली। उनकी दृष्टि रामचंद्र दत्त पर रुकी। संकेत से उन्हें अपने पास बुलाया।

‘‘इस लड़के को लेकर दक्षिणेश्वर आना। सुना सुरेश ! इसे लेकर दक्षिणेश्वर आना।’’

‘‘अच्छा ठाकुर। अवश्य लाऊँगा।’’

ठाकुर जाने के लिए उठ खड़े हुए। चलते हुए, नरेन्द्र के पास रुके, ‘‘तुम बहुत अच्छा गाते हो’’ उन्होंने नरेन्द्र के दोनों हाथ पकड़कर बारी-बारी, उन्हें उलट-पलट कर देखा, जैसे कुछ खोज रहे हों, ‘‘तुम बहुत अच्छे लड़के हो। किसी दिन दक्षिणेश्वर आना। माँ काली का दर्शन करना। आएगा न ?’’

नरेन्द्र को उनका यह सारा व्यवहार कुछ विचित्र सा लग रहा था। उसे तो सुरेश बाबू ने मात्र एक भजन गाने के लिए बुलाया था और वह पड़ोसी धर्म के नाते चला आया था। यह दक्षिणेश्वर जाने की बात बीच में कहाँ से आ गई ? वह चुपचाप उनकी ओर देखता रहा।

‘‘आएगा न ? अवश्य आना।’’ ठाकुर ने आग्रह किया।

नरेन्द्र ने अनायास ही स्वीकृति में अपना सिर हिला दिया। इस वृद्ध की बात को क्या टालना।
source........................http://pustak.org/home.php?bookid=334....

चलते तो अच्छा था....असगर वजाहत प्रस्तुत हैं... पुस्तक के कुछ अंश

Chalte To Achchha Tha



प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश















source----http://pustak.org/home.php?bookid=6078

                       चलते तो अच्छा था ईरान और आजरबाईजान के यात्रा-संस्मरण हैं। असग़र वजाहत ने केवल इन देशों की यात्रा ही नहीं की बल्कि उनके समाज, संस्कृति और इतिहास को समझने का भी प्रयास किया है। उन्हें इस यात्रा के दौरान विभिन्न प्रकार के रोचक अनुभव हुए हैं। उन्हें आजरबाईजान में एक प्राचीन हिन्दू अग्नि मिला। कोहेखाफ़ की परियों की तलाश में भी भटके और तबरेज़में एक ठग द्वारा ठगे भी गए।




यात्राओं का आनंद और स्वयं देखने तथा खोजने का सन्तोष चलते तो अच्छा था में जगह-जगह देखा जा सकता है। असग़र वजाहत ने ये यात्राएँ साधारण ढंग से एक आदमी के रूप में की हैं जिसके परिणाम-स्वरूप वे उन लोगों से मिल पाए हैं, जिनसे अन्यथा मिल पाना कठिन है।



भारत, ईरान तथा मध्य एशिया के बीच प्राचीन काल से लेकर मध्य युग तक बड़े प्रगाढ़ सम्बन्ध रहे हैं। इसके चलते आज भी ईरान और मध्य एशिया में भारत की बड़ी मोहक छवि बनी हुई है। लेकिन 19वीं और 20वीं शताब्दी में अपने पड़ोसी देशोंके साथ भारत का रिश्ता शिथिल पड़ गया था। आज के परिदृश्य में यह ज़रूरी है कि पड़ोस में उपलब्ध सम्भावनाओं पर ध्यान दिया जाए।



चलते तो अच्छा था यात्रा-संस्मरण के बहाने हमें कुछ गहरे सामाजिक और राजनीतिक सवालों पर सोचने के लिए भी मजबूर करता है।

मिट्टी का प्यालादोनों तरफ सूखे, निर्जीव, ग़ैर आबाद पहाड़ थे जिन पर लगी घास तक जल चुकी थी। सड़क इन्हीं पहाड़ों के बीच बल खाती गुज़र रही थी। रास्ता वही था जिससे मै इस्फ़हान से होता शीराज़ पहुँचा था और अब शीराज से साठ किलोमीटर दूर ‘पारसी-पोलास’ यानी ’तख़्ते जमशैद’ देखने जा रहा था. शीराज़ मे पता लगा था कि ‘तख़्ते जमशैद’ तक ‘सवारी’ टैक्सियाँ चलती हैं। ईरान में ‘सवारी’ का मतलब वे टैक्सियाँ होती हैं जिन पर मुसाफिर अपना-अपना किराया देकर सफर करते हैं। ये सस्ती होती हैं। ‘तख़्ते जमशैद’ तक जाने के लिए शीराज के बस अड्डे पर ‘सवारी’ की तलाश में आया था लेकिन टैक्सीवाले ने मर्जी के ख़िलाफ़ मुझे एक टैक्सी में ठूँसा और टैक्सी चल दी। मेरे खयाल से मुझे पाँच हज़ार रियाल देने थे और इस टैक्सी में मेरे अलावा चार और लोगों को भी होना चाहिए था लेकिन मैं अकेला था और ज़ाहिर था कि दूसरे चार लोगों का किराया मुझसे ही वसूल किया जाना था। वीरान पहाड़ों पर करीब सवा घंटे चलने के बाद टैक्सी ड्राइवर ने ‘तख़्ते जमशैद’ की पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर दी। सामने दूर तक फैले खँडहरों में ऊँचे-ऊँचे खम्भे ही नुमाया थे।



बताया जाता है कि ईसा से सात सौ साल पहले ईरान के एक जनसमूह ने जो अपने को आर्य कहता था, एक बहुत बड़ा साम्राज्य बनाया था। यह पूर्व में सिंध नदी से लेकर ईरान की खाड़ी तक फैला हुआ था। इतिहास में इस साम्राज्य को ‘हख़ामनश’ के नाम से याद किया जाता है। अंग्रेजी में इसे ‘अकामीडियन’ साम्राज्य कहते हैं। बड़े आश्चर्य की बात यह है कि यह अपने समय का ही नहीं बल्कि हमारे समय में भी बड़े महत्त्व का साम्राज्य माना जाएगा।



इस साम्राज्य के एक महान शासक दारुलस प्रथम (549 जन्म-485 मृत्यु ई. पू.) ने विश्व में पहला मानव अधिकार दस्तावेज जारी किया था जो आज भी इतना महत्त्वपूर्ण है कि 1971 में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने उसका अनुवाद विश्व की लगभग सभी भाषाओं में कराया और बाँटा था। यह दस्तावेज मिट्टी के बेलन जैसे आकार के पात्र पर खोदा गया था और उसे पकाया गया था ताकि सुरक्षित रहे। दारुस ने बाबुल की विजय के बाद इसे जारी किया था। कहा जाता है कि यह मानव अधिकार सुरक्षा दस्तावेदज़ फ्रांस की क्रांति (1789-1799) में जारी किए गए मानव अधिकार मैनेफैस्टों से भी ज्यादा प्रगतिशील है। घोषणापत्र के कुछ अंश इस प्रकार हैं, ‘‘....अब मैं अहुर मज़्द (Ahura Mazda) (अग्निपूजकों के सबसे बड़े देवता) की मदद से ईरान, बाबुल और चारों दिशाओं में फैले राज्यों का मुकुट अपने सिर पर रखते हुए यह घोषणा करता हूँ कि मैं अपने साम्राज्य के सभी धर्मों, परम्पराओं और आचार-व्यवहारों का आदर करूँगा और जब तक मैं जीवित हूँ तब तक मेरे गवर्नर और उनके मातहत अधिकारी भी ऐसा करते रहेंगे। मैं अपनी बादशाहत किसी देश (राज्य) पर लादूंगा (आरोपित) नहीं। इसे स्वीकार करने के लिए सभी स्वतन्त्र हैं और अगर कोई इसे अस्वीकार करता है तो मैं उससे कभी युद्ध नहीं करूँगा। जब तक मैं ईरान, बाबुल और चारों दिशाओं में फैले राज्यों का सम्राट हूँ तब तक मैं किसी को किसी का शोषण नहीं करने दूँगा और अगर यह होता है तो मैं निश्चित शोषित का पक्ष लूँगा और अपराधी को दण्डित करूँगा। जब तक मैं सम्राट हूँ तब तक बिना पैसा लिए-दिए या उचित भुगतान किए बिना कोई किसी की चल-अचल सम्पत्ति पर अधिकार न कर सकेगा।



जब तक मैं जालित हूँ तब तक बेगार और बलात काम लिए जाने का विरोध करता रहूँगा। आज मैं यह घोषणा करता हूँ कि हर आदमी अपना धर्म चुनने के लिए आजाद है। लोग कहीं भी रहने के लिए स्वतन्त्र हैं और वे कोई भी काम कर सकतें हैं जब तक कि उससे दूसरों के अधिकार खंडित न होते हों....किसी को उसके रिश्तेदारों के लिए सज़ा नहीं दी जाएगी। मैं गुलामी (दासप्रथा) को प्रतिबन्धित करता हूँ और मेरे साम्राज्य के गवर्नरों तथा उनके अधिकारियों की ज़िम्मेदारी है आदमी औरतों को गुलाम की तरह बेचने-खरीदने को अपने क्षेत्र में समाप्त करें...गुलामी को पूरे संसार से समाप्त हो जाना चाहिए...मैं अहुर मज़्द से कामना करता हूँ कि साम्राज्य के प्रति मुझे अपने आश्वासनों को पूरा करने में सफलता दे।’’

ईसा से पाँच सौ साल पहले दारुस महान ने अपने राज्य का आधार फेडरल सिस्टम ऑफ गवर्नेन्स (गणतान्त्रिक राज्य व्यवस्था) बनाया था। राज्यों को अधिकार दिए गए थे और केन्द्र की नीतियाँ उदार तथा जनहित में थीं। साम्राज्य की आय का सबसे बड़ा स्रोत व्पापार कर था जिसे बढ़ाने के साथ-साथ व्यापारियों की सुरक्षा पर ध्यान देता था। दारुस ने अपने साम्राज्य के दो कोने को जोड़नेवाले एक ढाई हज़ार मील लम्बे राजमार्ग का निर्माण भी कराया था। इतिहासकार कहते हैं कि पूरे साम्राज्य में डाक की व्यवस्था इतनी उत्तम थी कि एक कोने से दूसरे कोने तक डाक पन्द्रह दिनों में पहुँच जाती थी।

शताब्दियों तक दारुस महान की राजधानी ‘तख़्ते जमशैद’ पत्थरों, मिट्टी, धील और उपेक्षा के पहाड़ों के नीचे दबी पड़ी रही यह इलाक़ा ‘कोहे रहमत’ के नाम से जाना जाता है। रहमत का मतलब ईश्वरीय कृपा है। 1931-1934 के बीच यहाँ अमेरिकी विश्वविद्यालयों के पुरातत्व विभागों ने खुदाई का एक व्यापक अभियान चलाया था और दारुस की राजधानी के अवशेष सामने आए थे।



ईरानी सरकार जो प्रायः पर्यटन के प्रति उदासीन है ‘तख़्ते जमशैद’ की उपेक्षा नहीं कर सकी है। यहाँ पर्यटन विभाग के कार्यालय और पर्यटकों के लिए अन्य सुविधाएँ मौजूद हैं। यह अब ईरान का ही नहीं बल्कि विश्व का एक महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल बन गया है।



‘तख़्ते जमशैद’ आने से पहले कहीं पढ़ा था और लोगों ने बताया भी कि खंडहरों को देखकर यह कल्पना करनी चाहिए कि यह इमारत कितनी विशाल रही होगी। विस्तार का अन्दाजा तो दूर से हो जाता है। कोहे रहमत के नीचे ऊँचे खम्भों तक लम्बा सिलसिला और सामने के पहाड़ों को काटकर तराशी गई मूर्तियाँ तथा गुफाएँ नज़र आने लगते हैं।



मुख्य इमारत तक जाने के लिए सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आया तो ऊँचे-ऊँचे पत्थर के खम्भे नज़र आए। यह गारुस का दरबार हॉल था। इन खम्भों पर इमारत की कल्पना करते हुए मैंने इसकी तुलना लाल किले के दीवाने आम से की तो दीवाने आम बच्चों का खेल लगा यहाँ के दीवाने आम के खम्भों की ऊँचाई लाल किलेवाले खम्भों से कम से कम तीन गुनी है। लम्बाई और चौड़ाई में भी दारुस का दीवाने आम शाहजहाँ के दीवाने आम से छह-सात गुना बड़ा होगा। आश्चर्य यह होता है कि इतने बड़े दीवाने आम में हज़ारों लोगों तक सम्राट या अन्य अधिकारियों की आवाज़ें कैसे पहुँचती होंगी और व्यवस्था कैसे बनाई जाती होगी।



दारुस ने ‘पारसी पोलिस’ यानी ‘तख़्ते जमशैद’ का निर्माण 518 ई. पू के आसपास शुरू किया था और सौ साल बाद यह निर्माण कार्य पूरा हुआ था। दारुस ने ‘तख़्ते जमशैद’ की परिकल्पना केवल एक महल या किले के रूप में नहीं की थी। वह ऐसे-ऐसे विशाल स्थान का निर्माण करना चाहता था जिसका कोई दूसरी मिसाल न हो। वह चाहता था कि साम्राज्य की शक्ति, वैभव, सम्पन्नता, बुद्धिमत्ता और सौन्दर्यप्रियता को दर्शानेवाली इमारतों का एक समूह बनाया जाए तो अद्वितीय हो। दारुस के पुत्र जेरजेस (518-465 ई.पू.) की शपथ—‘‘मैं उस काम को पूरा करूँगा जो मेरे पिता ने शुरू किया था’’ दीवार पर अंकित है।



ऊपर तेज सूरज चमक रहा था जिसकी रोशनी में कई किलोमीटर फैले खंडहर अतीत की रहस्यमयी कहानियाँ सुना रहे थे। पर्यटक यहाँ काफी थे लेकिन क्षेत्र इतना बड़ा था कि बस खेत में कुछ दाने की तरह छिटके ही दिखाई पड़ रहे थे कि उन पर नज़र ज़माना भी मुश्किल था। दीवने आम के पीछे दूसरी इमारतो के खंडहर थे जो दूर फैले चले गए थे और ‘कोहे रहमत’ में बनी गुफाओं से मिल गए थे। यह देखने के लिए एक दिन काफी था। दरवाज़ों पर पत्थर से काटी गई देवताओं की मूर्तियाँ, कहीं सिपाहियों की आकृतियाँ और पहाड़ों पर युद्ध के दृश्य साम्राज्य और सम्राटों की जिन्दगी के जीवित दस्तावेज लगते थे।



‘तख़्ते जमशैद’ से कुछ किलोमीटर दूर नक्शे रुस्तम’ है। रुस्तम भी एक पौराणिक चरित्र है जिसने फिरदौसी के ‘शाहनामें में अमर कर दिया है। उसने कल्पना-कला और मार्मिकता की ऊँचाइयाँ को छू लिया है। बुनियादी तौर पर योद्धा होने के साथ-साथ वह प्रेमी भी है, दाता भी है, संवेदनशील पिता भी है और एक त्रासदी का नायक भी है। ‘नक्शे रुस्तम’ पहाड़ पर एक ऐसा जगह है जो समतल है। कहा जाता है कि रुस्तम यहाँ नाचा था इस कारण पहाड़ का यह हिस्सा समतल हो गया। ‘नक्शे रुस्तम’ पहाड़ी को सम्राटों की गैलरी भी कहा जाए तो गलत न होगा। यहाँ ‘हख़ामनश’ साम्राज्य ही नहीं बल्कि पूर्व और परवर्ती साम्राज्य जैसे सासानी साम्राज्य के सम्राटों ने भी अपनी विजयों से संबंधित चित्र पत्थर पर अंकित कराए हैं। इस स्थान पर सम्राटों के मक़बरे बनाने तथा उन पर इतिहास अंकित करने की भी परम्परा रही है। यहीं पत्थर पर तराश कर बनाए गए चित्रों में सामानी सम्राट शापुर प्रथम (241-272 ई.पू.) का वह प्रसिद्ध चित्र भी है जिसमें ईरानियों से पराजित रोम का सम्राट वैरियन घुटने टेके शापुर प्रथम के सामने बैठा है और शापुर घोड़े पर सवार है। कुछ इतिहासकार तो कहते हैं कि ईरान सम्राट शापुर प्रथम ने पराजित रोम के सम्राट को अपने दरबार में घुटने के बल टेकर (260 ई.पू.) आने के लिए बाध्य किया था और इस घटना का आतंक शताब्दियों क़ायम रहा था।



कोई गाइट किसी पर्यटक ग्रुप को एक दीवार दिखाकर बता रहा था कि कभी यह दीवार इतनी चमकीली हुआ करती थी कि लोग इसमें अपनी शकल देख लिया करते थे। इस तरह की न जाने कितनी गाथाएँ यहाँ से जुड़ी हैं। कहते हैं कि किसी पौराणिक सम्राट जमशैद की भी यही राजधानी होती थी उसके पास एक दैवी प्याला था जो ‘जामे जमशैद’ के नाम से मशहूर है। जमशैद का जिक्र फिरदैसी ने ‘शाहनामा’ में भी किया है। प्याले में वह पूरे संसार की छवियाँ तथा भविष्य और भूत को देख सकता था।....................................................................................................................

रविवार, 3 जून 2012

आर्थिक एवं विदेश नीति ( सरदार पटेल)

Aarthik Evam Videsh Neeti

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

source...http://pustak.org/home.php?bookid=3303








आर्थिक एवं विदेशी नीति से संबंधित सरदार पटेल का सोच और दृष्टिकोण अत्यंत व्यावहारिक थे। अधिक उत्पादन एवं समान वितरण उनकी आर्थिक नीति के मूल तत्त्व थे। आम जनता को उपयोगी वस्तुओं की आपूर्ती हेतु भरपूर उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने सरकार पर अपना प्रभाव दिखाते हुए श्रम और पूँजी निर्माण पर जोर दिया। मंत्रिमंडल की बैठकों में समय-समय पर उन्होंने आर्थिक एवं विदेशी नीति से संबंधित अपने विचार और दृष्टिकोण प्रस्तुत किए।


विदेशी नीति पर भी उनका दृष्टिकोण काफी स्पष्ट व व्यावहारिक रहा है। राष्ट्रमण्डल की सदस्यता प्राप्त करने और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा हेतु उन्होंने जोरदार प्रयास किए थे। उनके सुझाव के आधार पर एक ऐसी नीति तैयार की गई, जिससे भारत को एक सार्वभौम एवं स्वतंत्र गणराज्य के रुप में राष्ट्रमण्डल का सदस्य बने रहने में मदद मिली। सरदार पटेल को चीन की ओर से किए गए मित्रता-प्रदर्शन तथा ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ में विश्वास नहीं था। उन्होंने चीन की तिब्बत नीति पर एक लंबा-चौड़ा नोट तैयार किया था, जिसमें इसके परिणामों के प्रति देश को चेताया भी था।

प्रस्तुत सरदार पटेल के व्यावहारिक एवं विशद चिंतन की यात्रा करवाती है।

प्रस्तावनाबहुत दिनों से यह आवश्यकता अनुभव हो रही थी कि कुछ ऐसे ग्रंथ सुलभ होने चाहिए, जिनमें सरदार पटेल से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई हो, जो उनके जीवन-काल में विवाद का विषय बने रहे तथा सन् 1950 में उनके निधन के पश्चात् भी विवादों में घिरे रहे। उदाहरण के लिए, यह अनुभव किया गया कि यदि सरदार पटेल को कश्मीर समस्या सुलझाने की अनुमति दी जाती, जैसा कि उन्होंने स्वयं भी अनुभव किया था, तो हैदराबाद की तरह यह समस्या भी सोद्देश्यपूर्ण ढंग से सुलझ जाती। एक बार सरदार पटेल ने स्वयं श्री एच.वी. कामत को बताया था कि ‘‘यदि जवाहरलाल नेहरू और गोपालस्वामी आयंगर कश्मीर मुद्दे पर हस्तक्षेप न करते और उसे गृहमंत्रालय से अलग न करते तो मैं हैदराबाद की तरह ही इस मुद्दे को भी आसानी से देश-हित में सुलझा लेता।’’

हैदराबाद के मामले में भी जवाहरलालनेहरू सैनिक काररवाई के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने सरदार पटेल को यह परामर्श दिया-‘‘इस प्रकार इस मसले को सुलझाने में पूरा खतरा और अनिश्चितता है।’’ वे चाहते थे कि हैदराबाद में की जानेवाली सैनिक कार्रवाई को स्थगित कर दिया जाए। इससे राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। प्रख्यात कांग्रेसी नेता प्रो.एन.जी. रंगा की भी राय थी कि विलंब से की गई कार्रवाई के लिए नेहरू, मौलाना और माउंटबेटन जिम्मेदार हैं। रंगा लिखते हैं कि जवाहरलाल नेहरू की सलाहें मान ली होतीं तो हैदराबाद मामला उलझ जाता; कमोबेश वैसी ही सलाहें मौलाना आजाद एवं लॉर्ड माउंटबेटन की भी थीं। सरदार पटेल हैदराबाद के भारत में शीघ्र विलय के पक्ष में थे, लेकिन जवाहरलाल नेहरू इससे सहमत नहीं थे। लॉर्ड माउंटबेटन की कूटनीति भी ऐसी थी कि सरदार पटेल के विचार और प्रयासों को साकार रूप देने में विलंब हो गया।



सरदार पटेल के राजनीतिक विरोधियों ने उन्हें मुसलिम वर्ग के विरोधी के रूप में वर्णित किया; लेकिन वास्तव में सरदार पटेल हिंदू-मुसलिम एकता के लिए संघर्षरत रहे। इस धारणा की पुष्टि उनके विचारों एवं कार्यों से होती है। यहाँ तक कि गाँधीजी ने भी स्पष्ट किया था कि ‘‘सरदार पटेल को मुसलिम-विरोधी बताना सत्य को झुठलाना है। यह बहुत बड़ी विडंबना है।’’ वस्तुतः स्वतंत्रता-प्राप्ति के तत्काल बाद अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में दिए गए उनके व्याख्यान में हिंदू-मुसलिम प्रश्न पर उनके विचारों की पुष्टि होती है।

इसी प्रकार, निहित स्वार्थ के वशीभूत होकर लोगों ने नेहरू और पटेल के बीच विवाद को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया तथा जान-बूझकर पटेल व नेहरू के बीच परस्पर मान-सम्मान और स्नेह की उपेक्षा की। इन दोनों दिग्गज नेताओं के बीच एक-दूसरे के आदर और स्नेह के भाव उन पत्रों से झलकते हैं, जो उन्होंने गाँधीजी की हत्या के बाद एक-दूसरे को लिखे थे। निस्संदेह, सरदार पटेल की कांग्रेस संगठन पर मजबूत पकड़ थी और नेहरूजी को वे आसानी से (वोटों से) पराजित कर सकते थे। लेकिन वे गाँधीजी की इच्छा का सम्मान रखते हुए दूसरे नंबर पर रहकर संतुष्ट थे। उन्होंने राष्ट्र के कल्याण को सर्वोपरि स्थान दिया।

विदेश नीति के संबंध में सरदार पटेल के विचारों के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है, जो उन्होंने मंत्रिमण्डल की बैठकों में स्पष्ट रूप से व्यक्त किए थे तथा पं. नेहरू पर लगातार दबाव डाला कि राष्ट्रीय हित में ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का सदस्य बनने से भारत को मदद मिलेगी। जबकि नेहरू पूर्ण स्वराज्य पर अड़े रहे, जिसका अर्थ था—राष्ट्रमंडल से किसी भी प्रकार का नाता न जोड़ना। किंतु फिर भी, सरदार पटेल के व्यावहारिक एवं दृढ़ विचार के कारण नेहरू राष्ट्रमण्डल का सदस्य बनने के लिए प्रेरित हुए। तदनुसार समझौता किया गया, जिसके अंतर्गत भारत गणतंत्रात्मक सरकार अपनाने के बाद राष्ट्रमंडल का सदस्य रहा।



सरदार पटेल चीन के साथ मैत्री तथा ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के विचार से सहमत नहीं थे। इस विचार के कारण गुमराह होकर नेहरू जी यह मानने लगे थे कि यदि भारत तिब्बत मुद्दे पर पीछे हट जाता तो चीन और भारत के बीच स्थायी मैत्री स्थापित हो जाएगी। विदेश मंत्रालय के तत्कालीन महासचिव श्री गिरिजाशंकर वाजपेयी भी सरदार पटेल के विचारों से सहमत थे। उन्होंने चीन की तिब्बत नीति पर एक लंबा नोट लिखकर उसके दुष्परिणामों से नेहरू को आगाह किया था। सरदार पटेल की आशंका थी कि भारत की मार्क्सवादी पार्टी की देश से बाहर साम्यवादियों तक पहुँच होगी, खासतौर से चीन तक। अन्य साम्यवादी देशों से उन्हें हथियाने एवं साहित्य आदि की आपूर्ति भी अवश्य होती होगी। वे चाहते थे कि सरकार द्वारा भारत के साम्यवादी दल तथा चीन के बारे में स्पष्ट नीति बनाई जाए।

इसी प्रकार, भारत की आर्थिक नीति के संबंध में सरदार पटेल के स्पष्ट विचार थे। मंत्रिमंडल की बैठकों में उन्होंने नेहरूजी के समक्ष अपने विचार बार-बार रखे; लेकिन किसी-न-किसी कारणवश उनके विचारों पर अमल नहीं किया गया। उदाहरण के लिए, उनका विचार था कि समुचित योजना तैयार करके उदारीकरण नीति अपनाई जानी चाहिए। आज सोवियत संघ पर आधारित नेहरूवादी आर्थिक नीतियों के स्थान पर जोर-शोर से उदारीकरण की नीति ही अपनाई जा रही है।

खेद की बात है कि सरदार पटेल को सही रूप से नहीं समझा गया। उनके ऐसे राजनीतिक विरोधियों के हम शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने निरंतर उनके विरुद्ध अभियान चलाया तथा तथ्यों को तोड़-मरोड़ पेश किया, जिससे पटेल को अप्रत्यक्ष रूप से सम्मान मिला। समाजवादी विचारधारा के लोग नेहरू को अपना अग्रणी नेता मानते थे। उन्होंने पटेल की छवि पूँजीवाद के समर्थक के रूप में प्रस्तुत की। लेकिन सौभाग्यवश, सबसे पहले समाजवादियों ने ही यह महसूस किया था कि उन्होंने पटेल के बारे में गलत निर्णय लिया है।

प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे महत्त्वपूर्ण तथा संवेदनशील मुद्दों पर विचार करने का प्रयास किया गया है, जो आज भी विवादग्रस्त हैं। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने मई 1959 में लिखा था-‘‘सरदार पटेल की नेतृत्व शक्ति तथा सुदृढ़ प्रशासन के कारण ही आज भारत की चर्चा हो रही है तथा विचार किया जा रहा है।’’ आगे राजेन्द्र प्रसाद ने यह जोड़ा--‘‘अभी तक हम इस महान् व्यक्ति की उपेक्षा करते रहे हैं।’’ उथल-पुथल की घड़ियों में भारत में होनेवाली गतिविधियों पर उनकी मजबूत पकड़ थी। यह ‘पकड़’ उनमें कैसे आई ? यह प्रश्न पटेल की गाथा का एक हिस्सा है।



भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के चुनाव के पच्चीस वर्ष बाद चक्रवर्ती राज-गोपालचारी ने लिखा-‘‘निस्संदेह बेहतर होता, यदि नेहरू को विदेश मंत्री तथा सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता। यदि पटेल कुछ दिन और जीवित रहते तो वे प्रधानमंत्री के पद पर अवश्य पहुँचते, जिसके लिए संभवतः वे योग्य पात्र थे। तब भारत में कश्मीर, तिब्बत, चीन और अमान्य विवादों की कोई समस्या नहीं रहती।’’

लेकिन निराशाजनक स्थिति यह रही कि उनके निधन के बाद सत्तासीन राजनीतिज्ञों ने उनकी उपेक्षा की और उन्हें वह सम्मान नहीं दिया गया, जो एक राष्ट्र-निर्माता को दिया जाना चाहिए था। प्रस्तुत पुस्तक अपने विषय को लेकर सरदार पटेल के लौह व्यक्तित्व, उनके दृढ़ विचारों और राष्ट्र-निर्माण में उनके अभूतपूर्व योगदानों का लेखा-जोखा है।

और अन्ततः डॉ. प्रभा चोपड़ा ने विषय के संकलन और संपादन में मेरी बहुत सहायता की। मैं श्री एम.पी. चावला, लेखाधिकारी श्री अरुण कुमार यादव तथा श्री रवींद्र कुमार का आभारी हूँ, जिन्होंने तत्परतापूर्वक पांडुलिपि तैयार की।

भूमिकासरदार पटेल के आलोचकों ने अकसर उनकी इस आधार पर आलोचना की है कि आर्थिक नीति पर उनके कोई निश्चित विचार नहीं हैं। उन्होंने देश की योजना और आर्थिक नीति पर गंभीर रूप से विचार-मनन किया था। वस्तुतः उन्होंने मंत्रिमंडल में अपने सहयोगियों को देश में फैली आर्थिक रुग्णता से संबंधित एक विस्तृत पत्र भी वितरित करवाया था और उसमें विशेष तौर पर यह उल्लेख किया था कि सरकार के द्वारा समय-समय पर निर्धारित नीतियों को प्रभावी ढंग से कार्यान्वित करने की आवश्यकता है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात का उल्लेख किया था कि इसमें तीन पक्ष शामिल हैं—सरदार, उद्योगपति और मजदूर। सरदार दृढ़ता से इस बात को मानते थे कि उद्योग और मजदूरों को सहर्ष सहयोग देना चाहिए। वह नियंत्रण के उन्मूलन के दृढ़ समर्थक थे और उन्होंने खाद्य एवं वस्त्र के ऊपर से नियंत्रण हटाने तथा औद्योगिक राहत देने की योजना का प्रतिपादन करने के लिए जोरदार ढंग से सरकार का समर्थन किया था। उन्होंने इस बात का असंतोष प्रकट किया कि औद्योगिक उद्यम गतिशील नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन पर असर पड़ता है। वह चाहते थे कि जनता में दोबारा विश्वास उत्पन्न किया जाए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि एक बार नीतियाँ बनने के बाद उन्हें कार्यान्वित किया जाना चाहिए और सरकार को इससे पीछे नहीं हटना चाहिए।

सरदार पटेल योजना की रूपरेखा के विरुद्ध थे, जो देश की क्षमता और संसाधनों से परे चली गई थी। उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि ‘हमें उपलब्ध संसाधनों के अनुसार ही अपना काम करना चाहिए।’ वह देश की अर्थव्यवस्था को गाँवों को आधार बनाकर संघटित करना चाहते थे। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि एक बार अगर हम गाँववासियों को सुविधाएँ प्रदान कर देंगे, जैसे—जहाँ भी संभव हो वहाँ लघुमान सिंचाई योजनाएँ चलाना या अनुपयोगी तालाबों और कुओं को देबारा प्रयोग में लाना, मलेरिया और अन्य बीमारियों से गाँववालों की रक्षा करना, तो वे अपनी स्वयं देखभाल कर पाएँगे और फिर उनके अनाज का उत्पादन हमारी उम्मीदों से कहीं ज्यादा बढ़ जाएगा। सरदार पटेल लोगों में ऐसी उम्मीदें जगाने के विरुद्ध थे, जो कभी पूरी ही न हों। वह जरूरत पड़ने पर ‘विदेशी’ ऋण लेने के विरुद्ध नहीं थे, जिसको उत्पादन संबंधी योजनाओं और देश के औद्योगिकीकरण पर खर्च किया जा सके।



एन.जी. रंगा के अनुसार

‘सन् 1936 में राजाजी और सरदार को पहले से ही यह पूर्वाभास हो गया था कि जवाहरलालजी का समाजवाद भारत की सामाजिक अर्थव्यवस्था के लिए समस्या उत्पन्न करेगा, इसीलिए उन्होंने कांग्रेस की अध्यक्षता की अनुकूल—अवस्थिति से किए समाजवाद के उनके अभियान का सख्ती से विरोध किया। इसके विरोधस्वरूप उनके और उनके सहयोगियों द्वारा लिखे गए उस ऐतिहासिक पत्र की वजह से ही जवाहरलाल को भारतीय किसानों की अर्थव्यवस्था और उसके लोगों के उद्यम के विरोध में अपने अभियान को आरंभ करने से पहले वर्ष 1951 तक का इंतजार करना पड़ा था।’

रंगा आगे कहते हैं—

‘फिर जब हममें से कई लोग कांग्रेस सरकार पर योजनात्मक ढंग से हमारी अर्थव्यवस्था को विकसित करने का दवाब डाल रहे थे, सरदार ने इससे होनेवाले दुष्परिणामों पर शंका व्यक्त की थी। जब मैंने स्वयं को अग्रेरियन सुधार कमेटी में अल्पसंख्यक वर्ग में पाया तो उन्होंने मुझे बताया कि इसी वजह से उन्हें भय लगता है कि स्व-रोजगार अर्थव्यवस्था के लिए बनी तथाकथित योजना हमारे प्रजातांत्रिक खेतिहरों और लोगों की अर्थव्यवस्था की नींव खतरे में डाल सकती है। उन्हें समाजवादी योजनाओं के प्रति झिझक महसूस हुई। दुर्भाग्यवश उस समय तक उनका दिल कमजोर हो चुका था और वह प्रभावी रूप से प्रयत्न करने में असमर्थ थे। इसलिए जवाहरलाल और योजना आयोग की बढ़ती ताकत के सामने हम खेतिहरों और कलाकारों की स्व-रोजगार अर्थव्यवस्था का विरोध करने में स्वयं को असहाय महसूस कर रहे थे।’

मुख्यमंत्रियों और प्रांतीय कांग्रेस समिति के प्रमुखों के अधिवेशन में सरदार पटेल ने योजना की अपनी अवधारणा को विस्तृत रूप से समझाया। उन्होंने कहा, ‘इस देश में योजना औद्योगिक देशों की योजनाओं से भिन्न होगी, जो या तो विस्तार में छोटी हैं या अत्यधिक विकसित हैं।’ उन्होंने यह कहते हुए गांधीजी का उल्लेख किया--‘मशीन हमारे देश में समस्या को नहीं सुलझा सकती। करोड़ों बेकार हाथों को मशीनों से काम नहीं मिल सकता है, क्योंकि मशीनें तो स्वयं मनुष्य को विस्थापित करती हैं।’



एक यथार्थवादी के रूप में सरदार पटेल ने इस बात पर जोर दिया कि भारत मुख्य रूप से कृषि-प्रधान देश है और इतनी अधिक जनसंख्यावाले देश में बेकारी सबसे बड़ी बीमारी है। आज राष्ट्र के सामने यही सबसे बड़ी समस्या है कि इस बीमारी को कैसे समाप्त किया जाए। उन्होंने इस संदर्भ में गाँधीजी की योजना का जिक्र किया जो अपने आप में एक आदर्श थी—करोड़ों बेकार लोगों को कातने, बुनने और अन्य कुटीर उद्योगों में रोजगार दिया जाए। पर सरदार पटेल को लगता था कि यह व्यवहारिक नहीं है, क्योंकि इससे सेना के बढ़ते व्यय की पूर्ति करने के लिए, जो कुल आय के आधे से भी अधिक है, पर्याप्त संसाधन उत्पन्न नहीं कर सकेंगे। इसलिए एक व्यवहारिक व्यक्ति के रूप में सरदार पटेल ने देश के तीव्र औद्योगिकीकरण का समर्थन किया। इसके अभाव में देश को गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है।

नियंत्रण विषय पर किए गए एक प्रश्न का हवाला देते हुए उन्होंने कहा--‘‘बहुत सावधानीक पूर्वक सोचने के बाद ही खाद्य और कपड़े पर नियंत्रण लगाने के निर्णय तक पहुँचा गया है। यह तभी महसूस किया गया कि मूल्य बढ़ना अनिवार्य है, पर इसके साथ ही यह भी महसूस किया गया कि व्यापार और उद्योगों के सहयोग से एक संतुलन भी कायम हो जाएगा।’ सरदार पटेल को इस बात की खुशी थी कि लोगों ने नियंत्रण हटाने के फैसले का स्वागत किया है, जिसकी वजह से किसी तरह का खतरा उत्पन्न होने की स्थिति तक मूल्य में वृद्धि नहीं हुई है। जहाँ तक कपड़ों की तस्करी का सवाल है, तो सरदार पटेल ने कहा कि उद्योगों और व्यापार के कालाबाजारियों, भ्रष्टाचारी व अयोग्य कर्मचारी और तस्करी को जाँचने या रोकनेवाले किसी भी तंत्र में कमी का होना इसके लिए सामान्य रूप से दोषी है।



सरदार पटेल ने एक अन्य सभा में कहा कि ‘उन पर पूँजीवादियों का दोस्त होने का आरोप लगाया गया है। मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूँ कि मैंने गांधीजी से यह सीखा है कि निजी संपत्ति नहीं होनी चाहिए, और मेरे विचार से इससे बेहतर और कोई समाजवाद हो ही नहीं सकता।’ उन्होंने एक अन्य सीख का भी उल्लेख किया, जिसे उन्होंने गांधीजी से ही सीखा था कि ‘सबसे पहले मित्रता करो, चाहे वह गरीब हो या अमीर, महान हो या विनम्र। इसलिए मैं मजदूरों, उद्योगपतियों, राजकुमारों, किसानों और जमींदारों के साथ समान भाव से मित्रता रख सकता हूँ और उन्हें प्यार से सही काम करने के लिए राजी कर सकता हूँ।’ सरदार पटेल राष्ट्रीयकरण के खिलाफ थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि इससे देश का विनाश होने के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता है। राष्ट्रीयकरण होने से पहले उद्योग को स्थापित करना जरूरी है। इस संदर्भ में उन्होंने इंग्लैण्ड के उदाहरण का उल्लेख किया, जहाँ समाजवाद इंग्लैण्ड के सही ढंग से औद्योगिकीकरण, के रास्ते पर चलने से आया था। सरदार पटेल ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि ‘सही मायनों में समाजवाद कुटीर उद्योगों के विकास में निहित है, जो करोड़ों लोगों को रोजगार प्रदान कर सकता है।’ वह इस बात पर अडिग थे कि चरखे को ज्यादा सर्वव्यापी बनाकर हाथ से बने धागे को कातने के लिए अधिक करघे स्थापित कर हाथ से बनी खादी के द्वारा स्वदेशी की अवधारणा को विकसित किया जा सकता है। उन्होंने व्यापारियों से विदेशी वस्त्रों का आयात न करने का अनुरोध किया और औरतों को विदेशी कपड़े न पहनने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा, ‘‘विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करना सिद्धांत की बात है, जिसके लिए कांग्रेस कभी भी समझौता नहीं करेगी।’

सरदार पटेल उद्योग और मजदूर के बीच एक संधि कराना चाहते थे, क्योंकि उस समय उत्पन्न होनेवाले मतभेद भारत के औद्योगिक भविष्य के लिए भयंकर आघात के रूप में सामने आ सकते थे। उन्होंने उद्योग और मजदूर के बीच व्याप्त समस्या को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की नीति को अपनाने का जोरदार समर्थन किया, जैसा कि वह पहले अहमदाबाद में भी कर चुके थे। औद्योगिकीकरण के क्षेत्र में कहीं ज्यादा आगे थे, पर वे राष्ट्रीयकरण की ओर बहुत ही धीमी गति से बढ़ रहे थे। इससे औद्योगिक शांति और उत्पादन की अच्छी स्थिति रहने की संभावना थी।



सरदार पटेल हड़ताल के बिलकुल खिलाफ थे। वे बार-बार मजदूरों को मध्यस्थता के द्वारा अपनी समस्याएँ सुलझाने की सलाह देते थे। उन्होंने उन संयोजकों की आलोचना की जो अपने नेतृत्व को महत्त्व देने के लिए ऐसी हड़तालों को प्रश्रय देते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने अमेरिका का उदाहरण दिया, विशेषकर ब्रिटेन का उल्लेख किया, जहाँ समाजवादी सरकार थी, पर वह मजदूरों पर नियंत्रण करने के लिए हिंसा का सहारा नहीं ले पा रही थी।

सरदार पटेल ने राष्ट्रीयकरण के संदर्भ में उद्योगपतियों की आशंकाओं को दूर करने की कोशिश की। उन्होंने यह बात स्पष्ट कर दी कि हालाँकि इस मुद्दे पर भारत सरकार की नीति अभी बननी है, फिर भी उन्हें आश्वस्त हो जाना चाहिए और यह समझना चाहिए कि उद्योग को अभी स्थापित होना है, इसलिए राष्ट्रीयकरण का सवाल ही पैदा नहीं होता। उन्होंने इंग्लैड का उल्लेख किया, जो औद्योगिक दृष्टि से कहीं आगे था और जहाँ मजदूर सरकार थी, वह राष्ट्रीयकरण के बावजूद तीव्र गति से आगे नहीं बढ़ा पा रहा था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इंग्लैड में समाजवाद उसके औद्योगिकीकरण में बहुत ज्यादा उन्नति करने के बाद ही आया था।

परंतु यह कहा जाता है कि सरदार पटेल की सरकार का उनकी मृत्यु के बाद पालन नहीं किया गया। भारत ने समाजवादी ढाँचे को अपनाया, जिसकी वजह से भयंकर दुष्परिणाम सामने आए। इसके लिए देश को काफी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी, क्योंकि रूस, जो उनका आदर्श राज्य था, को स्वयं अकल्पनीय कठिनाइयाँ झेलनी पड़ी थीं, आखिरकार विघटन हो जाने की वजह से उसे मुक्त अर्थव्यवस्था की ओर लौटना पड़ा था। अगर हमने सरदार पटेल की सलाह पर अमल किया होता तो शायद भारत इस दुःस्वप्न से बच गया होता।

पूर्ण विघटन और सोवियत रूस की समाजवादी व्यवस्था के आर्थिक रूप से बरबाद हो जाने के परिणामस्वरूप कुछ वर्षों पहले नरसिम्हा राव सरकार द्वारा उदारवादी कदम उठाना पटेल के पूर्वकथित बयान और उनके यथार्थवादी दृष्टिकोण की पुष्टि करता है। नेहरू के समाजवाद ने देश को ऐसी जगह लाकर खड़ा कर दिया था कि केंद्र में स्थित कांग्रेस सरकार को अभी तक चल रही नीतियों को उलटना पड़ा और साथ ही अर्थव्यवस्था का भी उदारीकऱण करना पड़ा, जिसके बारे में चालीस साल पहले नहीं सोचा गया था।



सरदार पटेल यह भी मानते थे कि कपड़े की कमी यातायात की सुविधाओं में कमी होने और भ्रष्टाचार के कारण हुई है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि विशेषज्ञों की एक समिति का गठन किया जाना चाहिए, जिसमें उद्योगपति, अर्थशास्त्री और सरकार के प्रतिनिधि शामिल हों, जिन्हें ढाँचे व सरकार द्वारा निर्धारित नीतियों को कार्यान्वित करने का काम सौंपा जाए। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, जिन्होंने पहले सामाजिक व आर्थिक मामलों के लिए एक पृथक् मंत्रालय बनाने का निर्णय लिया था, ने सरदार पटेल का सुझाव सुनने के बाद अपना विचार बदल दिया और इस बात पर सहमत हो गए कि सरदार पटेल द्वारा निर्धारित आधारों पर एक बोर्ड विशेष सलाहकारों की एक समिति होनी चाहिए, जो हर कदम पर आर्थिक स्थिति की निगरानी रखेगी और अपने सुझावों को सरकार के पास विचारार्थ भेजेगी।

सरदार पटेल ने अमीर व्यापारियों को आगे बढ़कर गरीबों की स्थिति सुधारने में सरकार की मदद करने को कहा। उन्होंने कहा, ‘उन्हें यह समझना चाहिए कि जब उन्हें यह पता है कि ऐसे करोड़ों लोग हैं जो भूखे रहते हैं, तब प्रतिदिन दो बार आराम से खाना उनके लिए पाप है।’ उन्होंने प्रांतीय मंत्री या लोकसभा के अध्यक्ष (स्पीकर) का वेतन 500 रुपए महीना निश्चित कर दिया और उन लोगों की प्रशंसा की जिन्होंने एक मंत्री या स्पीकर के रूप में देश की सेवा करने के लिए अपनी विलासिताओं का त्याग कर दिया था। उन्होंने अपने 23 जुलाई, 1937 को लिखे पत्र में 500 रुपए वेतन पानेवाले मंत्री को 600 रुपए का भत्ता देने पर डॉ. खरे की आलोचना भी की। इसे उन्होंने दोगलापन बताया।



यद्यपि केंद्रीय मंत्री के सामने सरदार पटेल ने ये निर्देश दिए कि उन्हें हर माह सभी प्रकार के कर से मुक्त 2000 रुपए वेतन दिया जाए और साथ ही मुफ्त में रहने को तमाम सुविधाओं के साथ एक घर दिया जाए, जिसमें बिजली और पानी का खर्च भी शामिल हो। जहाँ तक मनोरंजन भत्ते की बात है, तो एक मंत्री को आतिथ्य कोष से कुछ दिया जा सकता है, जो समस्त मंत्रियों के लिए सामूहिक कोष होगा और जिसकी अनुमति विधानमंडल द्वारा दी गई होगी। उन्होंने प्रधानमंत्री के लिए इस बात को ध्यान में रखते हुए कि उनसे मिलने के लिए बड़ी संख्या में विदेशी आते हैं, मनोरंजन भत्ते के लिए मेहमानदारी भत्ते के अतिरिक्त 1000 रुपए प्रतिमाह का और भत्ता तय किया था। नेहरू सरदार पटेल के सारे सुझावों से सहमत थे, पर उन्हें प्रधानमंत्री के मनोरंजन भत्ते के लिए खास प्रावधान रखना अनिवार्य नहीं लगा। हालाँकि उन्होंने यह सुझाव दिया कि कुछ हवाई जहाज, जैसे—डकोटा और दो-तीन अन्य छोटे हवाई जहाजों को जरूरत पड़ने पर मंत्रियों के इस्तेमाल के लिए रखा गया जाए। यद्यपि किसी भी मंत्री को सैलून के इस्तेमाल की इजाजत नहीं होगी। अगर वह रेल द्वारा यात्रा करेगा तो उसके लिए प्रथम श्रेणी के डिब्बे को आरक्षित किया जाएगा। जहाँ तक स्थानीय वाहन की बात है, तो मंत्री को कार खरीदने के लिए अग्रिम राशि दी जाएगी और उसे उचित किस्तों में वापस लिया जाएगा। जब तक किस्तों का भुगतान नहीं हो जाएगा, कार सरकार के पास गिरवी रहेगी। सरदार पटेल तो दौरे पर गए किसी मंत्री के लिए दैनिक भत्ते के रूप में 30 रुपए को बहुत अधिक मानते थे। उन्होंने उसे कम करने का सुझाव दिया था। एक बार तो वह राजकुमारी अमृत कौर के सुझाव पर केंद्रीय मंत्री को 500 रुपए मनोरंजन भत्ता देने के लिए राजी हो गए थे।



इस संदर्भ में यह जानना भी दिलचस्प होगा कि सरदार पटेल ने प्रधानमंत्री को यह सुझाव दिया था कि सुरक्षा की दृष्टि से मंत्रियों के घरों में कुछ पुलिसकर्मियों के अलावा दो से ज्यादा सुरक्षाकर्मियों को तैनात करने की आवश्यकता नहीं है। कुछ राज्यपालों की ओर से भी यह प्रस्ताव आया था, खासकर उड़ीसा के राज्यपाल की तरफ से, कि उनके भत्ते में वृद्धि की जाए; पर सरकार ने उसे भी नकार दिया था। असम के मुख्यमंत्री गोपीनाथ बारदोलोई की मृत्यु के बाद यह बात सामने आई कि सरदार पटेल ने अपने पीछे न कोई धन और न ही संपत्ति छोड़ी। उनकी पत्नी और बच्चों के पास कोई भी वित्तीय सहारा नहीं है। विचार-विमर्श करने के बाद बारदोलोई ने बच्चों को स्कॉलरशिप और उनकी विधवा को कुछ पेंशन देने का निर्णय लिया।

सरदार पटेल इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट थे कि भारत में दवाई बनानेवाले उद्योग को उन्नति करनी चाहिए। उन्होंने अंतरप्रांतीय व्यापार पर लागू उत्पाद शुल्क की आलोचना की। उन्होंने देश में पशुधन को सुधारने और कृषि उत्पाद को बढ़ाने की महत्ता पर भी बल दिया।

देश के आर्थिक मामलों के प्रति सरदार की सोच बहुत ही व्यावहारिक थी। वह मानवता और समय की जरूरत से सराबोर थी। अधिक उत्पादन, समान वितरण और उत्पादन के तमाम साधनों के साथ सही व्यवहार उनकी आर्थिक नीति के मुख्य आधार थे। 5 जनवरी, 1948 को कलकत्ता में दिए अपने महत्त्वपूर्ण भाषण में उन्होंने यह बात स्पष्ट कर दी कि उद्योग का राष्ट्रीयकरण करने से पहले उसको स्थापित करना जरूरी है। उन्होंने उन लोगों की निंदा की, जो इस बात में यकीन रखते हैं कि मजदूर उत्पादन तो कम करें, किंतु उन्हें ज्यादा धन मिले। इसका परिणाम यह हुआ कि हड़ताल हो गई, जिससे उत्पादन रुक गया। कम उत्पादन का अर्थ था गरीबी को और बढ़ाना। उन्होंने उन लोगों को प्रेरित किया, जो इस अंतहीन चक्र को तोड़ना चाहते थे। उत्पादन किया जाए या सबकुछ नष्ट हो जाए—इस संकट की स्थिति में देश के सामने यही जटिल प्रश्न खड़ा है।