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सोमवार, 30 अप्रैल 2012

रिश्ते तन से नहीं, मन से निभाएं...

नमस्कार दोस्तों ...
 आज फिर एक बहुत ही ..अच्छा   पोस्ट पढ़ने को मुझे मिला है ..वही यहाँ आप सारे मित्रो के साथ बाँटना  चाहता हूँ ....
 अगर अच्छा लगे तो जरूर से ..किसी और से भी बाँट लेना .........


                          परिवारों में रिश्ते बनते भले ही शरीर से हैं, लेकिन रिश्तों को निभाने के लिए शरीर से अलग हटना पड़ता है। भारतीय परिवारों में भी बदलते दौर में एक बड़ा परिवर्तन आया है। हमारे यहां पहले रिश्तों को महत्व दिया गया, शरीर को गौण रखा गया।





इसीलिए भारत के परिवार के सदस्य एक-दूसरे से भावनात्मक रूप में रहते हैं। धीरे-धीरे घर-गृहस्थी का विस्तार हुआ। बाहर की दुनिया में लोगों का समय अधिक बीतने लगा। लक्ष्य परिवार से हटकर संसार हो गया और यहीं से शरीर का महत्व बढ़ गया।




जैसे ही हम रिश्तों में शरीर पर टिकते हैं, हमारा आदमी या औरत होना भारी पड़ने लगता है, उनका अहं टकराने लगता है। बाप और बेटे का एक रिश्ता है। जब तक इसमें केवल रिश्ता काम कर रहा होता है, प्रेम और सम्मान भरपूर रहेगा, लेकिन जैसे ही दोनों अपने शरीर पर टिकेंगे, तो भीतर का पुरुष जाग जाता है और यहीं से फिर बाप-बेटे नहीं, दो पुरुष नजर आने लगते हैं।




ठीक यही स्थिति पति-पत्नी के बीच बन जाती है। स्त्री हो या पुरुष, जब तक रिश्ते की डोर से बंधे हैं, दोनों एक-दूसरे के प्रति अत्यधिक सम्मानपूर्वक रहेंगे, लेकिन इनके भीतर का आदमी, औरत जागते ही रिश्ते बोझ बन जाते हैं।




यही स्थिति हर संबंध में काम करती है। पत्नी के रूप में रिश्ता एक दायित्व, एक स्नेह का होता है, लेकिन यदि वह स्वयं भी अपने भीतर की स्त्री को ही जाग्रत कर ले, पुरुष भी केवल शरीर ही देखने लगे, तो फिर सारी अनुभूतियां कामुकता, अपेक्षा, महत्वाकांक्षा और लेन-देन पर टिक जाती हैं।



जिन रिश्तों में शरीर गौण हों और भावनाएं प्रमुख हों, वहां जिंदगी मीठी होने लगती है। यह सही है कि शरीर के बीज से ही रिश्ते अंकुरित होते हैं, लेकिन जो लोग वापस शरीर की ओर लौटेंगे, वे रिश्तों का वृक्ष नहीं बना पाएंगे।



रिश्तों से जुड़ने पर ऐसा लगता है, जैसे पत्थर में से मूर्ति संवारी गई। छुपा हुआ निखरकर आता है। हमें आज के दौर में यह ध्यान रखना होगा कि रिश्ते शुरू तो शरीर से हों, पर धीरे-धीरे शरीर से हटकर भावना, संवेदना, ममता, सम्मान और प्रेम पर जाकर टिकें। एक-दूसरे के साथ रहने में थोड़ा सा यदि प्रेमभरा समझौता किया जाए तो आनंद और सुगंध दोनों मिल जाते हैं। बगीचे में हर फूल अपनी महक लिए होता है। उसी प्रकार जब हम परिवार में रहते हैं तो हर सदस्य की अपनी एक खुश्बू होती है।


जो सुगंध आपको अच्छी लगती है वैसे व्यक्ति के पास हम रहना पसंद करते हैं। चाहत सबकी होती है कि किसी न किसी का सान्निध्य बना रहे। यह संगति चाहे मन से हो या तन से, अपने तरीके से संतोष देती ही है और इसकी हैण्डलिंग ठीक से न की जाए तो यह निराशा और तनाव भी देती है। परिवार में सहयोग, समझौता और सूझबूझ रिश्तों के मतलब ही बदल देती है।

Source: पं. विजयशंकर मेहता






रविवार, 15 अप्रैल 2012

शास्त्रों में वर्णित दिव्य अस्त्र शस्त्र{Divine Weapons }

शास्त्रों में वर्णित दिव्य अस्त्र शस्त्र{Divine Weapons }




1.ब्रह्मास्त्र -अचूक और एक विकराल अस्त्र है। यह शत्रु का नाश करके ही छोड़ता है। इसका प्रतिकार दूसरे ब्रह्मास्त्र से ही हो सकता है, अन्यथा नहीं। रामायण काल में यह विभीषण और लक्ष्मण के पास था। अपने शत्रुओं के विनाश के लिए अर्जुन, कृष्ण, कुवलाश्व, युधिष्ठिर, कर्ण, प्रद्युम्न आदि ने 'ब्रह्मास्त्र' का प्रयोग समय-समय पर किया था।दो ब्रह्मास्त्रों के आपस में टकराने से प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इससे समस्त पृथ्वी के समाप्त होने का भय रहता है। यदि ऐसा हो जाये तो फिर से एक नई पृथ्वी तथा जीवधारियों की उत्पत्ति करनी पड़ेगी।
                         अश्वत्थामा ने पिता द्रोणाचार्य की आज्ञा से महाभारत संग्राम में कौरवों की सहायता की थी। युद्ध समाप्ति के पश्चात अश्वत्थामा ने ही पांडवों के पुत्रों का छल से वध किया था। पुत्र शोक में जब अर्जुन ने कृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा किया तो वे भाग गए। फिर भी जब अर्जुन ने उनका पीछा न छोड़ा तब अश्वत्थामा ने अर्जुन के ऊपर ब्रह्मास्त्र फेंका। उत्तर में अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। दो ब्रह्मास्त्रों के तेज से संपूर्ण संसार कंपित हो उठा।







2.नारायणास्त्र पाशुपत के समान विकराल अस्त्र है। इस नारायण-अस्त्र का कोई प्रतिकार ही नहीं है। यह बाण चलाने पर अखिल विश्व में कोई शक्ति इसका मुक़ाबला नहीं कर सकती। इसका केवल एक ही प्रतिकार है और वह यह है कि शत्रु अस्...त्र छोड़कर नम्रतापूर्वक अपने को अर्पित कर दे। कहीं भी हो, यह बाण वहाँ जाकर ही भेद करता है। इस बाण के सामने झुक जाने पर यह अपना प्रभाव नहीं करता।






3.आग्नेय अस्त्र एक विस्फोटक बाण है। यह जल के समान अग्नि बरसाकर सब कुछ भस्मीभूत कर देता है। इसका प्रतिकार पर्जन्य है। ये वे आयुध जो मन्त्रों से चलाये जाते हैं- ये दैवी हैं। प्रत्येक शस्त्र पर भिन्न-भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है और मन्त्र-तन्त्र के द्वारा उसका संचालन होता है। वस्तुत: इन्हें दिव्य तथा मान्त्रिक-अस्त्र कहते हैं।



4.पर्जन्य अस्त्र एक विस्फोटक बाण है। यह अग्नि के समान जल बरसाकर सब कुछ भस्मीभूत कर देता है। इसका प्रतिकार पर्जन्य है। ये वे आयुध हैं जो मन्त्रों से चलाये जाते हैं- ये दैवी हैं। प्रत्येक शस्त्र पर भिन्न-भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है और मन्त्र-तन्त्र के द्वारा उसका संचालन होता है। वस्तुत: इन्हें दिव्य तथा मान्त्रिक-अस्त्र कहते हैं।



5.पन्नग अस्त्र से सर्प पैदा होते हैं। इसके प्रतिकार स्वरूप गरुड़ बाण छोड़ा जाता है।



6.गरुड़ अस्त्र बाण के चलते ही गरुड़ उत्पन्न होते हैं, जो सर्पों को खा जाते हैं।



7.शक्ति अस्त्र लंबाई में गज भर होते हैं, उसका हेंडल बड़ा होता है, उसका मुँह सिंह के समान होता है और उसमें बड़ी तेज़ जीभ और पंजे होते हैं। उसका रंग नीला होता है और उसमें छोटी-छोटी घंटियाँ लगी होती हैं। यह बड़ी भारी होती है और दोनों हाथों से फेंकी जाती है। ये वे शस्त्र हैं, जो यान्त्रिक उपाय से फेंके जाते थे।



8.फरसा अस्त्र एक कुल्हाड़ा है। पर यह युद्ध का आयुध है। इसकी दो शक्लें हैं।



9.गदा एक प्राचीन शस्त्र है। इसकी लंबाई ज़मीन से छाती तक होती है। इसमें एक लंबा दंड होता है ओर उसके एक सिरे पर भारी गोल लट्टू सरीखा शीर्ष होता है। इसका वज़न बीस मन तक होता है। गदायुद्ध की चर्चा प्राचीन साहित्य में बहुत हुई हैं। महाभारत में पात्र भीम, दुर्योधन, जरासंध, बलराम आदि प्रख्यात गदाधारी थे। राम के सेवक हनुमान भी गदाधारी है।



10.चक्र अस्त्र दूर से फेंका जाता है। श्री कृष्ण ने महाभारत में इसका प्रयोग किया था। प्रमाणों की ज़रूरत नहीं है कि हमारे पूर्वज गोला-बारूद और भारी तोपें, टैंक बनाने में भी कुशल थे। इन अस्त्रों का प्राचीन संस्कृत-ग्रन्थों में उल्लेख है।ॐ ॐ

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

some photo image & painting

नमस्कार  मित्रो ...आज कुछ मेरी पसंदीदा तस्वीर  यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ .हर तस्वीर कुछ न कुछ कहना चाहती है ..मैंने प्रयास किया है उनकी आवाज़ को सब्द देने का ..
.
 ज़िन्दगी का ये सफ़र भी यूँ ही पूरा हो गया
 इक ज़रा नज़रें उठायीं थीं कि पर्दा हो गया 
गुलाब की पत्तियां पहले ही झड़ चुकि थीं

बची खुची खुशबु भी चुरा ले गयी पापी हवा 

 

बहुत दिनों से कोई हवा इधर से नहीं गुज़री है,



                                           बाग में सर झुकाये खड़ा हूं दरख्तों की तरह,









है बात वक्त वक्त की चलने की शर्त है



                                               साया कभी तो कद के बराबर भी आएगा

















किस को अपना दुःख सुनाएँ किस से अब मांगें मदद



                                      बात करता है तो वो भी इक नयी ज़ंजीर की







कोनों में काँपते थे अँधेरे जो आज तक



सूरज को ज़र्द देखा तो मगरूर हो गए





जिन कायदों को तोड़ के मुजरिम बने थे हम



वो क़ायदे ही मुल्क का दस्तूर हो गए




मैं अपनी धुन में आग लगाता चला गया



सोचा न था कि ज़द में मेरा घर भी आएगा






ज़िन्दगी क्या है और मौत क्या



शब् हुई और सहर हो गयी






इक ज़माना था कि जब था कच्चे धागों का भरम



                                          कौन अब समझेगा कदरें रेशमी ज़ंजीर की





 नया सवेरा नयी किरण के साथ


नया दिन एक प्यारी सी मुस्कान के साथ 



रातें गुमनाम होती है,


                                                           दिन किसिके नाम होता है,

                                                     हम ज़िंदगी कुछ इस तरह जीते है




रोती हुई आँखो मे इंतेज़ार होता है,


ना चाहते हुए भी प्यार होता है,

क्यू देखते है हम वो सपने,

जिनके टूटने पर भी उनके सच होने का इंतेज़ार होता है?



रोक लें या बढने दें..


थाम लें या गिरने दें..

वस्ल की लकीरों को..

तोड दें या मिलने दें..

रास्तों की मर्ज़ी है








अजनबी कोई लाकर..


हमसफ़र बना डालें..

साथ चलने वालों की..

राह जुदा बना डालें..

या मुसाफ़तें सारी..

खाक मे मिला डालें..

रास्तों की मर्ज़ी है..




बैठे बैठे ज़िन्दगी बरबाद ना की जिए,



ज़िन्दगी मिलती है कुछ कर दिखाने के लिए,


रोके अगर आसमान हमारे रस्ते को,


तो तैयार हो जाओ आसमान झुकाने के लिए




 
चाँद की महफ़िल में अनजाने मिल गए,



हमने देखा तो सब जाने पहचाने मिल गए,


मैं बढता गया सच्च के रस्ते पर,


वहीँ पर मुझे सभ खजाने मिल गए





आज़मायेगी लम्हा-लम्हा दोस्ती ये हमारी..


वक्त की कोई घडी, वादे भरी बात मांगेगी..



हम अकेले रहें, या रहे भीड में..

आरज़ू दिल की तो बस तेरी मुलाकात मांगेगी






 
जाने क्यूँ लोग हमें आज़माते है,



कुछ पल साथ रह कर भी दूर चले जाते है,


सच्च ही कहा है कहने वाले ने,


सागर के मिलने के बाद लोग बारिश को भूल जाते है






ज़िन्दगी हसीन है ज़िन्दगी से प्यार करो,



है रात तो सुबह का इंतज़ार करो,


वोह पल भी आयेगा जिसका इंतज़ार है आपको,


बस रब पर भरोसा और वक़्त पर ऐतबार करो




पता नहीं कौन से मोड पर..


ज़िन्दगी हम से तुम्हारा साथ मांगेगी..



रास्तों के पत्थर ना गिरादें मुझे..

इन लडखडाती राहों से डर के तुम्हारा हांथ मांगेगी










कहीं खो दिया, कहीं पा लिया..


कहीं रो लिया..

कहीं गा लिया..

कहीं छीन लेती है हर खुशी..

कहीं मेहरबान ला-ज़वाब है..






बे-ज़मीं लोगों को..



बे-करार आंखों को..


बद-नसीब कदमों को..


जिस तरफ़ भी ले जायें..


रास्तों की मर्ज़ी है..




काश वो समझते इस दिल की तड़प को,



तो यूँ हमें रुसवा ना किया होता,


उनकी ये बेरुखी भी मंज़ूर थी हमें,


बस एक बार हमें समझ लिया होता






हस्ते रहें आप हज़ारों के बीच में,



जैसे हस्ते हैं फूल बहारों के बीच में,


रोशन हो आप दुनिया में इस तरह,


जैसे होता है चाँद सितारों के बीच में






ये जो ज़िन्दगी की किताब है..


ये किताब भी क्या खिताब है..

कहीं एक हसीं सा ख्वाब है..

कही जान-लेवा अज़ाब है..






 आप हमें रुलादो हमें गम नहीं,



आप हमें भुलादो हमें कोई गम नहीं,


जिस दिन हमने आप को भुला दिया,


समझ लेना इस दुनीया में हम नहीं





ना मुस्कुराने को जी चाहता है,



                                                        ना आंसू बहाने को जी चाहता है,


                                                         लिखूं तो क्या लिखूं तेरी याद में,


                                               बस तेरे पास लौट आने को जी चाहता है




चाँद का क्या कसूर अगर रात बेवफा निकली,



कुछ पल ठहरी और फिर चल निकली,


उन से क्या कहे वो तो सच्चे थे,


शायद हमारी तकदीर ही हमसे खफा निकली





आँखों से आंसू न निकले तो दर्द बड जाता है,



उसके साथ बिताया हुआ हर पल याद आता है,


शायद वो हमें अभी तक भूल गए होंगे,


मगर अभी भी उसका चेहरा सपनो में नज़र आता






वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की सांस लिखूँ..


वो पल मे बीते साल लिखूँ या सादियो लम्बी रात लिखूँ..



सागर सा गहरा हो जाऊं या अम्बर का विस्तार लिखूँ..

मै तुमको अपने पास लिखूँ या दूरी का ऐहसास लिखूँ..











मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..


तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..



हैं फ़ूल रोकते, काटें मुझे चलाते..

मरुस्थल, पहाड चलने की चाह बढाते..

सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं..

मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते..

मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे..

तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो..
















दुनिया के कई अजीब रंग है,



इन रंगों मैं रंग जाना है,


प्यार हर किसी से हम करे गे… मगर !


किसी एक की आंखों मैं खो जाना है






एक दिन जब हम दुनिया से चले जायेंगे,



मत सोचना आपको भूल जायेंगे,


बस एक बार आसमान की तरफ देख लेना,


मेरे आँसू बारिश बनके बरस आयेंगे





ये मेहफ़िल, मस्तियां सब तेरे बिन उदास..


सिर्फ़ तन्हाइयां हैं.. जायें जहां..

हां ये शहर, बस्तियां सब तेरे बिन उदास..

सिर्फ़ वीरानियां हैं.. जायें जहां..

जरा बता रहे.. तेरे बिना जीना कुछ भी नहीं..








दिल मेरा हर जगह.. बस तुझे ढूंढें यार..


झील, पर्वत, हवायें हैं मेरे गवाह..

शामें हों या सुबह.. हम तुझे ढूढें यार..

आते-जाते ये मौसम हैं सारे गवाह..

जरा बता रहे.. तेरे बिना जीना कुछ भी नहीं..










दरवाजे पर आहट सुनके उसकी तरफ़ ध्यान क्यूं गया..


आने वाली सिर्फ़ हवा हो.. ऐसा भी हो सकता है..

वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..








 कर दिया दीवाना दर्द-ए-कश ने..


चैन छीना इश्क के एह्सास ने..

बेख्याली दी है तेरी प्यास ने..

छाया सुरूर है.. कुछ तो ज़रूर है..












ना कोई नाता.. अब दिन और रात से..




हर लम्हा तड्प, हर लम्हा तेरी प्यास है..

जब से मैं हूं जुदा तेरे साथ से..



यादें.. यादें.. यादें.. तेरी यादें.. यादें.. यादें..

बातें.. बातें.. बातें.. तेरी.. बातें.. बातें.. बातें..



उन लम्हों को कैसे ज़िन्दा करूं..

सांसें मैं लूं फ़िर भी पल-पल मरूं..









 हम हवा नही जो खो जाएँगे,



वक़्त नही जो गुज़र जाएँगे,


हम मौसम नही जो बदल जाएँगे,


हम तो आँसू है जो खुशी और गम दोनो मे साथ निभाएँगे.





 हल्की सी आहट हो तो लगे तुम आगये..


क्यूं तन्हा छोडकर मुझको रुला गये..







तुम चांद बनके जानम, इतराओ चाहे जितना..


पर उसको याद रखना, रोशन हो जिसके पीछे..



वोह बदगुमा है खुद को, समझे खुशी का कारण..

कि मैं चेह-चहा रहा हूं, अपने खुदा के पीछे..







 हम तो जी रहे थे उनका नाम लेकर,



वो गुज़रते थे हमारा सलाम लेकर,


कल वो कह गये भुला दो हुमको,


हमने पुछा कैसे!!!!











शाम का आंचल ओढ के अयी.. देखो वो रात सुहानी..


आ लिखदें हम दोनो मिलके.. अपनी ये प्रेम कहानी..






जब कोई इतना खास बन जाए,



उसके बारे मे ही सोचना एहसास बन जाए,


तो माँग लेना खुदा से उसे ज़िंदगी के लिए,


इससे पहले के वो किसी ओर की साँस बन जाए.









बे-ज़मीं लोगों को..


बे-करार आंखों को..

बद-नसीब कदमों को..

जिस तरफ़ भी ले जायें..

रास्तों की मर्ज़ी है..


उजाले भी ऐसे मिले कि रोशनी से जल गये हम..


इन उजालों से छिप कर कोई हसीन रात मांगेगी..







कहीं आंसू की है दास्तान..


कहीं मुस्कुराहटों का है बयान..

कई चेहरे हैं इसमे छिपे हुये..

एक अजीब सा ये निकाब है..






कहीं खो दिया, कहीं पा लिया..


कहीं रो लिया..

कहीं गा लिया..

कहीं छीन लेती है हर खुशी..

कहीं मेहरबान ला-ज़वाब है..




कहीं छांव है, कहीं धूप है..


कहीं बरकतों की हैं बारिशें..

तो कहीं, और ही कोई रूप है..



ये जो ज़िन्दगी की किताब है..

ये खिताब लाजवाब है..